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सम्मोहन भागवत जी! हमें हिन्दू राष्ट्र नहीं, शोषण विहीन समतामूलक राष्ट्र चाहिए

बजाओ रे रणसिंघे कि धर्मक्षेत्र भारतदेश कुरुक्षेत्र है अब!
घर वापसी न हुई तो मारे जाओगे और बचेगा नहीं कोई म्लेच्छ अब कहीं!
अल्हा उदल गाओ रे भइये,

कृपया डालर वर्चस्व और अमेरिका के मनुष्य, प्रकृति और सभ्यता के विरुद्ध तमाम अपराधों के मदमदेनजर इस समीकरण पर गौर जरूर करें कि भारत में दूसरे चरण के सुधारों के लिए मनमोहन खारिज और कल्कि अवतरण और फिर अमेरिकी राष्ट्रपति के आगमन से पहले तमाम बिलों को पास कराने का कार्यभार, लंबित परियोजनाओं में फंसी लाखों करोड़ की विदेशी पूंजी की जमानत का तकाजा और इसी के मध्य सिडनी से पेशावर तक मनुष्यता पर बर्बर हमले के तहत पूरे एशिया आस्ट्रेलिया में इस्लामोफोबिया का तिसिस्म घनघोर और उसी के मध्य हिंदू साम्राज्यवाद का मुसलमानों और ईसाइयों के सफाये के लिए दक्षिणपूर्व एशिया के सिंहद्वार कोलकाता से विहिप और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की खुली युद्धयोजना। बंगाल का केसरिया कायकल्प।
आज के रोजनामचे के लिए सबसे पहले कुछ जरुरी बातें।

इसी सिलसिले में हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का लिखा यह मंतव्य भी गौर तलब हैः-

मोहन भागवत जी! तुम न मोदी को चैन लेने दोगे और न अच्छे दिनों के आने की उम्मीद में मोदी की ओर टकटकी लगाए भारत के आम आदमी को और न भारत की तथाकथित बची खुची एकता को।

उन्होंने आगे लिखा हैः-

मनुष्य सब से पहले एक मनुष्य होता है। उसके बाद होता है अभाव ग्रस्त और अति भाव मस्त। अभावग्रस्त होने पर विश्वामित्र भी चांडाल के घर से कुत्ते का मांस चुराकर भूख मिटाते हैं। ये जो धरम- वरम है न! भरपेटियों और ठगों के चोंचले हैं। ॠषि याज्ञवल्क्य के शब्दों में सारे नाते, सारी परंपराएँ, सारे धर्म, स्वार्थ पर टिके हैं. (आत्मनस्तु कामाय वै सर्वं प्रियं भवति)
सम्मोहन भगवत जी! हमें हिन्दू राष्ट्र नहीं, शोषण विहीन समतामूलक राष्ट्र चाहिए.

सुधीर सुमन के इस मंतव्य पर भी गौर करें –

भाजपा वाले जब गाँधी जी के हत्यारे को महिमंडित कर रहे हैं और हत्यारे की मूर्ति लगवाना चाह रहे हैं। तो अचानक मोदी के एक बिहारी सिपहसालार गिरिराज सिंह का बयान याद आ गया, उसने सैकड़ों बेगुनाह बच्चों, महिलाओं और आम लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार रणवीर सेना सुप्रीमो को ‘बिहार का गाँधी’ बताया था। अब भईया उसकी हत्या किसने की, पता नहीं, उसकी तुलना मैं गोडसे करना भी नहीं चाहता। लेकिन महात्मा गाँधी के हत्यारों के गुणगान में लगे लोगों को ब्रह्मेश्वर की हत्या करने वाले को भी ढूँढना चाहिए और बिहार में एकाध उसकी मूर्ति बनवानी चाहिए, क्योंकि बकौल गिरिराज उसने बिहार के गाँधी की हत्या की थी, तो गोडसे भक्तों को उसका भी सम्मान तो करना ही चाहिए न! ये कैसे चलेगा कि गोडसे भी आपका और गाँधी भी आपका. या ब्रह्मेश्वर की हत्या करने वाले की मूर्ति नहीं बना सकते तो एक नया बयान दो कि ‘वह बिहार का गोडसे था।”

विशुद्ध नरसंहार के आक्रामक तेवर में
जंगल बुक के प्रकाशन के पूरे 120 साल हो गये।अगर संभव हो तो दोबारा यह किताब पढ़ें। फिल्में भी हैं, समय निकालकर जरूर देखें।
वैदिकी सभ्यता और वैदिकी साहित्य और इतिहास का राग अलापने वाले मुक्तबाजारी अमेरिकापरस्त इजराइल मुग्ध जो हिंदुत्व के झंडेवरदार भारत का चप्पा-चप्पा मैनहटट्न और न्यूयार्क बना देने के लिए जनसंहारी संस्कृति के तहत विशुद्ध नरसंहार के आक्रामक तेवर में हैं, वे शायद भूल रहे हैं कि भारत की प्राचीन आर्य अनार्य सभ्यता आरण्यक रही है और आर्यों ने ही उस प्रकृति के सान्निध्य की संस्कृति और सभ्यता का सर्वनाश किया।
भारत के आदिवासियों को छोड़कर अब जंगल से किसी को कोई मोहब्बत नहीं है और हम अंधाधुंध वन विनाश को विकास का अभिमुख बनाये हुए हैं।
सुंदरवन जैसा दुनिया का सबसे बड़ा मैनग्रोव फारेस्ट इलाके में कारपोरेट स्विमिंग पुल का शुभारंभ करने गये मास्टर ब्लास्टर सांसद सचिन तेंदुलकर को पहनाये गये चौतीस हजार गुलाबों की हार हमारी उत्तर आधुनिक सभ्यता की अभिव्यक्ति है।
 उस आरण्यक सभ्यता में लेकिन मानवीय उत्कर्ष प्राकृतिक शक्तियों में अभिव्यक्त होता रहा है और हम तब मूर्ति पूजक भी नहीं बने थे।
उस आरण्यक सभ्यता को फील करने का सर्वोत्तम माध्यम जंगल बुक है।
द जंगल बुक
http://hi.wikipedia.org/s/6i9v
बेहतर हैं वीरेनदा।
अच्छी खबर यह है कि हमारे आपके प्रिय कवि वीरेनदा एकदम दुरुस्त हैं और बहुत जोश में हैं। थोड़े कमजोर हैं लेकिन कुल मिलाकर सेहत बेहतर हैं।
दरअसल नैनीताल में फंसे अपने सहकर्मी चित्रकार सुमित का फोन मिलते ही कोलकाता में गिरते तापमान के मध्यहमने ख्याल किया कि वीरेन दा की फेसबुक टिप्पणियां गायब हो गयी हैं और हमने दो रोज पहले तुरत ही फोन उठा लिया। भाभी ने पकड़ा तो डर-डर कर पूछा कि दा कैसे हैं। बोली वह, बहुत बेहतर हैं। थोड़े कमजोर हैं, बस।
फिर बाथरूम से निकलने पर वीरेदा उसी पुराने मिजाज में।
बोले वे, यार, दिल्ली में बहुत सर्दी है। इसलिए फेसबुक से गैरहाजिर हूं लेकिन पढ़ता सब कुछ।
इसके बाद हम गपियाते रहे।
हिमपात मुक्त नैनीताल, अल्मोड़ा ग्वालदम बागेश्वर बदहाल
कल रात को सुमित को काठगोदाम से गाड़ी पकड़नी थी। उसने फोन नहीं किया तो फिक्र हो गयी। उससे संपर्क नहीं हो पाया। तो आज सुबह सुबह नैनीताल समाचार में फोन लगाया। समाचार प्रभारी महेश दाज्यू से हाल चाल मालूम हुआ।
महेशदाज्यू ने बताया कि राजीवदाज्यू नैनीताल में ही आसन जमाये हुए हैं तो पवन राकेश दुकानदारी में लगा है। नैनीताल में बर्फ की परतें पिघल गयी हैं। लेकिन महेश दाज्यू ने कहा कि नैनीताल में सैलानियों को बहुत ही ज्यादा हिमपात नजर आया तो क्या बाकी पहाड़ के मुकाबले वह कुछ भी नहीं ठैरा।
महेशदाज्यू ने बताया कि बलि (कुमांयूनी में बलि का इस्तेमाल हम कहते हैं के लिए करते हैं, आगे इसे बलि ही पढ़ें। समाचार में हम सूत्रों के मुताबिक के बदले बलि का इस्तेमाल करते रहे हैं और धिक्कार के लिए हड़ि का, दोनों शब्द गिरदा के सौजन्य से) बाकी पहाड़ में तो बहुतै ज्यादा बर्फबारी हुई है।
इसी बीच मुख्यमंत्री हरीश रावत ज्यू ने फरमान जारी कर दिया है कि किसी की ठंड से मौत हुई तो डीएम होंगे जिम्मेदार, जैसे कि डीएम बिना कुछ किये मौत रोक लेने वाले ठैरे।
महेशदाज्यू ने कहा कि पहाड़ में जहां हिल स्टेशन और आर्मी नहीं है, जनजीवन ठप है बलि। बलि अल्मोड़ा से आगे तमाम गांवों और घाटियों में ठंड का कहर है।
हल्द्वानी से किसी ने लिखा है कि आधार अनिवार्य नहीं है। लेकिन आधार का वैकल्पिक प्रयोग के विशेषाधिकार तो उसकी अनिवार्यता के लिए काफी है। कान जैसे भी पकड़ो, कान तो पकड़ा ही जाता है। भारत सरकार कुछ वैसा ही कर रही है बलि।
मनीआर्डर इकानामी
हमें मालूम नहीं कि हमारी इजाएं और भूलियां और बैणियां अब जंगल जाने के हक से वंचित है या नहीं पहाड़ में।
देहरादून में रोमा हैं और वे बेहतर बता सकती हैं कि वनाधिकार के क्या हाल हैं वहां पहाड़ में। आदिवासी इलाकों में तो आदिवासियों के लिए जंगल के सारे हक हकूक छिन गये ठैरे।
बहरहाल लकड़ी बीनने के हालात और जुगाड़ हो या न हो, खरीदनी हो तो आधार की जरूरत हो या न हो, खींसे में तो तेल नून दाना पानी के खर्च के अवलावा लकड़ी कोयले के पैसे भी चाहिए।
मनीआर्डर अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह कितना ठैरा वे तो एक हरीश रावत कह सकते हैं तो दूजे किशोर उपाध्याय जी को मालूम होगा। बलि वे दोनों देहरादून को ही राजधानी नहीं, संपूर्ण हिमालय समझ रहे होंगे। संपूर्ण उत्तराखंड तो बीजापुर गेस्टहाउस है।
महेश दाज्यू को ग्वालदम और बागेश्वरे के हालात मालूम हैं और अल्मोड़ा के गांवों के बारे में भी पता है।
फोकस में तीर्थस्थल या पर्यटनस्थल, बस
कुमांयू गढ़वाल से मीडिया में तीर्थस्थलों और पर्यटनस्थलों के अलावा फोकस कहीं बनाया नहीं है।
केदार जलप्रलय के वक्त फिर भी बीबीसी हिंदी की खबरें थीं लेकिन वे लगता हैं कि पेशावर में कुछ ज्यादा व्यस्त हो गये ठैरे।
राजेश जोशी और सलमान रवि बड़े लोग ठैरे,उन्हें फोन खटखटाने की हिम्मत नहीं हुई।
हमारे पुराने अखबार अमरउजाला में अतुल माहेश्वरी नहीं हैं अब। राजुल भइया हैं, जो हमें बेहद प्रिय रहे हैं। अब वहां यशवंत व्यास और हमारे मेरठ जमाने के एक मित्र विनोद अग्निहोत्री का बसेरा है।
विनोद जी पत्रकार बिरादरी में बहुतै सज्जन हैं जैसे अपने मनोज मिश्र। वे भी मेरठ में हुआ करते थे। हम तब जागरण में थे।
गपशप के लिए कल विनोद जी को फोन लगाया तो बोले, मीटिंग में हूं। कहा कि फोन करता हूं बाद में।
उनसे भी बात हो जाये तो पहाड़ के हालात का अंदाजा हो।
मारे डर के पिर फोन नहीं लगाया कि कहीं संजीव भाई की तरह रचना उचना वगैरह छापने का जुगाड़ न समझ बैठे या धीरेंद्र अस्थाना की तरह पहचानने से ही इंकार न कर दें।
तो भइये, जो जहां हों, कुछ खबर लगी हो तो हम तक जरूर कुशल क्षेम पहुंचा दें।
O- पलाश विश्वास

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