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सर कलम कर दो लब आजाद रहेंगे! हिटलर के राजकाज में भी संस्कृतिकर्मी प्रतिरोध के मोर्चे पर लामबंद थे

अछूत रवींद्रनाथ का दलित विमर्श
Out caste Tagore Poetry is all about Universal Brotherhood which makes India the greatest ever Ocean which merges so many streams of Humanity!
आप हमारा गला भले काट दो, सर कलम कर दो लब आजाद रहेंगे! क्योंकि हिटलर के राजकाज में भी जर्मनी के संस्कृतिकर्मी भी प्रतिरोध के मोर्चे पर लामबंद सर कटवाने को तैयार थे। जो भी सर कटवाने को हमारे कारवां में शामिल होने को तैयार हैं, अपने मोर्चे पर उनका स्वागत है। स्वागत है।
पलाश विश्वास

आप हमारा गला भले काट दो, सर कलम कर दो लब आजाद रहेंगे! क्योंकि हिटलर के राजकाज में भी जर्मनी के संस्कृतिकर्मी भी प्रतिरोध के मोर्चे पर लामबंद सर कटवाने को तैयार थे। जो भी सर कटवाने को हमारे कारवां में शामिल होने को तैयार हैं, अपने मोर्चे पर उनका स्वागत है। स्वागत है।
आज मेरे दो दो प्रवचन जारी हुए हैं।
ये प्रवचन देश के धर्मोन्मादी विभाजन और फासीवादी सत्ता के खिलाफ भारतभर के रचनाकर्मियों के अभूतपूर्व प्रतिवाद के समर्थन में हैं तो जो लोग अब भी हाशिये पर खड़े हैं, उनसे इस कारवां में मनुष्य और प्रकृति की रक्षा के लिए लामबंद होने की अपील भी है।
हम तमाम संस्कृतिकर्मियों से फासीवाद के विरोध सत्ता प्रतिष्ठानों के सम्मान और पुरस्कार लौटाकर नरसंहार के धर्मोन्मादी अश्वमेधी महोत्सव का सक्रिय प्रतिरोध करने की गुहार लगा रहे हैं।
हम रवींद्रनाथ, नेताजी, गांधी, अंबेडकर, गौतम बुद्ध को हिंदुत्व का अवतार बनाकर मनुस्मृति शासन जारी रखने के लिए जातियुद्ध और अस्मितायुद्ध के आत्मघाती समय के खिलाफ खड़े हैं ।
रवींद्र साहित्य की आत्मा, अंबेडकर के मिशन, मुक्तबाजारी पागलदौड़ के खिलाफ श्रम के हक में गांधीवाद और नेताजी के फासीवाद विरोधी बहुलता और विविधता के अखंड राष्ट्रवाद और गौतम बुद्ध के पंचशील, उनके धम्म, सत्य और अहिंसा के दर्शन पर सत्तावर्ग के केसरिया विमर्श को मानने से सिरे से इंकार करते हैं और इन महापुरुषों को बौना बना देने के सत्ता समीकरणों को तोड़ना चाहते हैं और आपसे अपील करते हैं कि आप हस्तक्षेप के मोर्चे पर हमारे साथ हों।
हम यह बहस शुरू से चला रहे हैं और आपसे संवाद और हस्तक्षेप की उम्मीद करते हैं। हस्तक्षेप पर आपका स्वागत है।
चूंकि हम मन की बात नहीं कर रहे हैं और हम मनुष्य और प्रकृति, सभ्यता और विरासत, इतिहास और भूगोल, कायनात के तमाम रहमतों, बरकतों और नियामतों के साथ सात मेहनतकशों के हकहकूक, जल जंगल जमीन के अधिकार, नागरिक और मानवाधिकार, समानता और न्याय, नागरिकता व नागरिकों की संप्रभुता और देश और देश के लोकतंत्र के पक्ष में खड़े हैं और जनता के हर मसले और मुद्दे को सुलझाने और जनसुनवाई के साथ सात सबको समान अवसर देने के संकल्प के साथ मैदान में खड़े हैं।
Tagore poetry and his humanitarian philosophy and his musical soul represent the real India with inherent pluralism and Diversity.
In my earlier video I discussed at length the aesthetics of social realism which I inherit from Nabarun Bhattacharya and Akhtarazzuman Ilius. I have been knowing Nabarunda very closely as I was the part of original editorial team of his Bhashabandhan headed by Mahashweta Di. I had no opportunity to know Ilius but I have read his two novels and all of his stories. Both Nabarunda and Ilius addressed the basic problems and challenges faced by Humanity and Nature. Both were fighting against imperialism and fascism as well as feudal set up. Both adopted an accurate methodology for materialist conception of social reality and history. It is the aesthetics of social realism.
Why do I quote Nabarun Bhattacharya so often?

I consider Nabarunda most relevant to arm us in resistance against monopolistic aggression of Fascism! While I consider Ilius the most powerful writer in this geopolitics, greater than my favourite Manto.
What I discussed about Tagore and his poetry, it is in reference to that social realism. To understand my point of view, you have to see why I quote Nabarun Bhattacharya so often!
हमने रवींद्र के दलित विमर्श पर एक पुस्तक लिखी थी करीब दस साल पहले कवि केदारनाथ सिंह के लगातार दबाव में।
उनका आभारी हूं रवींद्र काव्य में समानता और न्याय के तत्वों को बाबासाहेब अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडा के तहत देखने की दृष्टि के लिए।
वह पांडुलिपि अभी प्रकाशक के हवाले है पिछले दस साल से जैसे मेरी दूसरी पांडुलिपियां हैं।
गोमांस सूंघ लेने के कारण रवींद्र के पूर्वजों की एक धारा को इस्लाम अपनाना पड़ा और सामाजिक बहिष्कार की वजह से दूसरी धारा को पूर्वी बंगाल में दलितों में शामिल होना पड़ा।
रवींद्र परिवार बंगाल आ गये और उनके दादा प्रिंस द्वारका नाथ ठाकुर को फोर्ट विलियम का ठेका मिल गया तो उनके पिता महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर ब्रहम समाज के संस्थापक थे और नवजागरण के मसीहा भी। वे जमींदर भी थे पूर्वी बंगाल में। फिरभी अछूत थे।
फिरभी हिंदू विशुद्धता ने गोमांसजनित म्लेच्छ स्पर्श के लिए उस परिवार को अछूत ही माना।
ब्रहम समाज के दर्शन में इस्लामी और ईसाइयत के सिद्धांत के समावेश से भी कुलीन हिंदुत्व ने विशुद्धता के सिद्धांत के तहत उन्हें नोबेल पुरस्कार पाने के पहले और बाद में भी अस्पृश्य ही माना।
उन्हें पुरी के मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया और यह पीड़ा को नैवेद्य से लेकर चंडालिका और गीतांजलि की आत्मा है।
वे जल को समानता का आधार मान रहे थे तो जल की विशुद्धता के बहाने रक्त की विशुद्धता के वर्ण विद्वेषी रंगभेदी व्यवस्था के खिलाफ हम उनके रचनाकर्म को अंबेडकरी मिशन से कम महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं, जिसे आलोचना ने कभी स्वीकारा ही नहीं है। हम देश के बंटवारे के लिए विरासत के बंटवारे के खिलाफ हैं।
सच यही है कि आलोचना सत्ता की गोद में खा पीकर अघायी है।
आलोचना का कोई प्रतिरोधी चरित्र नहीं होता और वह हमेशा प्रतिक्रियावादी तत्वों के साथ खड़ी हो जाती है  वैचारिक तेवर और सिद्धांतों, प्रतिमानों, सौंदर्यबोध और व्याकरण के हथियारों से अछूतों और बहुजनों के बहिष्कार के लिए तत्पर।
इसीलिए रवींद्र का विरोध जारी है इस कदर कि सत्ता उन्हें देशद्रोही बना रहीं है।
रवींद्र के कवित्व के प्राथमिक दौर से लेकर धर्मोन्मादी इस मुक्तबाजारी समय में यह सिलसिला इतिहास बदलने का धर्मोन्मादी उद्यम है और अबाध पूंजी प्रवाह भी है।
इसीलिए बार-बार रवींद्र काव्यधारा में बुद्धम् शरण् गच्छामि की गूंज सुनायी पड़ती है।
इसीलिए मेहनतकशों के हकहकूक के लिए उनके स्वर जितने मुखर थे उतने ही मुखर था उनका जिहाद अस्पृश्यता के खिलाफ।
वे नर नारायण की बात कर रहे थे और ईश्वर को उपासनास्थलों की दीवारों में कैद बता रहे थे।
मजा यह है कि उनके जनपक्षधर रचनाकर्म को आध्यात्मिक बताते हुए उनके विश्वदृष्टि, विश्व भ्रातृत्व के उनके दर्शन, न्याय, समता और शांति की उनकी वाणी, गौतम बुद्ध के सत्य और अहिंसा में उनकी आस्था को प्रतिक्रयावादी आलोचना खारिज करती रही है।
अब उन्हें राष्ट्रद्रोही भी साबित करने की मुहिम है।
इन्ही रवींद्रनाथ को पहले अंध राष्ट्रवाद का ईश्वर बना दिया गया तो अब इतिहास विचारधारा और भूगोल को बदलने वाले बहुलता विविधता के खिलाफ हिंदू फासीवाद के झंडेवरदार उन्हें देशद्रोही समझ बता प्रचारित कर रहे हैं जैसे फासीवाद के खिलाफ लड़ रहे नेताजी को फासीवादी बना दिया गया और अंबेडकर को हिंदुत्व का अवतार और गौतम बुद्ध की क्रांति को प्रतिक्रांति से खत्म करने वालों ने उन्हें विष्णु का अवतार बना दिया।
बाबासाहेब के मिशन और जाति उन्मूलन को न समझनेवाले केसरिया हुए बहुजनसमाज को रवींद्र के जीवन दर्शन और उनके कृतित्व के जनपक्षधर पक्ष और खासतौर पर उनका दलित विमर्श समझाना बेहद मुश्किल है।
रवींद्र का साहित्य विविधता और बहुलता की साझा संस्कृति के भारत तीर्थ का संगीत है उससे कहीं ज्यादा वह बहुजन समाज की आकांक्षाओं, उनके संघर्षों का स्वर है। जिसपर हमने गौर किया नहीं।
हमने इस वीडियो में रवींद्र के दलित विमर्श की व्याक्या के लिए अपनी दो अप्रकाशित पुस्तकों रवींद्र का दलित विमर्श और जलगाथा के प्रासंगिक अंशों का पाठ किया है, जो हिंदी में है।
रवींद्र की कविताओं का विश्लेषण भी किया है।
बेहतर हो कि आप दोनों बैठकों को देखें और इससे जनपक्षधर मोर्चे की गोलबंदी तेज होती है तो इनकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग भी करें। बहस तो करें ही।
संस्कृति कर्म गोलबंद हो रहे हैं। यह निर्णायक लड़ाई में हमारी जीत की भविष्यवाणी है।
प्रोफेसर चमनलाल ने भी लौटाया साहित्य अकादमी से मिला अनुवाद पुरस्कार #SahityaAkademiAward
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रचनाधर्म मूलतः मानवीय सृजन है और वह अमानवीय हो ही नहीं सकता। इसलिए दुनियाभर में सृजनकर्मी ही परिवर्तन के कारक बनते हैं और एकाधिकारवादी, साम्राज्यवादी.सामंतवादी मुक्तबाजारी सत्ता के प्रतिरोध का स्वर ही उनके सृजन का स्वर है।
आलोचना मूलतः प्रतिक्रियावादी है और दुनियाभर में प्रतिक्रियावादी सत्तावर्ग के साथ खड़ी होती आलोचना।
यही वजह है जनपक्षधर रचनाकर्म के धारक वाहक रवीद्र,  शरत, प्रेमचंद और मुक्तिबोध को आलोचना खारिज करती रही।
यही वजह है कि फासीवाद और धर्मन्मादी विभाजन के विरुद्ध सिर्फ रचनाकार गोलबंद हो रहे हैं और उनका रचनाकर्म बदलाव के हथियार में तब्दील है।
आलोचना का कोई पक्ष नहीं है।
निरपेक्षता का छद्म हमेशा वर्चस्व और एकाधिकार के पक्ष में होता है। हमने आलोचकों की सत्ता राजनीति का खुलासा भी किया है इस वीडियो में तो जल अचल, म्लेच्छ रवींद्रनाथ की जनपक्षधरता को चिन्हित भी किया है, जिस पर अमूमन चर्चा होती नहीं है।
जल को समानता का बुनियादी आधार मानने वाले प्रकृति के चंडालिका बनने की नियति और बौद्धमय भारत में भिक्षु को जलदान की कथा उनकी कविता की आत्मा है तो हे मोर दुर्भागा देश, जादेर करेछो अपमान , अपमाने होते हबे ताहादेर समान भुखमरी के शिकार बंगाल और 15 अगस्त से अब भी जारी भारत विभाजन और विस्थापन के शिकार भारतीय जनगण के लिए समानता और न्याय की गुहार है तो अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था के खिलाफ खुला विद्रोह है।
आज फिर हमने हस्तक्षेप की मदद की अपील की है।
कृपया हस्तक्षेप की मदद करें जनपक्षधर विमर्श और जनसुनवाई जारी रखने के लिए।

हस्तक्षेप का अलैक्सा पर अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग 1, 09, 573 और भारत में 11, 280 है।
एक बार फिर हस्तक्षेप के पाठकों,  लेखकों और शुभचिंतकों का आभार।
बिना किसी तकनीकी टोटके,  अपनी शुद्ध मेहनत की कमाई के निवेश से यह स्थान मिलने के लिए हस्तक्षेप के पाठकों,  लेखकों और शुभचिंतकों का आभार प्रकट करना तो बनता ही है।  
…. बड़ी पूँजी और संसाधन झोंक कर भी तमाम लोगों को ये मुकाम नहीं मिलता।
अभी देख रहा था भंवर मेघवंशी जी के हस्तक्षेप पर एक लेख को 30000 से ज्यादा फेसबुक लाइक्स मिले हैं।  शेष नारायण सिंह जी के एक लेख को 12000 से ज्यादा फेसबुक लाइक्स मिले हैं।  5000 से ज्यादा फेसबुक लाइक्स वाले कई दर्जन लेख हैं और 1000 से ज्यादा फेसबुक लाइक्स वाले 500 से ज्यादा लेख हैं।
…. इसके बावजूद हम बाजार में ब्रांड नहीं हैं चूँकि ब्रांड काबिलियत नहीं पूँजी बनाती है।  
“हस्तक्षेप” रोटी नहीं दे सकता है। लिहाजा विकल्प तो तलाशना ही होगा।

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