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सच दबाने के लिये संघी आतंक

सुनील कुमार
सितम्बर 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत) के दंगे को संघियों ने भड़काया और मजदूर वर्ग के एक समुदाय को घर से बेघर कर दिया। दिन की उजाले की तरह साफ है कि दंगे राजनीतिक फायदे के लिये कराये गये थे, जिसमें सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिये अपने-अपने तरीकों से दंगें में अपनी-अपनी भूमिका को निभाया। मुख्य भूमिका भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम की थी जिसने एक घटना को साम्प्रदायिक रंग देने और लोगों के अन्दर जहर घोलने के लिये, पकिस्तान के सियालकोट में दो युवकों की हत्या का बर्बर वीडियो फेसबुक पर अपलोड किया। इस वीडियो को जब फेसबुक से हटा दिया गया तो यह मोबाईल पर भेजा गया और लोगों के अन्दर झूठा प्रचार कर एक समुदाय के खिलाफ भड़काने का काम किया गया ।
लोगों की समस्या रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व रोजगार के मुद्दों से भटकाने के लिये ‘बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत का आयोजन किया गया। इसमें एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगला गया तो दूसरी तरफ यह अफवाह फैला दी गयी कि लोग हमले करने के लिये आ रहे हैं। इसी तरह टीकरी गांव, जिला बागपत में एक हिन्दू लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर लटका दिया गया। सवाल उठता है कि कोई मुस्लिम, लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर क्यों लटकायेगा?
दंगे के मुख्य आरोपी संगीत सिंह, जिन्होंने फेसबुक पर फर्जी वीडियो अपलोड किया था, को मोदी के मंच से आगरा में पुरस्कृत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल खुलेआम बयान देकर कहते हैं कि ‘‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बंधुओं ने इस बार ‘लव जेहादियों’ को ऐसा करारा जबाब दिया है जैसा कि गुजरात में रामभक्तों को जलाने वालों को दिया गया’’।
7 सितम्बर के नांगला-मंदौड़ पंचायत में ‘बहू बेटी बचाओ’ महापंचायत को धारा 144 के बावजूद होने दिया गया, जबकि उससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी देवराज नागर ने दौरा भी किया था। डीजीपी देवराज नागर भाजपा सांसद व दंगा भड़काने के आरोपी हुकुम सिंह के रिश्तेदार भी हैं। दंगे के दौरान जब एक समुदाय के लोग पुलिस को फोन कर रहे थे तो पुलिस फोन रिसीव नहीं कर रही थी या कर रही थी तो बस यही पूछ रही थी कि कोई मरा तो नहीं। मुस्लिम समुदाय के घरों की तलाशी ली गयी और बीच में पड़ने वाले हिन्दू घरों को छोड़ दिया गया। शिनाना गांव के मीर हसन व दीन मुहम्मद के घरों के जेवर पुलिस तलाशी के दौरान चुरा लिये गये और उनको झूठे केसों में फँसा कर जेल भेज दिया गया। क्या इसे हिन्दू फासिज्म नहीं बोला जायेगा? 1987 में मेरठ में पीएसी जवानों द्वारा किये गये जनसंहार में अभी तक पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल पाया है। बर्खास्त पीएसी जवानों को कर्तव्यनिष्ठ व अनुशासित मानते हुये वापस नौकरी पर ले लिया गया।
मुजफ्फरनगर दंगे के पीड़ित परिवार अभी भी शिविरों में रह रहे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार उन शिविरों को हटाने के लिये लगातार दबाव बना रही है। पीड़ित परिवार अपने गाँव जाने को तैयार नहीं हैं। कुछ पीड़ितों को मुआवजा दिया गया और उनसे शपथ पत्र लिया गया कि वे अपने गाँव नहीं जायेंगे-अगर वापस गये तो उनको मुआवजा वापस करना पड़ेगा।
डेमोक्रेटिक स्टूडेन्ट्स यूनियन (DSU) ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस में 22 जनवरी, 2014 को मुजफ्फरनगर दंगे में हिन्दुत्व फासिज्म (संघ परिवार) की भूमिका पर एक सेमिनार रखा था। इसमें संघ परिवार से जुडे़ ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के गुंडों ने बाधा डाली। सेमिनार रूम के बाहर पुलिस की मौजदूगी में वे नारे लगाते रहे व सेमिनार रूम में बैठ कर वक्ताओं की बातों पर टोका-टोकी करते रहे। ‘संघी, गाय’ आदि का नाम नहीं लेने की बात कह रहे थे। आयोजकों के पूछने पर कि ‘‘संघी को संघी और गाय को गाय नहीं कहा जाये तो क्या कहा जाये’’ तो उनका जबाब था कि जानवर कहो। इस पर सभी लोग हँस पड़े। सच कहा जाये तो ये जानवर ही हैं जिनको यह ज्ञान नहीं है कि इंसानियत क्या होती है। संघीय गुंडों ने ‘न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (NSI)’ के साथी बनोजीत के कपड़े फाड़ दिये। इन संघी गुंडों का जबाब DSU, NSI व अध्यापकों ने मिलकर दिया जिससे वे अपने मनसूबे में कमयाब नहीं हो पाये। दिल्ली पुलिस का भी वही रवैय्या था जो कि यूपी पुलिस का था। वह मूक दर्शक बनी देख रही थी। दिल्ली पुलिस डिर्पाटमेंट के एचओडी से ही सवाल पूछ रही थी कि सेमिनार के आयोजन का परमीशन क्यों दिया गया? दबाव में आकर डिर्पटमेंट ने जल्द से जल्द सेमिनार खत्म करने के लिये आयोजकों पर दबाव डालना शुरू कर दिया। दिल्ली के अन्दर किसी भी डेमोक्रेटिक सम्मेलन, सभा, धरना में आकर यह संघी परिवार बाधा उत्पन्न कर रहा है और दिल्ली पुलिस उनका पूरा साथ दे रही है।
संघी और सभी संसदीय राजनीतिक पार्टियाँ साम्राज्यवाद की नई आर्थिक नीतियों को जोर-शोर से लागू करवाने के लिये वही नीति अपना रहे हैं जो 1991-1992 में नरसिम्हाराव-मनमोहन और संघी ने अपनाया था। आर्थिक नीति लागू करवाने के लिये अडवाणी ने रथ यात्रा निकालकर हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ा कर मुद्दे को भटकाया था। वही नीति अभी संघी अपना रहे हैं जब भूमंडलीकरण के नीतियों को जोर-शोर से लागू करने में शासक वर्ग लगा हुआ है तो देश में अचानक दंगों में तेजी आ गयी है। सभी शांतिप्रिय, जनवादपसंद संगठनों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को यह सोचने की जरूरत है कि भगवाधारियों व पुलिस गठजोड़ को कैसे चुनौती दी जाये। भगवाधारियों की झूठी देशभक्ति को चुनौती देते हुये आत्मनिर्भर, जनवादी भारत का निर्माण कैसे किया जाये।
 

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सुनील कुमार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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