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सरकारी आतंक के खिलाफ वो 121 दिन

22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने लगातार एक धरना हुआ। धरना आयोजित करने वालों की मांग थी कि मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी की जाए। स्वतंत्र पत्रकार अनिल यादव उस धरने की व्याख्या करते हुए सरकारी आतंक की परतें उघाड़ रहे हैं। यह आलेख हमारी सहयोगी पत्रिका लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
‘मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए धरना’ लिखा हुआ रिहाई मंच के काले रंग के बैनर, जिस पर दाढ़ी-टोपी वाले एक शख्स की फोटो लगी थी, को हर उस शख्स ने देखा होगा, जो 22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने स्थित

धरना स्थल से गुजरा होगा। यूपी ही नहीं देश के इतिहास में आतंकवाद के नाम पर मारे गए किसी बेगुनाह के न्याय के लिए 121 दिन तक चलने वाला यह सबसे बड़ा अनिश्चित कालीन धरना था।
    18 मई 2013 को शाम में यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए सिलसिलेवार धमाकों के आरोपी मौलाना खालिद मुजाहिद की फैजाबाद में पेशी के बाद लखनऊ जेल लाते वक्त हत्या कर दी गई है। पूरे प्रदेश में धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। क्योंकि खालिद मुजाहिद वह शख्स थे, जिनकी गिरफ्तारी को आर.डी. निमेष जाँच आयोग ने संदिग्ध माना है और उनको आतंकवाद के आरोप में फर्जी फँसाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक की माँग की है। निमेष आयोग आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी को जाँचने वाला पहला आयोग था, जिसकी रिपोर्ट सरकार ने दबा रखी थी, जिसको रिहाई मंच ने अंदरखाने से प्राप्तकर जनहित में सार्वजनिक कर दिया था।
यूपी की इंसाफ पसन्द अवाम के लिए गहरा झटका था कि जिस बेगुनाह को न्याय दिलाने के लिए उन्होंने 2007-2008 में आजमगढ़-जौनपुर जैसे दूर दराज के जनपदों से लेकर राजधानी लखनऊ तक में विरोध प्रदर्शनों के बल पर तत्कालीन मायावती सरकार को आरडी निमेष जाँच आयोग गठन करने पर मजबूर किया, उसके कहने के बाद कि खालिद निर्दोष है, यूपी सरकार ने उसे बरी नहीं किया। जिससे हौसला पाए पुलिस व आई.बी. अधिकारियों ने खालिद की हत्या करवा दी। 19 मई 2013 को जिस खालिद मुजाहिद को आतंकवादी कहा गया था, के जनाजे में 60-70 हजार के हुजूम के नारों ने तय कर दिया कि आखिर आतंकी कौन है?
यूपी सरकार ने इस आपाधापी में मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की सी.बी.आई. जाँच कराने की बात कह आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। पर सरकार और उसका तंत्र यह नहीं भाँप पाया कि इंसाफ पसन्द अवाम ने अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर लिया है और इसी संकल्प के साथ शुरू हुआ खालिद के इंसाफ के लिए रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना।
    121 दिन यानी 4 महीना 1 दिन तक चलने वाले धरने के पहले दिन 22 मई को जब उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और लू भरी आधियाँ चल रही थी उस वक्त किसी के लिए यह भाँपना मुश्किल था कि यह धरना कितने दिनों चलेगा। पर आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाए गए लोगों के परिजनों, उनके गाँवों, कस्बों, यूपी के विभिन्न शहरों व देश के विभिन्न प्रदेशों के लोगों के इंसाफ लेने के जज्बे ने इसे मजबूती दी। शुरुआती दो महीने तक 24-24 व उसके बाद 48-48 घंटों की भूख हड़ताल का दौर शुरू हुआ। जिसमें परिजन, मानवाधिकार व राजनैतिक संगठनों के नेता, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मियों व आम अवाम ने भूख हड़ताल की लंबी श्रृंखला बना डाली। ……….जारी….. आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें …..

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खालिद सिर्फ एक पीड़ित का नाम नहीं था, बल्कि गिरफ्तारी के बाद से वह विरोध प्रदर्शनों की आवाज बन गया था। वह आवाज, जिससे आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से मुस्लिम युवाओं को उठाने वाली एटीएस, एसटीएफ ही नहीं, खुफिया एजेंसियाँ भी भय खाती थीं। 12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर 2007 को मडि़याहूं, जौनपुर से खालिद मुजाहिद को यूपी एसटीएफ ने अगवा करके 22 दिसंबर 2007 को फर्जी तरीके से बाराबंकी से विस्फोटकों के साथ गिरफ्तारी का दावा किया था। लेकिन यह दावा शुरू से ही कटघरे में आ गया क्योंकि इन दोनों को अगवा किए जाते वक्त कई लोगों ने देखा था। लिहाजा उनकी फर्जी गिरफ्तारी के साथ ही आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के आंदोलन के प्रतीक भी तारिक-खालिद बन गए।

यूपी की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद बार एसोसिएशनों ने फतवा जारी कर दिया कि आतंक के आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ा जाएगा और न ही लड़ने दिया जाएगा। ऐसे में लखनऊ के अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब सबसे पहले सामने आए तो वहीं बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन और फैजाबाद में एडवोकेट जमाल ने आतंक के आरोपियों के मुकदमे की वकालत की। सितंबर 2008 में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद जो सिलसिला आजमगढ़ समेत देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तारियों का शुरू हआ, उसके साथ ही पूरे देश में एक सिलसिलेवार आवाज बेगुनाहों की रिहाई के लिए भी उठने लगी।
उसी सिलसिले से पैदा हुए आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के लिए रिहाई मंच ने एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तय की। जिसे हम इसके शुरुआती बयानों में देख सकते हैं कि अब किसी कतील सिद्दीकी को पुणे की यर्वदा जेल में हत्या, किसी इशरत की फर्जी मुठभेड़ में हत्या या फिर ऐसे तमाम बेगुनाहों की हत्याओं का जो सिलसिला खालिद तक पहुँचा, न सिर्फ उसे हम रोकेंगे बल्कि एक कड़ा संदेश आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने वालों को देंगे, कि जेलें बेगुनाहों के लिए नहीं, गुनहगारों के लिए हैं।
    इन स्थितियों को भाँपकर 4 जून 2013 को यूपी सरकार के कैबिनेट ने आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार लिया। आंदोलन के वेग को इससे समझा जा सकता है कि चाहें यूपी की बहुचर्चित हाशिमपुरा, मलियाना सांप्रदायिक हिंसा हो या फिर मुरादाबाद, कानपुर, बिजनौर दंगों की जाँच कमीशन की रिपोर्टें कई दशकों से सरकारी तहखानों में धूल फाँक रही हैं, वहीं निमेष आयोग की रिपोर्ट को एक साल के भीतर स्वीकारा गया, जिसमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
बहरहाल, रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सपा सरकार ने सोचा कि यह धरना खत्म हो जाएगा। सरकार ने उन मुस्लिम उलेमाओं को फिर से सक्रिय किया जिन्होंने ……….जारी….. आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें …..

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इसके पहले खालिद के घर जाकर सरकार की तरफ से दिए गए 6 लाख रुपए लेने का दबाव बनाया, जिसे खालिद के परिजनों ने नकार दिया था। वहीं खालिद के इंसाफ की लड़ाई अब सिर्फ यूपी विधानसभा ही नहीं, बल्कि दो-दो बार जेएनयू छात्रसंघ व अन्य छात्र संगठनों, युवा संगठनों व अन्य प्रदर्शन कारियों द्वारा दिल्ली में यूपी भवन को घेरने तक पहुँच गया था, ने पूरे देश में चल रहे विभिन्न आंदालनों को भी आकर्षित किया। जिन्होंने एक स्वर में रिहाई मंच की आवाज में आवाज मिलाई और सपा सरकार पर सवाल उठाया कि जब आर.डी. निमेष रिपोर्ट को सरकार ने स्वीकार कर लिया है, यानी उसे सही मान लिया है तो फिर दोषी पुलिस अधिकारियों, जिन्होंने अपने को बचाने के लिए खालिद मुजाहिद की हत्या करवा दी, को सरकार गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है।
    मौलाना खालिद की हत्या पर दर्ज एफ.आई.आर. बहुत अहम था। जिसमें हत्या के आरोपियों के बतौर पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल,

मनोज कुमार झा समेत पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ ही आईबी अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ, क्योंकि खालिद को फंसाने का पूरा झूठा षड्यंत्र आई.बी. ने रचा था। इसलिए प्रदर्शनकारियों के निशाने पर खुफिया एजेंसियाँ प्रमुखता से थीं।
रिहाई मंच के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता व जीत इसी बात की है कि इसने आई.बी. समेत खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की आपराधिक व देशद्रोही भूमिका को बहस के केन्द्र में लाया है। इसे धरने के दौरान तख्तियों पर लिखे उन वाक्यों से समझ सकते हैं कि ‘निमेष आयोग से खतरा, आखिर किसको’। प्रदर्शनकारियों के हाथों में आरोपी पुलिस वालों के नाम लिखी वो तख्तियाँ हर वक्त नजर आती थीं, जिन पर उनके गिरफ्तारी की माँग दर्ज थी। जिससे बौखलाए पूर्व डी.जी.पी. के समर्थक व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने रिहाई मंच के धरने की मांगों के खिलाफ भी कई बार जी.पी.ओ. लखनऊ पर धरने दिए।
अखिलेश सरकार ने यह आश्वासन दिया कि मानसून सत्र में निमेश कमीशन पर कार्रवाई रिपोर्ट लाई जाएगी। पर लगातार सरकार के झूठे वादे जो बेगुनाहों की मौत की वजह तक बन गए, पर अब किसी प्रकार का भरोसा नहीं रह गया था। क्योंकि सपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को वह रिहा करेगी, पर सत्ता में आने के बाद वह वादे से मुकर गई।
ऐसे में रिहाई मंच ने तय किया कि जब तक सरकार कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाती धरना चलता रहेगा। 20 जून को धरने के तीस दिन होने पर यह धरना राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में इस मुद्दे पर होने वाले सबसे बड़े धरने के रूप में आया। धरने का विश्लेषण करते हुए कई समाचार पत्रों ने इसके तीस दिन होने पर परिशिष्ट भी निकाला। धरने में देश के विभिन्न हिस्सों से शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने ……….जारी….. आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें …..

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इसे और सशक्त प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित किया। दिशा छात्र संगठन का सांस्कृतिक दस्ता हो या फिर जेएनयू के आरडीएफ द्वारा ‘बाटला हाउस’ नाटक का मंचन, ऐसे कई मौके आए जब लखनऊ शहर व बाहर की एक बड़ी बौद्धिक जमात समर्थन में आई। जेएनयू स्टूडेंट यूनियन समेत देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न छात्र, राजनैतिक मानवाधिकार संगठन भी समर्थन में लखनऊ पहुँचे। चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्देशक अनुशा रिजवी, साहित्यकार नूर जहीर समेत विभिन्न शख्सियतें भी समर्थन में धरने में शामिल हुईं।

मानसून आ गया था, पर धरने ने यूपी की सियासत का ताप गर्म कर दिया था। धरने के 50वें दिन इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ समेत गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले जन संधर्ष मंच और प्रख्यात लोकतांत्रिक अधिकारवादी ट्रेड यूनियन नेता मुकुल सिन्हा के सहयोगी अधिवक्ता शमशाद पठान गुजरात से तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया और हस्तक्षेप के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय भी शामिल हुए। धरने के समर्थन में माकपा सांसद मोहम्मद सलीम, माकपा नेता व पूर्व सांसद सुभाषिनी अली, पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव, अनहद की शबनम हाशमी भी आईं।
उधर सरकार मानसून सत्र बुलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वह अपने वादे से पीछे हटने की फिराक में थी। 15 जुलाई को धरने के समर्थन में 55वें दिन पहुँचकर सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारे देश में आईबी, सेक्योरिटी एजेंसी, एटीएस के लोग बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं। वे आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। हमारे पास इस बात के उदाहरण हैं। इस खतरनाक माहौल में यह जरूरी है कि इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। उनकी देख-रेख के लिए संसदीय कमेटियाँ बनाई जाएँ। उन्हें गृह मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लगातार धरने का बढ़ता समर्थन, वह भी रमजान के महीने में, जब मुस्लिम समुदाय धार्मिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है, सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा था। क्योंकि सरकारी तंत्र यही प्रचार कर रहा था कि धरना मुसलमान चला रहे हैं पर वास्तविकता बिल्कुल इसके उलट थी। जो रमजान के महीने ने प्रमाणित कर दिया।
रमजान के महीने में जब सामूहिक दुआ का आयोजन धरने के 60 वें दिन होने वाला था, उसके ठीक दो दिनों पहले सरकार द्वारा रिहाई मंच के मंच को उखाड़ने की बौखलाहट ने साफ कर दिया कि सरकार नीतिगत स्तर पर बढ़ती गोलबंदी से भयभीत थी। लेकिन सरकार के इस लोकतंत्रविरोधी रवैये ने लोगों के हौसले को और बढ़ा दिया और जैसे ही यह खबर फैली आंदोलन के समर्थक भारी संख्या में धरना स्थल पर पहुँच गए और भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच ही सभा आयोजित हुई। वहीं धरने के दौरान दो बार सामूहिक इफ्तार का भी आयोजन हुआ, जहाँ आंदोलन के समर्थक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुँचे। जिन्होंने खुद अपने हाथों से धरनास्थल पर फैली गंदगी जिसे पुलिस के दबाव में नगर निगम के सफाईकर्मियों ने साफ करने से मना कर दिया था, को खुद अपने हाथों में झाड़ू लेकर साफ किया और नमाज पढ़ सकने लायक बनाया। सबसे अहम कि गंदगी साफ करने वालों में शहर के तमाम हकपसंद उलेमा और बुजुर्गवार लोग शामिल थे। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकारी इफ्तार के आयोजन के जरिए इस मसले पर मुसलमानों को गुमराह करने की ‘इफ्तार पॉलिटिक्स’ विफल हो गई क्योंकि ……….जारी….. आगे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें …..

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आम अवाम ने रिहाई मंच के इफ्तार को सरकारपरस्त मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं के इफ्तार के समानांतर हकपसंद लोगों का इफ्तार माना।
22 जुलाई को सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या धरने के समर्थन में पहुँचे और आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन टेकन रिपोर्ट यूपी सरकार से लाने को कहते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं जहाँ बेगुनाह जेलों में और गुनहगारों का सरकार संरक्षण कर रही है। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त का दिन इस धरने का एक खास दिन रहा। जब रिहाई मंच ने तिरंगा फहराया और वहीं पर ‘ जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं ’ विषय पर जनसुनवाई किया। जिसमें आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के परिजनों खास कर अक्षरधाम हमले के आरोप में फांसी की सजा पाए बरेली के चाँद खान की नग्मा और उनके बच्चे, संकटमोचन कांड के आरोपी वलीउल्लाह के ससुर के अलावा कोसी कलाँ, मथुरा, अस्थान, प्रतापगढ़, फैजाबाद, परसपुर, गोंडा के साम्प्रदायिक हिंसा से पीड़ित लोग भी शामिल हुए। धरने के 100वें दिन यूपी विधानसभा पर रिहाई मंच ने हजारों लोगों का एक बड़ा विधान सभा चेतावनी मार्च निकालकर संदेश दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे जाएगी तो अवाम सड़कों पर आ जाएगी।
इस मार्च में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गताडे, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान आदि शामिल हुए। जहाँ सरकार मानूसन सत्र से भाग रही थी, वहीं प्रदेश में मानसून सत्र बुलाकर निमेश कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट लाने की माँग को लेकर पत्र लिखने का अभियान शुरू हुआ। अन्ततः मानसून सत्र बुलाने की अंतिम समय सीमा जब खत्म होने लगी, तो हार मानकर सरकार को 16 सितंबर को सत्र बुलाना पड़ा। 15 सितंबर की शाम रिहाई मंच के तत्वावधान में हजारों सामाजिक, राजनैतिक व मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यूपी विधानसभा पर मशाल मार्च निकालकर सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने वादे कोे अमल में लाए। 16 सितंबर को सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जिसने साफ कर दिया कि पुलिस और आईबी एक पॉलिसी के तहत मुस्लिमों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाती है।
अब यह बात जुबानी नहीं रही, बल्कि निमेष कमीशन इसका एक प्रमाणित दस्तावेज, जनता के बीच आ गया था। सपा सरकार अपने वादे से फिर पीछे हट गई। उसने उन दोषी पुलिस व आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई जिन्होंन

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