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सरकार की भेदभाव पूर्ण प्राथमिकताओं का विस्तार है परमाणु उत्तरदायित्व अधिनियम- प्रशांत भूषण

टीईपीसीओ की फुकुशिमा त्रासदी के तीन साल पूरे होने पर परमाणु विरोधी कार्यकर्ताओं व ग्रीनपीस ने मजबूत सुरक्षा इंतजाम करने व असीमित परमाणु दायित्‍व तय करने की माँग की, क्षेत्र की दर्द भरी दास्तानों के साथ लौटे कार्यकर्ताओं ने उठाये सवाल
नई दिल्ली, 10 मार्च, 2014:  प्रमुख परमाणु विरोधी कार्यकर्ताओं व ग्रीनपीस ने सरकार के उस कदम की आलोचना की है जिसके तहत सरकार ने कुडनकुलम 3&4 पर रूस के साथ हुये हालिया समझौते में उन प्रावधानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जो आपूर्तिकर्ता की जिम्मेदारी से जुडे हुये थे। फुकुशीमा परमाणु हादसे के तीन साल पूरे होने पर ग्रीनपीस द्वारा आयोजित पत्रकार वार्ता में कार्यकर्ताओं ने फुकुशिमा से लौटकर अपने अनुभवों के बारे में भी बताया। पत्रकार वार्ता में प्रख्यात वकील एवं आप नेता प्रशांत भूषण ने भी शिरकत की।
11 मार्च, 2011 को सुनामी के बाद आये 9 तीव्रता वाले भूकंप से दुनिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित परमाणु हादसा हो गया। इस हादसे की वजह से 1,60,000 से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा तथा रेडियो एक्टिव किरणों के प्रदूषण से कई शहर प्रदूषित हो गये।
फुकुशिमा परमाणु हादसे के तीन साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील व सुप्रीम कोर्ट में परमाणु उत्तरदायित्व केस की पैरवी कर रहे प्रशांत भूषण ने कहा, “दुर्भाग्य से वर्तमान सरकार ने परमाणु उत्तरदायित्व अधिनियम को कभी भी जनहित सुरक्षा के महत्वपूर्ण हथियार के रूप में नहीं देखा। इस बिल के बनने के वक्त से ही सरकार इसे निजी कंपनियों के हितों में अड़चन डालने वाला कानून समझती रही और इसको नजरअंदाज करने की कोशिश करती रही ताकि बाजारू ताकतें नाराज न हो जायें। जहां तक हमने इसके प्रावधानों व हाल में हुये यूनिट 3&4 के समझौतों पर गौर किया तो यही पाया कि यह मात्र सरकार की भेदभाव पूर्ण प्राथमिकताओं का विस्तार है।”
ग्रीनपीस ने फुकुशिमा के खतरनाक हालात का अध्ययन करने के लिये वहाँ एक प्रतिनिधि मंडल भेजा जिसमें पोलैंड, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण कोरिया व भारत के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। भारत की तरफ से प्रमुख परमाणु विरोधी कार्यकर्ता जी. सुंदर राजन, सत्यजीत चव्हाण व ग्रीनपीस अभियान कर्ता होजेफा मर्चेन्ट ने फुकुशीमा की यात्रा की और वहाँ परमाणु हादसे के शिकार हुये लोगों से मुलाकात की। इस हादसे से उनकी जिन्दगी और पूरा इलाका किस तरह से तबाह हुआ, यह समझने का प्रयास किया।
चेन्नई निवासी जी. सुंदर राजन ने कहा, “उत्तरदायित्व तब तक केवल कोरी परिकल्पना है, जब तक उसे त्रासदी के बाद उपजे हालात में क्रियान्वित नहीं किया जाता। दुर्भाग्य से हमने जापान में हादसे के बाद वाले हालात देखे। प्रदूषित इलाके में घूमने व हादसे के शिकार तमाम पीडितों से मिलने के बाद जब मैं  फुकुशीमा से लौटा तो मुझे सबसे पहले उत्तरदायित्व तंत्र का अन्याय ही दिखा। हर तरफ नाभिकीय उद्योग को अनुचित विशेषाधिकारों से नवाजा जा रहा था। क्या जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) को मार्क वन रिएक्टर के लिये जिम्मेदार ठहराया गया, जो जापान को सप्लाई की जा रही संरचनात्मक विन्यास व रिएक्टर के डिजाइन से खुद संतुष्ट नहीं था।”
ग्रीनपीस अभियानकर्ता होजेफा मर्चेन्ट ने कहा, “ यह कथन पूरी तरह ठोस तथ्यों पर आधारित है कि फुकुशिमा दुर्घटना के लिये जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) जिम्मेदार है। हादसे के लिये दोषी मानते हुये इस साल जनवरी में जनरल इलेक्ट्रिक, तोशीबा और हितैची के खिलाफ जापान में एक मुकदमा दर्ज किया गया। यह केस पूरी दुनिया में उत्तरदायित्व कानूनों के लिये एक नजीर बन सकता है। नाभिकीय उद्योग को जो विशेषाधिकार दिये जा रहे हैं, उनको न केवल रोकने की जरूरत है बल्कि इन उद्योगों को अपने प्रदर्शन के लिये जिम्मेदार ठहराने की भी आवश्यकता है।”
महाराष्ट्र के कार्यकर्ता सत्यजीत चव्हाण के अनुसार, “नाभिकीय आपूर्तिकर्ताओं को उनकी गलतियों के लिये मुआवजा देने के लिये जिम्मेदार बनाने से न केवल हादसे में गंभीर रूप से शिकार हुये लोगों को ज्यादा लाभ होता बल्कि नाभिकीय आपूर्ति श्रंखला से जुडी कंपनियों के लिये असफलता को रोकने के लिये एक सबक भी होता। इससे उनकी जिम्मेदारी व पारदर्शिता भी बढती। सरकार को इतना अदूरदर्शिता का परिचय नहीं देना चाहिए कि वह विदेशी कंपनियों को कानूनी शिकंजे में फंसने से बचाने में मददगार बन जाये। चाहे यह कुडनकुलम में रशियन कंपनी का मामला हो या फिर जैतपुर में फ्रांस की कंपनी का मामला हो।”
 पिछले तीन साल में 1,60,000 से अधिक लोगों को विस्थापित किया जा चुका है। विस्थापन के तनाव में 1600 लोगों की मौत (1) होने की खबर है और सफाई व मुआवजे में करदाताओं की करीब 250 बिलियन डालर की रकम खर्च हो चुकी है। (2) फुकुशीमा दाईची न्युक्लियर प्लांट से अब भी रेडियो एक्टिव तत्वों का रिसाव हो रहा है। इसे रोका नहीं जा सका है। फुकुशीमा अध्ययन टूर 15 फरवरी, 2014 को शुरू हुआ और 21 फरवरी, 2014 को खत्म हुआ।

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