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सिंगुर फैसले से स्त्री के नेतृत्व पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी, जनप्रतिबद्धता ही स्त्री अस्मिता है

सिंगुर फैसले से स्त्री के नेतृत्व पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी
तेज होगी जल जंगल जमीन की लड़ाई
जनप्रतिबद्धता ही स्त्री अस्मिता है।
सबिता बिश्वास
बंगाल में दुर्गा महोत्सव की उलटी गिनती शुरु हो चुकी है। महिषासुर वध के मिथक के सच पर विवाद है, लेकिन दस प्रहार धारिणी स्त्रीशक्ति के रूप में पितृसत्ता के खिलाफ दुर्गावतार का तात्पर्य प्रजाजनों के संहार के बजाय उनके हक हकूक की लड़ाई में स्त्री की नेतृत्वकारी निर्णायक भूमिका स्वयंसिद्ध है। दुर्गा तब चित्रांगदा हैं या फिर टैगोर की नंदिनी, जो अंधेरी सुरंग के मुहाने मशाल लेकर खड़ी है मुक्ति मार्ग की दिशा बताने।
अश्वमेधी महावीर अर्जुन करने वाली चित्रांगदा ने पितृसत्ता के मूल्यबोध के तहत आखिर अर्जुन से विवाह कर ली। स्त्री अस्मिता की यह परिणति मातृसत्ता के दुर्गावतार की भी है जिसे महिषमर्दिनी कहा जाता है।

इतिहास के नजरिये से देखे तो दुर्गा और चित्रांगदा दोनों पितृसत्ता के खिलाफ स्त्रीशक्ति का जागरण है।

महिषासुर की जगह सत्ता और पितृसत्ता को रखें तो स्त्री अस्मिता का नया मायने खुलेगा।
महिषासुर निधन के ब्राह्मणी मिथक को छोड़कर मातृसत्ता के रूपक के रूप में दुर्गा महिमा पर बात करें तो पितृसत्ता के ब्राह्मणधर्म के खिलाफ दसप्रहारधारिणी दुर्गा की प्रासंगिकता बेहद महत्वपूर्ण है।
अब वक्त है कि दुर्गा को महिषासुर वध के मिथक से अलग करके पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री अस्मिता से जोड़ने की। तभी ब्राह्मण धर्म के कारपोरेट महाविनाश कार्यक्रम का विरोध संभव है।
इसके लिए स्त्री को मनुस्मृति अनुशासनके दासित्व व शूद्रता से मुक्त करने की लड़ाई अभी बाकी है।
इसी सिलसिले में कश्मीर और मणिपुर में और आदिवासी भूगोल में भी जल जंगल जमीन की लड़ाई में स्त्री की नेतृत्वकारी भूमिका गौरतलब है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से स्त्री शक्ति की जीत जितनी है, उतनी ममता बनर्जी की निजी उपलब्धि भी है।
गौरतलब है कि बंगाल में भी जल जंगल जमीन की हक हकूक की लड़ाई में स्त्री शक्ति की निर्णायक भूमिका उसी तरह है, जैसे मणिपुर में सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून आफस्पा के खिलाफ मणिपुरी स्त्रियों का आंदोलन और लौहमानवी इरोम शर्मिला का सोलह साल तक चले आमरण अनशन की प्रासंगिकता है।
ममता बनर्जी की राजनीति से हमें कोई मतलब नहीं है, लेकिन जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जमीन आंदोलन में उनके ऐतिहासिक नेतृत्व और सत्ता में आने के बाद सिंगुर के बेदखल किसानों को उनकी छिनी हुई जमीन वापस दिलाने की उनकी जिद और सिंगुर भूमि अधिग्रहण रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से भारत के मुक्तबाजार में कारपोरेट अश्वमेधी अभियान के खिलाफ प्रतिरोध की जमीन निश्चित तौर पर पकने लगी है।
फिर इस प्रतिरोध में स्त्री की नेतृत्वकारी भूमिका कारपोरेट फासिज्म के विरुद्ध जनता की ताकत बनने की प्रबल संभावना है।
अब भी टाटा के पक्ष की सुनवाई पूरी नहीं हुई है और सिंगुर फैसले की सुप्रीम कोर्ट की उच्चतर बेंच में अपील होनी है। यह फैसला बाद में पलट भी जाये तो इससे कोई फर्क पड़ता नहीं है।

भूमि अधिग्रहण निजी पूंजी के हक में है, जनकल्याण के लिए नहीं।
आम जनता की आजीविका छीनने का काम विकास, शहरीकरण और औद्योगीकरण के नाम सिरे से अवैध है और यह जनकल्याण नहीं है, यह सिद्ध है।
जल जंगल जमीन की लड़ाई तेज करने का यही प्रस्थानबिंदु है। इस लड़ाई में स्त्री का नेतृ्त्व फिर निर्णायक है।
ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक किसानों को जमीन वापस दिलाने की प्रशासनिक कवायद शुरू कर दी है और उन्होंने इसकी पहले से तैयारी कर रखी है।
गौरतलब है कि स्वभाव और लेखन से वामपंथी दिवंगत ज्ञानपीठ विजेता साहित्यकार महाश्वेता देवी ने हमेशा ममता बनर्जी का साथ उसी तरह दिया है जैसे वे आमरण विवादास्पद तसलीमा नसरीन के पक्ष में खड़ी रहीं।
महाश्वेता देवी की राह चलकर बंगाल की सिविल सोसाइटी ने भी ममता का समर्थन दिया, जिससे परिवर्तन की आंधी में पूंजीपरस्त वामपंथ का अवसान हो गया और सिंगुर के किसानों को अगर जमीन दिलाने में ममता कामयाब हो गयीं, तो बंगाल में निकट भविष्य में विपक्ष समेत विपक्ष का कोई भविष्य नहीं है।

वामपंथ को भी नये सिरे से भूमि सुधार और किसान आंदोलन के रास्ते पर लौटना होगा
वरना बंगाल क्या बाकी भारत में भी वामपक्ष का कोई भविष्य नहीं है।
दिवंगत महाश्वेता देवी दशकों के साथियों से अलगाव की कीमत पर भी ममता बनर्जी का साथ देती रहीं तो इसकी खास वजह यह रही कि ममता ने आदिवासियों और जमीन के मसलों पर अपनी नीति में सत्ता के मद्देजर कोई बदलाव करने की मौकापरस्ती या बाजार की कारपोरेट ताकतों के दबाव के आगे झुकने की गलती नहीं की।
निजी पूंजी ने देशभर में आजादी के बाद बिना सुनवाई, बिना मुआवजा, बिना पुनर्वास जिस तरह केंद्र और राज्यसरकारों के समर्थन से जमीन अधिग्रहण किया, वह भी सिंगुर की जमीन के गैरकानूनी अधिग्रहण की तरह गैरकानूनी है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अगर सिंगुर के किसानों को जमीन वापस मिलती है तो देश भर में आदिवासियों, समुद्रतटवासियों, दलितों, पिछड़ों और शरणार्थियों की बेदखल जमीन की वापसी का फैसला भी हो सकता है, हालांकि इसके लिए सड़क पर आंदोलन जितना जरूरी है, उससे कही लंबी कानूनी लड़ाई की जरूरत होगी।
इस लड़ाई में ममता बनर्जी आगे नेतृत्व दे सकती हैं या नहीं, उससे बड़ा सवाल है कि कारपोरेट पितृसत्ता के खिलाफ भारतीय स्त्री किस हद तक जनता का नेतृत्व करने के लिए तैयार है और पुरुषों का समाज स्त्री का नेतृत्व किस हद तक स्वीकार करने को तैयार है। अगर आधी आबादी जल जंगल जमीन के हक हकूक के लिए उठ खड़ी हुई, तो बिना प्रतिरोध अब तक होते रहे बेदखली का सिलसिला बंद हो सकता है।

इसी संदर्भ में आंदोलन में स्त्री की भूमिका और उसके नेतृत्व की प्रासंगिकता है।
गौरतलब है कि सिंगुर आंदोलन के शुरुआती दौर में किसानों को संगठित करने का काम भी स्वप्ना गंगोपाध्याय ने किया है, जो सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर की कार्यकर्ता है और लगातार सिंगुर के गांवों में रहकर उन्होंने किसानों को संगठित किया है।
गौरतलब है कि मेधा पाटकर के नेतृत्व में NAPM और अनुराधा तलवार के नेतृत्व में पश्चिम बंग खेत मजदूर संगठन ने भी ममता बनर्जी का साथ मजबूती से दिया है और अरुंधति राय से लेकर मानसी अछेर तक की भारत भर की स्त्री कार्यकर्ताओं ने जमीन से किसानों की बेदखली के खिलाफ देश भर में सेज विरोधी आंदोलन चलाया है, जिससे ममता बनर्जी की राजनीति से बड़ी ताकत मिलती रही है।
यह विडंबना है कि भूमि सुधार कार्यक्रम को छोड़कर बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कृषि के बदले अंधाधुंध औद्योगीकरण और शहरीकरण का पूंजीवादी कारपोरेट विकल्प चुना, जिससे 35 साल के वाम शासन के बावजूद वामपक्ष का जनाधार एकदम खत्म हो गया है और सत्ता से बेदखल होने के बाद भी वामपक्ष नेतृत्व और कार्यक्रम के संकट से जूझ रहा है।
इसके विपरीत विपक्ष के नेता बतौर जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ जुझारू आंदोलन सड़क से संसद तक लड़ने वाली ममता बनर्जी ने जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ लड़ाई बंगाल की मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद नहीं छोड़ी, जबकि इस वजह से बंगाल में पूंजी का अबाध प्रवेश अवरुद्ध है।
यह जनप्रतिबद्धता ही स्त्री अस्मिता है।

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