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सांप्रदायिक हिंसा के दो साल बाद आज भी मुजफ्फरनगर अपने आप में कुढ़ता है

इंसाफ से वंचित मुजफ्फरनगर जहां दो साल बाद भी सरकार फेल
मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के दो साल पूरे होने पर वहां के सामाजिक-राजनैतिक हालात का जायजा लेती रिहाई मंच की संक्षिप्त रिपोर्ट
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा अपनी भयावहता की चरम पर पहुंच चुकी थी। पूरी तरह से प्रायोजित मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक घटना ने मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत समेत आस-पास के जिले के लाखों लोगों को अपने ही जिले में शरणार्थी बना दिया था।
प्रायः यह कहा जाता रहा कि सांप्रदायिक हिंसा शहरी इलाकों की उपज है, आधुनिकता की देन है पर मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा ने इस पर सवाल खड़ा कर दिया है।
भारतीय संविधान में दर्ज पंथनिरपेक्षता निरीह सी दिखाई देती है जब हम हिन्दोस्तान में सांप्रदायिक जेहेनियत पर विचार करना शुरू कर देते हैं। इन बहस-मुबाहिसों के बीच जब हाशिमपुरा जनसंहार के दोषी बरी हो रहे हैं तो दो साल बाद हमें मुजफ्फरनगर को पलट कर जरूर देखना चाहिए कि उन लोगों के क्या हालात हैं जो अपने गांव घरों से दूर राहत कालोनियों में गुजर बसर कर रहे हैं। उन नौजवानों और बच्चों के हालात क्या हैं जो मुल्क का मुस्तकबिल तय करते?
सत्ताईस अगस्त 2013 को मुजफ्फरनगर के जानसठ थाने के कवाल गांव में मोटर साइकिल और साइकिल की टक्कर हुई, जिसके बाद उपजे विवाद में जाट समुदाय के गठवाला खाप के दो युवकों सचिन मलिक और गौरव मलिक ने शाहनवाज कुरैशी की हत्या उसी के मोहल्ले में घुसकर कर दी। जिससे भड़की भीड़ ने सचिन और गौरव को मार डाला। फिर एक बड़ी साजिश के तहत पाकिस्तान के एक पुराने वीडियो को सोशल साइट पर डाल दिया गया और यह प्रचारित किया गया कि यह निर्मम हत्या सचिन और गौरव की है।

बड़ी साजिश इसलिए क्योंकि उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और भाजपा इसकी पृष्ठभूमि में रणनीति तय कर रही थीं।
मसलन, चौरासी कोसी परिक्रमा के लिए अशोक सिंघल ने मुलायम सिंह से राब्ता कायम किया। थोड़ा सा और पहले जाएं तो तस्वीर और साफ हो जाती है। 24 अक्टूबर को फैजाबाद शहर के बीच कानून और व्यवस्था को धता बताकर सत्ताधारी प्रतिनिधियों के बल पर भदरसा, रुदौली समेत शहर की एक ऐतिहासिक मस्जिद में आग लगा दी गई। 1 जून 2011 को मथुरा के कोसीकलां में दो भाईयों को जिंदा जला दिया गया। 22 जुलाई 2011 को समाजवादी पार्टी के कैबिनेट मंत्री रघुराज प्रताप सिंह और उनके पिता उदय प्रताप सिंह के शह पर अस्थान (प्रतापगढ़) में सांप्रदायिक हिंसा को आयोजित किया गया।
इस सारे होम वर्क में भाजपा को समाजवादी पार्टी ने हाथ पकड़कर सांप्रदायिकता का हर्फ लिखने में मदद की। मसलन इन घटनाओं में भाजपा और सपा सरकार की संलिप्तता इन तथ्यों से भी उजागर होती है कि मुजफ्फरनगर कोतवाली में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 1118/2013 पर कोई कार्यवाही नहीं की गई तथा लखनऊ, अमीनाबाद थाने में जेल के अंदर से अपना फेसबुक चलाकर साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने वाले भाजपा विधायक संगीत सोम और सुरेश राणा के खिलाफ रिहाई मंच नेता राजीव यादव द्वारा तहरीर देने के बावजूद मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।
अट्ठाईस अगस्त 2013 को कवाल गांव में सांप्रदायिक हिंसा में मुसलमानों के घरों को लूटने और जलाने का काम शुरू कर दिया गया। साथ ही गठवाला खाप के गांवों में 5 सितंबर 2013 को हरिकिशन मलिक ने लिसाड़ गांव में बड़ी पंचायत करके 7 सितंबर को नांगला मंदौड़ में ’बहू बेटी सम्मान बचाओ’ पंचायत में पहुंचने का ऐलान किया। मुजफ्फरनगर और शामली में लगातार हो रही इन पंचायतों में भड़काई जा रही सांप्रदायिकता को हर संभव मदद सरकार की ओर से दी गई।
7 सितंबर 2013 को बड़ी संख्या में हथियारों से लैस सांप्रदायिक तत्वों द्वारा मुसलमानों की दो जगह ’पाकिस्तान या कब्रिस्तान’ जैसे सांप्रदायिक नारों और मुस्लिम इलाके वाले इलाकों में मार पीट, छेड़खानी की गई। इस पंचायत में भाजपा के संगीत सोम, संजीव बालियान, सुरेश राणा समेत भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत, बालियान खाप के चौधरी नरेश टिकैत, गठवाला खाप के हरिकिशन सिंह शामिल हुए और सांप्रदायिक जहर उगला गया। इसके बाद मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर व आसपास के जिलों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई।

राहत कैंपों से राहत कॉलोनियों में बदलता मुजफ्फरनगर-शामली
सांप्रदायिक हिंसा के दो साल बाद आज भी मुजफ्फरनगर अपने आप में कुढ़ता है। इस सांप्रदायिक हिंसा में लाखों लोग अपना घर बार छोड़कर राहत कैंपों में शरण लिए। बनाए गए लगभग 50 राहत कैंप अब कुछ समाजसेवी तंजीमों, राजनीतिक संगठनों की मदद से राहत कालोनियों में बदल चुके हैं। मुजफ्फरनगर जिले की बात करें तो प्रशासन ने मात्र नौ गांवों को सांप्रदायिक हिंसा ग्रस्त माना है, जबकि अकेले मुजफ्फरनगर में यह संख्या अस्सी से ज्यादा है। सांप्रदायिक हिंसा के बाद विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक संगठनों ने राज्य के सोशल वेलफेयर स्टेट की भूमिका को याद दिलाते हुए इस बात की मांग की कि सरकार सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों को राज्य सरकार की आवास योजनाओं के तहत आवास उपलब्ध करवाए जिससे न सिर्फ उनको विद्युत, पानी, सीवर लाइन की समुचित व्यवस्था हो बल्कि उनके लिए शिक्षा, चिकित्सा व राशन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए उनको भटकना न पड़े। पर राज्य सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना न चलाकर न सिर्फ उन्हें मूलभूत सुविधाओं से काटा गया बल्कि देश का नागरिक होने के बावजूद उनके नागरिक अधिकारों को छीनकर शरणार्थी बना दिया गया।
मुआवजे के हालात
राज्य की सफलता का पहला पैगाम यह है कि क्या वह अपने नागरिको को सुरक्षा दे पा रहा है? इस असफलता-सफलता के पैमाने पर राज्य प्रायः फेल पास होता रहता है। पर मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के बाद सपा सरकार अपने सामाजिक सुरक्षा के दायित्व से भाग खड़ी हुई। मुआवजे के लिए सपा सरकार ने पीडि़तों को सुरक्षा देने के बदले हलफनामा लेने लगी कि वह अपनी पुरानी संपत्ति से मालिकाना हक छोड़ दें। तमाम राजनैतिक-सामाजिक संगठनों के विरोध और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा देना शुरू किया। लेकिन मुआवजा देने की पूरी नीति घोर अनियमितताओं में संलिप्त रही है। जौला के बनी कॉलोनी फलाह-ए-आम में रहने वाले मुस्तकीम इसके जीते जागते उदाहरण हैं। मुस्तकीम के पिता की मौत 20 साल पहले हो चुकी है। प्रशासन ने मुस्तकीम को यह कहकर मुआवजा नहीं दिया कि मुआवजा उनके पिता को दिया जा चुका है।

’ठंड से कोई मरता तो साइबेरिया में कोई नहीं बचता’
‘ठंड से कोई नहीं मरता तो साइबेरिया में कोई नहीं बचता’- यह टिप्पणी शामली में 40 से अधिक बच्चों की राहत कैंपों में सर्दी लगने से हुई मौतों के बाद उत्तर प्रदेश के गृह सचिव एके गुप्ता की थी। इन 40 बच्चों में 34 की उम्र 12 वर्ष से कम थी पर मुआवजा के नाम पर इनके परिजनों को कुछ नहीं मिला। केवल मुजफ्फरनगर के 12 परिवारों को यह मुआवजा दिया गया।
’मुआवजे के लिए कैंपों में’
मुआवजे के लिए कैंपों में रहने का दावा सरकार के किसी गैर जिम्मेदार व्यक्ति ने नहीं की थी, बल्कि यह टिप्पणी मुजफ्फरनगर सद्भावना कमेटी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने की थी। यह टिप्पणी गुजरात सांप्रदायिक जनसंहार के समय पर नरेन्द्र मोदी सरकार की टिप्पणी जैसी थी कि ’कैंप बच्चा पैदा करने की जगह हो गए हैं’। इस तरह की सांप्रदायिक जेहेनियत रखने वाली सरकार ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ित लोगों के साथ कहीं भी इंसाफ नहीं किया।
आतंकवाद के अड्डे के बतौर प्रचारित करने की खुफिया विभाग की साजिश
मोदी द्वारा 2002 के मुस्लिम विरोधी जनसंहार में अपनी सरकार की संलिप्तता पर उठ रहे सवालों से निपटने के मोदी के तजुर्बे से सीखते हुए अखिलेश सरकार ने भी गुजरात के राहत शिविरों की तरह ही मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों को आतंकवादियों का अड्डा बताने की कोशिश की। जिसके तहत उन्होंने खुफिया विभाग के जरिए मीडिया द्वारा ऐसी खबरें प्रसारित करवाई कि यहां शरण पाए लोग आतंकवादियों के सम्पर्क में हैं और वे बदले की कार्रवाई के तहत कुछ अतिमहत्वपूर्ण लोगों को मारना चाहते हैं। ठीक जैसा कि मोदी ने गुजरात हिंसा का बदला लेने और उन्हें मारने की योजना बनाने के नाम पर बहुत सारे बेगुनाहों को फर्जी मुठभेड़ों में मरवाकर और अक्षरधाम मंदिर पर हमला करवा कर किया।
क्या हो रहा है… पता नहीं है
हिंसा का एक अपना मनोविज्ञान होता है। अगर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार की बात की जाए तो उसका अपना मनोविज्ञान है। जब किसी समुदाय को नीचा दिखाना होता है तब उसका एक माध्यम सामूहिक बलात्कार भी होता है। मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा में ऐसी घटनाओं की लंबी लिस्ट है। परन्तु सुरक्षा, भय और लोक लाज के कारण मात्र 6 अपराध दर्ज हो पाए। वैसे तो खुद राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी कि सांप्रदायिक हिंसा में पीड़ित ऐसे लोगों का मुकदमा लड़े, पर मुकदमा तो दूर की बात राज्य सरकार उन्हें सुरक्षा देने में भी असफल और बलात्कारियों को संरक्षण देने वाली भूमिका में रही है।
महक डाक्टर बनना चाहती थी
समाजवादी सरकार अरबों रुपए विज्ञापन पर खर्च करके अपने आप को समाजवादी साबित करने पर तुली हुई है। सर्व शिक्षा अभियान से लेकर मिड डे मील, समाजवादी पेंशन से लेकर लोहिया आवास तक के विज्ञापन से सड़क पटे मिलेंगे। लेकिन कांधला के लिसाड़ की रहने वाली 12 साल की महक से मिलने के बाद समाजवादी वादे खाक में मिलते नजर आते हैं। महक पढ़ने में होशियार है डाक्टर बनना चाहती है पर सरकारी स्कूल में दाखिला नहीं मिल सकता, क्योंकि उसके पास फीस नहीं है। सरकारी स्कूल में फीस? शामली और मुजफ्फरनगर में कई ऐसे विद्यालय हैं जो दंगा पीड़ित बच्चों के आने से फीस ले रहे हैं। डाक्टर का ख्वाब देखने वाली महक अब नहीं पढ़ती है।
अभी सुलग रहा है मुजफ्फरनगर
मुजफ्फरनगर सुलग रहा है। अंदर अंदर हर रोज। रोजाना सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का प्रयास किया जा रहा है। कहीं लव जिहाद का हंगामा, कहीं गौ हत्या के नाम पर लोगों की पिटाई हो रही है तो कहीं ट्रेन में फिर से जमातियों की दाढ़ी खींची जा रही है। 2017 के चुनाव करीब हैं। मुजफ्फरनगर-शामली के लोग इस नए इंतखाब से डरे हुए हैं। खैर उत्तर प्रदेश की इंसाफ पसंद आवाम विष्णु सहाय कमीशन रिपोर्ट का इंतजार कर रही है।
कुछ वो जो मुजफ्फरनगर-शामली में आज भी हो रहा है
मुजफ्फरनगर में सब कुछ ठीक नहीं है। सितंबर 2013 के पहले की तरह की घटनाएं फिर से शुरू हो चुकी हैं। मार्च 2015 में जमातियों के साथ ट्रेन में मारपीट की गई। फिर 1 मई 2015 को जमातियों के साथ ट्रेन में मारपीट की गई। उनकी दाढ़ी उखाड़ी गई। इसके बाद जब पीड़ित लोगों ने कांदला में एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की तो प्रशासन ने इन्हें भगा दिया। इसे लेकर कांदला में लोगों ने एक बड़ा प्रदर्शन किया। मीडिया और भाजपा के लोगों ने इस प्रदर्शन को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। मुजफ्फरनगर में ऐसी घटनाओं की एक लंबी लिस्ट है। रोजाना ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। 27 अगस्त को जब सांप्रदायिक हिंसा पीडि़तों ने अपने गांव शाहपुर में जाकर अपना कुछ सामान लेने की कोशिश की तो उनके साथ मारपीट की गई। जून 2015 में शामली में एक विक्षिप्त मुस्लिम युवक को गौ-कशी का झूठा आरोप लगाकर घंटों तक शामली शहर में पीटा गया। जिला प्रशासन ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को बचाने की हर संभव कोशिश की। राजनैतिक और सामाजिक संगठनों के दबाव में उन पर मुकदमा दर्ज करना पड़ा।
-रिहाई मंच कार्यकारी समिति द्वारा जारी
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