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सरकार कैसे हड़पती है आदिवासियों की जमीन

How the government steals tribal land

आकार पटेल

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल का महत्वपूर्ण लेख “How the government steals tribal land” रेडिफ.कॉम पर प्रकाशित हुआ है। उनके लेख का हिंदी अनुवाद रोहित कुमार ने किया है। रोहित कुमार आईआईएमसी के छात्र हैं।

हम में से कौन अपना फ्लैट विकास के लिए दे सकता है ?’

‘हम इसके लिए दूसरों पर दबाव डालते हैं, जो न चाहते हुए भी हमारी जगह हर कुर्बानी देते हैं क्योंकि वें कमजोर हैं और तब हम दुविधा में होते हैं जब राज्य के खिलाफ हिंसा होती है।’

10 साल पहले, 2006 में लता मंगेशकर ने कहा था कि अगर उनके मुम्बई के पेद्दार रोड स्थित बंगले के सामने फ्लाईओवर बनाया जाता है तो वो भारत छोड़ देंगी। पहले उन्होंने कहा कि इससे उनकी आवाज पर प्रभाव पड़ेगा। बाद में कहा कि अगर रोड पर खुदाई होती है तो कई घरों की नींव हिल जाएंगी।

बेशक वो फ्लाईओवर नहीं बनाया गया।

इस हफ्ते मैंने भारत में कोयला खनन को लेकर कुछ सीखा जिसे मैंने सोचा कि जरूर आपके साथ साझा करूँ। मैं आपको एक या दो बात बताना चाहूँगा कि हम कितनी ईमानदारी से विकास के बड़े प्रोजेक्ट पर बढ़ रहे हैं।

यह सामने आया है एक रिपोर्ट से जिस पर मेरी सहकर्मी अरुणा चंद्रशेखर काम कर रही थीं। सबसे पहले हम उन कानूनों को देखेंगे जो खनन को नियंत्रित करती हैं, साथ ही भारतीय नागरिकों की संपत्ति की सुरक्षा और अधिकार की बात करती है।

उचित मुआवजा का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून 2014 में आया। इसके मुताबिक पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण की स्थिति में प्रभावित परिवारों की 70 फीसदी सहमति अनिवार्य है। वहीं प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए यह 80 फीसदी है।

ये मुझे वाजिब लगीं। साथ ही एक प्रावधान यह भी है कि अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहण से पहले संबंधित ग्राम सभा की पूर्व सहमति की अनिवार्य है।

साथ ही एक प्रावधान सामाजिक प्रभाव के मूल्यांकन की है। इसका मतलब स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा प्रभावित समुदायों के साथ परामर्श कर के किसी प्रोजेक्ट के लगने के बाद लोगों की जमीन और आजीविका पर प्रभाव, उसके आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक नतीजे का अध्ययन करना होगा।

अगर आप सोचते हैं यह अच्छा है तो आपको यह जानना चाहिए कि यह कानून उन जमीनों पर लागू नहीं होता जिसे कोयला खनन के लिए लिया गया है। जमीन मालिकों के लिए कोई परामर्श नहीं है, जमीन लेने के पहले उनकी सहमति की जरुरत भी नहीं है और तो और प्रभाव के मूल्यांकन का तो कोई सवाल ही नहीं है।

पाठक को यह जानने में रूचि होगी। खासकर लता मंगेशकर के आपत्ति पढ़ने के बाद एक ऐसा छोटा पहलू जिस पर अरुणा चन्द्रशेखर ने गौर किया। खनन वाले क्षेत्रों में स्थित स्कूलों को बड़े विस्फोटों के कारण शाम 3 से 4 बजे तक बंद रखा जाता है क्योंकि इससे स्कूलों की इमारत हिलने लगती हैं।

अब आते हैं अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों से जुड़े कानून पर। यह कानून जंगल में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को जमीन और अन्य संसाधनों का प्रथागत अधिकार देता है।

‘इस समुदाय के सदस्य जंगल की जमीन पर व्यक्तिगत अधिकार का दावा कर सकते हैं जिस पर वे निर्भर हैं और जिसे उन्होंने खेती योग्य बनाया है। साथ ही सामूहिक संपत्ति संसाधनों जिसमें समुदाय और ग्रामीण जंगलों, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों और जल निकायों पर समुदायें अपना अधिकार दायर कर सकती हैं।’

कानून कहता है कि जंगल के संसाधनों पर किसका अधिकार हो, यह फैसला करने में ग्राम सभाओं की अहम भूमिका होती है।

सुनने में अच्छा लगता है न ? दुर्भाग्यवश जनजातीय मामला मंत्रालय खुद पाता है कि यह कानून सबसे अधिक सरकार द्वारा नजरअंदाज किया जाता है।

पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज एक्ट (पेसा) जमीन अधिग्रहण को नियंत्रित करने वाला एक और कानून है। इसके मुताबिक विकास परियोजनाओं के लिए जनजातिय क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहण के पहले पंचायत से परामर्श जरुरी है। साथ ही ऐसे परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास को लेकर भी पूर्व में परामर्श जरुरी है। यह कानून भी सरकार के द्वारा करीब-करीब नजरअंदाज ही किया गया है।

अब एक पर्यावरण (सुरक्षा) कानून है। इसके मुताबिक एक निश्चित आकार के सभी परियोजनाओं को स्थानीय समुदायों के साथ जघन विचार-विमर्श के बाद पर्यावरण मंजूरी दी जाती है, जिससे वे प्रभावित हो सकते हैं।

अरुणा चंद्रशेखर कहती हैं कि इस कानून के अनुसार सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन लगभग कभी नहीं किया गया। इसकी एक वजह यह है कि सरकार ये जरुरी नहीं समझती कि मूल्यांकन की सम्पूर्णता और सत्यता का आकलन किया जाए।

एक कानून जिसका सरकार अच्छी तरह से अनुपालन करती है वो है: द कोल बीयरिंग एरियाज एक्ट। सरकार इस कानून के जरिए जमीन हथियाती है।

इस कानून के अंतर्गत सरकार राजपत्र में एक आदेश प्रकाशित करती है (आपने आखिरी बार कब एक सरकारी राजपत्र पढ़ा था?)। और फिर, जब तक लिखित आपत्तियां कम से कम 30 दिनों के अंदर दर्ज की जाती हैं, तब तक प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिससे जमीन ‘पूर्ण रूप से सरकार को अधिकृत हो जाती है ( सभी बाधाओं से मुक्त होकर)।’

कोल इंडिया लिमिटेड (जो भारत के करीब दो-तिहाई खनन पर नियंत्रण रखता है) की नीतियों को देखने के बाद एक संसदीय समिति कहती है कि जनजातीय समुदायों की मुश्किल से ही किसी सरकारी राजपत्र तक पहुँच है। जबकि वे देख सकते हैं कि उनकी जमीनें सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित की जा रही हैं।

मैं कहूँगा कि वास्तव में यह काफी जानबूझकर किया जा रहा है। इस देश का औद्योगिक विकास ( शनिवार 6 फरवरी को यह रिपोर्ट आया था कि अडानी झारखंड में 2 बिलियन डॉलर के कोयले का पॉवर प्लांट बना रहा है) आदिवासियों की जमीन चुराकर की जा रही है और हम मध्यम वर्ग इस चोरी में बराबर के हिस्सेदार हैं।

हम में से कौन अपना फ्लैट विकास के लिए दे सकता है ?’

हमारा एलीट क्लास बहुत जरुरी फ्लाईओवर को बनने से रुकवा सकता है। ‘हम इसके लिए दूसरों पर दबाव डालते हैं, जो न चाहते हुए भी हमारी जगह हर कुर्बानी देते हैं क्योंकि वें कमजोर हैं और तब हम दुविधा में होते हैं जब राज्य के खिलाफ हिंसा होती है।’

जमीनों की इस खुलेआम लूट की सच्चाई जानने के बाद ‘माओवादी’ जैसे शब्द को यह एक बहुत ही अलग अर्थ देता है और साथ ही ‘विकास’ को भी।

आकार पटेल, कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया

(रेडिफ न्यूज से साभार)

अनुवाद- रोहित कुमार

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