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समाजवादी पार्टी – ताश के पत्तों का महल एक न एक दिन ढहना ही है, आज नहीं तो कल

समाजवादी पार्टी – ताश के पत्तों का महल एक न एक दिन ढहना ही है, आज नहीं तो कल

शमशाद इलाही शम्स

मैं पहलवान मुलायम सिंह का न कभी प्रशंसक रहा न कभी उसके साईकिल छाप समाजवाद का वकील।
बहुत दिनों से सैफई में कब्बड्डी का मैच देशभर का मनोरंजन कर रहा है उसे मैं भी देख रहा हूँ।
मुलायम सिंह की घटिया राजनीति जिसका इतिहास सिर्फ और सिर्फ अवसरवादिता, धोखेबाजी-टिकियाचोरी का रहा हो आखिर उस पर वक्त क्यों जाया किया जाय? ताश के पत्तों का महल एक न एक दिन ढहना ही है, आज नहीं तो कल।

मुलायम सिंह की राजनीति को गौर से देखने वाले सभी जानते है कि उस पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है। जिसका मुलायम सिंह दोस्त उसे दुश्मन की जरुरत नहीं। मुलायम सिंह ने चौधरी चरण सिंह, वी. पी. सिंह, काशीराम-मायावती, भाकपा-माकपा, नितीश कुमार, लालू प्रसाद किस किस को धोखा नहीं दिया?

प्रदेश की सारी सत्ता का केंद्रीयकरण सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार में ही कर देने वाले के दिमाग की मैपिंग करें तो यही पता चलेगा कि उसे खुद पर और अपने परिवार के लोगों के आलावा किसी दूसरे पर कभी विश्वास नहीं रहा।
मुलायम सिंह ने लोहिया छाप समाजवाद के नाम पर सिर्फ अपने परिवार का एकाधिकार जिस तरह स्थापित किया वह राजनीति के किसी भी मापदंड के अनुसार निंदनीय है।
आखिर जो जीवन भर बोया, अंत में वही काटेगा। आज तक दूसरों के साथ जो किया वक्त ने दिखा दिया कि उसका जवाब खुद उसका लड़का ही एक दिन उसे देगा।

कल्याण सिंह और मुलायम सिंह, दोनों के राजनीतिक चरित्र एक जैसे रहे हैं, दोनों की गति एक ही होनी है, एक की हो चुकी दूसरे की प्रक्रिया चल रही है।
अर्जुन सिंह भदौरिया आज जीवित होते तो मैं जरूर प्रश्न करता, आखिर क्या समझ कर तिलक किया था पहलवान का?
भदौरिया ने समाजवादी पार्टी से लोकसभा में इटावा-उत्तर प्रदेश संसदीय क्षेत्र से कई बार प्रतिनिधित्व किया। एक बार वह तब भी चुनाव जीते जब लोहिया खुद चुनाव हार गए थे (शायद 1967 की बात है) इन्ही की ‘हाते’ में मुलायम सिंह मास्टरी करने के बाद आते जाते थे और समाजवादी बुजुर्ग नेताओं को पानी पिलाया करते थे।

1967 में इसी ‘हाते’ की सेवा करते करते उन्हें विधायकी का टिकट मिल गया था और विधायक जी बने थे।

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