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सन्देह तो ज्ञान की पहली सीढ़ी है- अप्पो दीपो भव !

स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द एवम् महात्मा ज्योतिबा फुले के बहाने चन्द बातें-भाग-1

वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ता और सांप्रदायिकता के विरुद्ध योद्धा सुभाष गाताडे बीती 21-22 जनवरी 2014 को मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर के दर्शन विभाग द्वारा ‘सामाजिक मुक्ति की ज्ञानमीमांसा : विवेकानन्द, ज्योतिबा फुले और दयानन्द सरस्वती के विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा’ पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता थे। उनका उक्त संगोष्ठी में प्रस्तुत व्याख्यान हम अपने पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। व्याख्यान लम्बा है अतः इसे किस्तों में जारी कर रहे हैं।
-सं. हस्तक्षेप
– सुभाष गाताडे
( बहुत मुश्किल होता है शुरूआत करना जब आप किसी विषय के मनीषियों एवम् विद्यार्थियों के बीच खड़ें हो, जिसकी सलाहियत आप में न हो, और आप को कुछ कहने के लिये कह दिया जाए। फिलवक्त मैं अपने आप को इसी स्थिति में पा रहा हूँ। मैं बताना चाहता हूँ कि जब मुझे पहली दफा इस सेमिनार के आयोजन की ख़बर मिली तो मैं यह जानकर बहुत उत्साहित हुआ कि दर्शनशास्त्र  के दानिशवर इतिहास बन चुके मगर हमारे वर्तमान को आज भी आलोकित, प्रभावित करनेवाले तीन ऐसी शख्सियतों पर- दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द और ज्योतिबा फुले पर- खासकर उनके विचार एवम् कार्यों में प्रगट सामाजिक मुक्ति की ज्ञानमीमांसा की पड़ताल करते हुये- बात करने वाले हैं, जिनके बारे में गहराई में जाकर अभी तक ठीक से बात नहीं हो सकी है। मगर जब यह प्रस्ताव भी सामने आया कि इस मसले पर बात भी रखनी है तो मैं थोड़ा दुविधा में था। बहरहाल साहस बटोर कर अपनी टिप्पणियों के साथ आप के सामने उपस्थित हूँ। मुझे मालूम नहीं कि आने वाले कुछ समय तक चलनेवाला मेरा यह एकालाप कथ्य एवम् प्रस्तुति में आप को कैसा लगेगा ?)
1.

कल्पना की उड़ान भरना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है।
कभी कभी मैं सोचता हूँ कि आज से 100 साल बाद जबकि हम सभी- यहाँ तक कि इस सभागार में मौजूद अधिकतर लोग- बिदा हो चुके होंगे तो आने वाले समय के इतिहासलेखक हमारे इस कालखण्ड के बारेमें, जिससे हम गुजर रहे हैं, जिसकी एक एक घटना-परिघटना को लेकर बेहद उद्वेलित दिखते हैं, ‘हम’ और ‘वे’ की बेहद संकीर्ण परिभाषा को लेकर अपने पारिवारिक, सामाजिक एवम् राजनीतिक फैसले लेते हैं, क्या कहेंगे ? आज हमारे लिये जो जीवन मरण के मसले बने हैं और जिनकी पूर्ति के नाम पर हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, उनके बारे में उनकी क्या राय होगी ? क्या वे इस सदी में सामने आये जनसंहारों के अंजामकर्ताओं को लेकर उतनीही अस्पष्टता रखेंगे और कहेंगे कि मारे गये लोग दरअसल खुद ही अपनी मौत के जिम्मेदार थे, जिन्होंने खुद मृत्यु को न्यौता दिया था ? क्या वह किसी वैश्विक मानवता के तब लगभग सर्वस्वीकृत फलसफे के तहत इस दौर की घटनाओं को देखेंगे और अपने अपने ‘चिरवैरियों’ के साथ हमारे रक्तरंजित संग्रामों पर एक अफसोस भरी हंसी हंस देंगे ?
स्पष्ट है कि स्थान एवम् समय की दूरि  किसी विशाल कालखण्ड की वस्तुनिष्ठ आलोचना करने का मौका प्रदान करती हैं। दरअसल जब हम खुद किसी प्रवाह/धारा का हिस्सा होते हैं तब चाह कर भी बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हो पाते हैं, समुद्र की खतरनाक लगने वाली लहरों पर सवार तैराक की तुलना में किनारे पर बैठा वह शख्स कई बार अधिक समझदार दिख सकता है, जिसे भले तैरना न आता हो, मगर जिसके पास लहरों का लम्बा अध्ययन हो।
सौ साल से अधिक वक्त़ गुजर गया उन्नीसवीं सदी की इस त्रयी के सबसे ‘युवा’ सदस्य विवेकानन्द का इन्तक़ाल हुये। इस दौरान निश्चित ही बहुत कुछ बदला है। राजनीतिक आज़ादी मिली है। समाजी जीवन ने भी बहुत करवट ली है। बहुत कुछ बदला है।
मगर बहुत कुछ नहीं भी बदला है।
आज जो मुल्क हमारे सामने है उसमें हम इन तीनों शख्सियतों के अक्स को आसानी से देख सकते हैं। निश्चित ही इसके अलावा तमाम अन्य शख्सियतें या तंजीमों/ संगठनों के अक्स देखे जा सकते हैं जिन्होंने अवाम की दशा एवम् दिशा बदलने के लिये अपने हिसाब से काम किया।
सेमिनार के लिये भेजे गये ‘कन्सेप्ट नोट’ में इन तीनों के बारे में चन्द बातें लिखी गयी हैं
विवेकानन्द मानते थे कि लड़ाकू हिन्दुइजम के पुनर्जीवन के जरिए वास्तविक सामाजिक आजादी हासिल हो सकती है’ जबकि दयानन्द सरस्वती के बारे में लिखा गया है कि किस तरह वह‘ अतीत को पुनर्जीवित करना चाहते थे,’ अगर हम अगल बगल देखेंगे तो आसानी से ऐसी ताकतों को हमारे बीच पहचान सकते हैं जो किसी न किसी रूप में विवेकानन्द को आदर्श मान कर चल रही हैं; जो दयानन्द के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं। और ज्योतिबा ने जिस जातिविहीन, अतीत से पूरी तरह विच्छेद करनेवाले, स्त्री मुक्ति के लिये प्रयासरत समाज का तसव्वुर किया था, उस धारा के अनुगामी भी मिल जाते हैं।
वैसे इसके पहले कि हम प्रस्तुत विषय की विवेचना करना शुरू कर दें, मैं चाहूँगा कि अपने मन की आँखों के सामने सबसे पहले इन तीनों शख्सियतों को लाने की कोशिश करें और यह ‘देखने’ की कोशिश करें कि स्मृति-विस्मृति के अनवरत जारी द्वंद्व से छन कर इनके बारे में क्या क्या बातें सामने आती हैं ?
हमारे मन की आँखों के सामने उस छोटे से मूलशंकर की छवि आती है जो रात में जग रहा है और शिव की मूर्ति पर बेखौफ दौड़ते चूहों को देख रहा है और सवालों का एक छोटा घेरा उसके इर्द-गिर्द खड़ा है, यह ‘सर्वशक्तिमान’ कहा जानेवाला ईश्वर जिसे सभी लोग पूजते हैं, वह अगर खुद की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो भक्तों की कहाँ से कर सकेगा ? हम फिर युवा मूलशंकर से भी रूबरू होते हैं जो अपने तमाम प्रश्नों के साथ जगह जगह दौरे पर निकला है, वहीं उसे अपने गुरू दयानन्द सरस्वती (12 फरवरी 1824-30 अक्तूबर 1883) नाम से सम्बोधित करते हैं। वेद एवम् संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, वैदिक विचारधारा के पुनर्जीवन के लिये प्रयास, संस्थापक आर्य समाज, हिन्दू धर्म में व्याप्त मूर्तिपूजा और कर्मकाण्ड का विरोध। सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ की रचना। और ढेर सारी बातें।
रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द (12 जनवरी 1863- 4 जुलाई 1902) का नाम लेने पर 1893 में शिकागो में आयोजित पार्लियामेन्ट ऑफ वर्ल्ड रिलीजन्स में हिन्दू धर्म का परिचय देते हुये उनका बहुचर्चित व्याख्यान याद आता है। पश्चिमी जगत में वेदान्त एवम् योग के दर्शनों के प्रसार में उनके योगदान की चर्चा सामने आती है, रामकृष्ण मठ की स्थापना की उनकी पहल, या बर्तानिया की हुकूमत के अन्तर्गत भारत में हिन्दू धर्म के पुनर्जीवन में उनके हस्तक्षेप या जगह-जगह व्याख्यानों का सिलसिला सभी कुछ आँखों के सामने नमूदार हो जाता है। और बमुश्किल 39 साल की उम्र में उनके देहान्त का मंज़र भी सामने आता है।
बहुजनों, शूद्रों अतिशूद्रो की मुक्ति के लिये सत्यशोधक समाज की स्थापना करने वाले महात्मा ज्योतिराव गोविन्दराव फुले (11 अप्रैल 1827- 28 नवम्बर 1890) का नाम लेते ही उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले की तस्वीर भी सामने आती है और 1848 में लड़कियों के लिये उन्होंने पुणे में खोला पहला स्कूल, अपने घर का कुआं सभी जातियों के लिये खोलने की घटना या इसी वजह से उन्हें घर से बेदखल किए जाने की घटनाएं भी नमूदार हो जाती है। कार्यकर्ता, विचारक, सामाजिक क्रान्तिकारी फुले के जीवनपटल से उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831- 10 मार्च 1897) को कहीं से अदृश्य नहीं किया जा सकता, यह सच्चाई भी सामने आती है।
19 वीं सदी की इन तीनों शख्सियतों में- जिनमें सबसे युवा विवेकानन्द है- एक साझापन अवश्य दिखता है कि वे सभी अपने उद्देश्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उसकी प्राप्ति के लिये अपनी तमाम बौद्धिक एवम् शारीरिक क्षमता उड़ेल दिये हैं। इन तीनों की तुलना करें तो अपने मकसद के प्रचार प्रसार के लिये सबसे दूर भ्रमण के लिये जाने वालों में विवेकानन्द हैं जिसमें वह अमेरिका की भी यात्रा करते हैं, दयानन्द सरस्वती की भ्रमणगाथा भी उतनीही रोमहर्षक है, बर्तानवी सामराजियों के नियंत्रण में रहनेवाले हिन्दोस्तां में वह काफी घुमते दिखते हैं, जगह जगह शास्त्रार्थ करते भी दिखते हैं और इनमें सबसे कम बाहर जानेवालों में- खासकर अपने प्रांत के बाहर भी- जोतिबा फुले दिखते हैं।
वैसे यह कोई जरूरी नहीं कि दुनिया की सैर करनेवाला व्यक्ति अपने दृष्टिकोण में भी उतनी ही व्यापकता का परिचय दे और अपने घर तक सीमित रहने वाला व्यक्ति बहुत तंगनज़र ही हो। दुनिया के दो महान दार्शनिक इमैन्युएल काण्ट और लुडविग फायरबाख के बारे में- जिनके दार्शनिक अवदानों के बारे में आज भी हम बात करते हैं- यह बहुत मशहूर है कि वे अपने कस्बों या शहरों को छोड़ कर बहुत कम बाहर गये थे।
प्रश्न उठता है कि इन तीन अज़ीम शख्सियतों के चिन्तन में व्याप्त सामाजिक मुक्ति के विचार की ज्ञान मीमांसा कैसे की जा सकती है ?
ज्ञान मीमांसा का विचार दर्शन के आप सभी मनीषियों और विद्यार्थियों के लिये बेहद आम फहम बात होगी या सामाजिक मुक्ति के मायने भी आप के लिये स्पष्ट होंगे, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेहतर होगा कि इन परिभाषाओं के बारे में एक साझी समझदारी बना लें।
2
इस गुस्ताखी के लिये मैं माफी चाहूँगा क्योंकि फिलॉसाफी के जानकारों के सामने चन्द लब्ज ज्ञान मीमांसा अर्थात् एपिस्टेमोलोजी के रखना चाहता हूँ। ग्रीक जुबां में ‘एपिस्टेम’ अर्थात् ‘‘ज्ञान, समझदारी’’ और ‘लोगोंस’ का अर्थ ‘का अध्ययन। दर्शन की वह शाखा जो ज्ञान के स्वरूप एवम् दायरे तक सरोकार रखती है, जिसे हम ‘‘ज्ञान का सिद्धान्त’’ भी कहते हैं। वह सवाल उठाती है कि ज्ञान क्या है और उसे कैसे हासिल किया जा सकता है। इस क्षेत्र की अधिकतर बहस ज्ञान के स्वरूप के दार्शनिक विश्लेषण पर केन्द्रित होती है और वह इस बात की पड़ताल करती है कि वह सत्य, विश्वास और जस्टिफिकेशन जैसी धारणाओं के साथ किस तरह का सम्बन्ध रखती है।
हम अपने आप से पूछ सकते हैं कि क्या वास्तविक ज्ञान मीमांसा ऐसे समाजों में मुमकिन भी है जहाँ हमारे समग्र जीवन का दैवी ताकतों अर्थात् कपअपदम वितबमे द्वारा निर्धारण एक सहजबोध/ कॉमन सेन्स बना हो। धर्म, ईश्वर की मौजूदगी, धर्म से जुड़ी संस्थानों का चतुर्दिक प्रभाव किसी भूभाग पर काबिज राजा को भी नतमस्तक करने के लिये काफी रहता हो। हम यूरोपीय इतिहास के मध्ययुग के उस प्रसंग को याद कर सकते हैं जब तत्कालीन पोप से असहमति के चलते राजा को मुआफी माँगने के लिये पैदल वैटिकन की यात्रा करनी पड़ी थी।
एक ऐसा समाज जहाँ हर आम एवम् खास तबकों को क्या करना चाहिए, उनकी तौर ए जिन्दगी कैसे होगी, इसके बारे में किसी चर्च से, किसी मनु महाराज के या किसी अन्य पवित्र कही जानेवाली किताब के निर्देश सर आँखों पर माने जाते हों, वहाँ ज्ञान की वास्तविक मीमांसा की मुश्किलें देखी जा सकती हंै ? ऐसे समाज जहाँ आप को आस्था का भी अधिकार न हो, यह तय हो जाता हो कि आप किस आस्था के हैं वहाँ क्या किसी बात पर सन्देह करने की गुंजाइश बनती हैं। और सन्देह तो ज्ञान की पहली सीढ़ी है।
क्या मेरा यह मानना है कि पुराने समय में क्या ऐसे दार्शनिक जनमे ही नहीं, जिन्होंने ज्ञान का अध्ययन नहीं किया था, उसका दार्शनिक विश्लेषण नहीं किया था। ऐसी नासमझी भरी बात मैं कह सकता हूँ।  क्या हम अपने यहाँ की समृद्ध परम्पराओं को या पश्चिमी समाजों- खासकर ग्रीक की- ऐसी परम्पराओं को भूल सकते हैं। मैं उन प्रचण्ड कठिनाइयों को बयाँ कर रहा था जिसका नतीजा यह होता है कि कोई बुद्ध- जिसने ढाई हजार साल पहले ‘दुख के भौतिक कारणों की पड़ताल की थी’, जिसने सब कुछ ‘अनित्य’ होने की बात कही थी, जिसने लोग ‘अपने दीपक आप बनें’ किसी गुरू या किसी पारलौकिक शक्ति पर निर्भर ना रहें, जैसा सन्देश दिया था, उनके गुजर जाने के बाद उनका ही बुत बना दिया जाता है और आँखें खोल कर अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करने की उनकी सलाह ‘बुद्ध शरणम् गच्छामि’ में रूपान्तरित होती दिखती है।
लम्बी चौड़ी बात को मुख्तसर में कह दें तो जिसे कोपर्निकन क्रान्ति- अर्थात् पृथ्वी ब्रह्यांड के केन्द्र में नहीं इसका खुलासा जब तक नहीं हुआ, जब तक यह नहीं पता चला कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर नहीं लगाता है, पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है- के पदचाप नहीं सुनायी दिये तब तक हमारी तमाम बौद्धिक एवम् वैचारिक लड़ाइयाँ धर्मों के आवरण में ही लिप्त थीं। आज एक छोटा बच्चा जानता है कि पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है, मगर उस वक्त़ अपने गणित के आधार पर उसे प्रमाणित करने वाले ब्रूनो को यही कहने के लिये आग में जलना पड़ा था। कहा जाता है कि अपनी जान बचाने का विकल्प उसके सामने था, बशर्ते वह अपने गणित को खारिज कर देता; मगर उसने धर्म का चुनौती थी। धर्म के आवरण को भेदते हुये बिल्कुल सेक्युलर आधारों पर ज्ञान की विवेचना उसके बाद ही शुरू हो सकी है।
आधुनिकता के युगांतरकारी आगमन ने- जिसकी संरचना का बुनियादी घटक विज्ञान है- इस समूचे परिदृश्य को रैडिकल ढंग से बदल दिया है। जैसा कि एक लेख में प्रस्तुत किया गया है

‘विज्ञान यथार्थ की प्रकृति और वस्तुगत ज्ञान की सम्भावना पर जैसी रौशनी डालता है वह पहले सम्भव नहीं थी। न केवल यह प्रकृति का ज्ञान सम्भव बनाता है, बल्कि ज्ञानमीमांसा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और समूचे मानव-ज्ञान के लिये एक प्रतिमान प्रस्तुत करता है।’

 (रवि सिन्हा: आधुनिकता और आधुनिकताएं, सन्धान, अक्तूबर 2001)
सिंहावलोकन करते हुये हम देख सकते हैं कि एक लम्बा सिलसिला चला है आधुनिकता के सूत्रपात का जो रिनेसां- रिफार्मेशन- एनलाइटनमेण्ट- इण्डस्ट्रियलायजेशन के कड़ी के रूप में सामने आया है। निश्चित ही यह सारे परिवर्तन यूरोप के सामाजिक-सांस्कृतिक शरीर में फलीभूत हुये हों, मगर  इस ‘यूरोपीय बनावट के अन्दर आधुनिकता वे मूलतत्व देखे जा सकते हैं जो अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक बनावटों में भी कार्यरत हैं और जिन्होंने आधुनिकता के गैरपश्चिमी संस्करणों की रचना में भी केन्द्रीय भूमिका निभाई है।’ (वही) इनके आठ प्रधान तत्वों को उसमें चिन्हित किया गया है। (देखें: वही)
1. विज्ञान: कोपरनिकस (1473-1543), केपलर (1571-1630), गैलीलिओ (1564-1642) और न्यूटन (1642-1727) इस ‘नयी शुरूआत के महानायक’ हैं। विज्ञान कई अन्य कारणों के अलावा अपने दार्शनिक महत्व के लिये भी अहमियत रखता है।
2. तर्कबुद्धि
3 प्रगति की अवधारणा
4. मानवीय कर्तृत्व का महत्व
5. आत्मप्रश्नेयता
6. धर्मनिरपेक्षता
7. निजी और सार्वजनिक का भेद
8. न्याय, स्वाधीनता और मुक्ति: ये आधुनिकता के मूल्य विधान (नार्मेटिव स्ट्रक्चर) के मुख्य लक्ष्य हैं। निश्चय ही आधुनिकता की अब तक की यात्रा इन लक्ष्यों तक सीधे पहुँचने की यात्रा नहीं रही है। ‘पूर्व आधुनिक समाज के सन्दर्भ में आधुनिकता के इन दावों की प्रभावोत्पादकता को देखा जा सकता है, जिनके चलते यूरोप में राजनैतिक और सांस्कृतिक ऊर्जा का एक युगान्तरकारी विस्फोट हुआ था।’
अपनी वर्तमान बहस के सन्दर्भ में फिर मुक्ति के हमारे लिये क्या मायने निकलते हैं।
जारी……

About the author

Subhash gatade is a well known journalist, left-wing thinker and human rights activist. He has been writing for the popular media and a variety of journals and websites on issues of history and politics, human right violations and state repression, communalism and caste, violence against dalits and minorities, religious sectarianism and neo-liberalism, and a host of other issues that analyse and hold a mirror to South asian society in the past three decades. He is an important chronicler of our times, whose writings are as much a comment on the mainstream media in this region as on the issues he writes about. Subhash Gatade is very well known despite having been published very little in the mainstream media, and is highly respected by scholars and social activists. He writes in both E

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