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सिर्फ एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं है जनतन्त्र, बल्कि वह मनुष्य संस्कृति का एक नया रूप है

21 वीं सदी में जनतन्त्र!
दुनिया के दो तिहाई से ज्यादा वैज्ञानिक बहुराष्ट्रीय निगमों के लिये काम कर रहे हैं
ललित सुरजन
ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम द्वारा बीते सप्ताह ”सामाजिक रूपान्तरण में जनतन्त्र एवम् जनतान्त्रिक संस्थाएं; इक्कीसवीं सदी की संभावनाएं” विषय पर एक राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के सोलह-सत्रह प्रान्तों ने भागीदारी की। प्रतिनिधियों में राजनीतिक चिन्तक, समाजशास्त्री, पत्रकार, अध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी, श्रम संगठनों के कार्यकर्ता आदि शामिल थे। वर्तमान समय में एक बड़ी चुनौती हमारे सामने इस रूप में मौजूद है कि देश का सामाजिक, राजनीतिक विमर्श त्वरित लाभालाभ पर केन्द्रित हो गया है एवम् गम्भीर वैचारिक विमर्श की जगह धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। एक हड़बड़ी चारों तरफ दिखाई देती है कि जितनी जल्दी जितना अधिक मिल सके उसे बटोर लिया जाये। यह प्रवृत्ति समाज के हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है। ऐसे में भविष्य की कल्पना कर दूरगामी हित करने वाली नीतियाँ कैसे बनें इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
इस पृष्ठभूमि में यह एक संतोषदायी अनुभव था कि दिल्ली की कड़कड़ाती ठण्ड में देश के चारों कोनों से आए विभिन्न अनुभवों और विभिन्न आयु वाले बहुत सारे लोग तीन दिन तक एक साथ बैठें और माथापच्ची करें कि भारत के लिये जनतन्त्र तथा जनतान्त्रिक संस्थाओं का क्या मूल्य है और यह कि आने वाले समय में समाज का बेहतरी के लिये रूपान्तरण करने में इनकी क्या भूमिका हो सकती है। यहाँ यह रेखांकित करना भी उचित होगा कि इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में किसी भी तरह का तामझाम नहीं बरता गया। विभिन्न सत्रों में कुछेक विद्वान अतिथि वक्ता आए लेकिन हमारे यहाँ स्वागत- सत्कार की जो अनावश्यक औपचारिकताएं निभाई जाती हैं उनकी यहाँ कोई आवश्यकता नहीं समझी गयी। कुल मिलाकर एक खुला वातावरण था, जिसमें कुछ अच्छे आलेख पढ़े गये और फिर उन पर जमकर बहसें हुयीं। सारे सत्रों का संचालन भी उन विद्यार्थियों ने किया, जो स्वयं को आने वाले दिनों में सक्रिय सामाजिक भूमिका निभाने के लिये तैयार कर रहे हैं।
पहले दिन परिसंवाद की शुरूआत नागपुर के प्रोफेसर युगल रायलु के बीच वक्तव्य के साथ हुयी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय जनता के लिये जनतन्त्र सिर्फ एक राजनैतिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारत व्यापक विविधताओं का देश है तथा इस विविधता का संरक्षण जनतान्त्रिक व्यवस्था में ही सम्भव है। किसी भी तरह की तानाशाही अथवा अधिनायकवाद में विविधता का निषेध ही होता है। प्रोफेसर रायलु ने इस खतरे की ओर आगाह किया कि देश में जनतान्त्रिक प्रक्रिया को भीतर ही भीतर नष्ट करने का महीन षड़यन्त्र चल रहा है। एक तरफ अतिदक्षिणपंथी हैं जो भारत के संविधान को बदल देना चाहते हैं, तो दूसरी ओर अतिवामपंथी हैं जो संविधान में विश्वास ही नहीं रखते। इन दोनों से ही सावधान रहने की आवश्यकता है।
एक अन्य वक्ता डॉ. अजय पटनायक ने इस बात पर चिन्ता जताई कि जनता और मीडिया में कथित विकास को लेकर तो बहसें हो रही हैं, किन्तु गैरबराबरी और नाइंसाफी को लेकर जिस गम्भीरता के साथ बहस होना चाहिए वह दूर-दूर तक नहीं दिखती। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि धर्मनिरपेक्षता हमारे जनतन्त्र का प्रमुख आधार है और इसे बचाना बेहद जरूरी है।
ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल राजिमवाले ने इस अवसर पर एक विस्तृत आधार पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने बतलाया कि अंग्रेजी राज के दौरान भी हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने किस तरह से समाज के बीच जनतान्त्रिक चेतना फैलाने का काम किया। उन्होंने विभिन्न कालखंडों का जिक्र करते हुये 1937 के आम चुनावों की चर्चा की जब ग्यारह में से नौ प्रान्तों में कांग्रेस ने भूमिहीनों व गरीब जनता के भारी समर्थन से विजय हासिल की। इसके बाद उन्होंने ध्यान आकर्षित किया कि भारत के पड़ोसी देशों में जनतन्त्र को जडें ज़माने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला जबकि हमें संविधान सभा के माध्यम से ऐसी जनतान्त्रिक व्यवस्था प्राप्त हुयी जो अब तक चली आ रही है। श्री राजिमवाले ने श्रमिक संगठन, सार्वजनिक उद्यम, मीडिया आदि अनेक अभिकरणों का उल्लेख किया, जिन्होंने जनतन्त्र को पुष्ट करने में भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने प्रश्न उछाला कि क्या हम इस व्यवस्था का सम्पूर्ण लाभ उठा सके हैं? इसमें देश को रूपान्तरित करने की जो क्षमता है क्या उसका दोहन पूरी तरह से किया गया है? उन्होंने यह मंतव्य भी प्रकट किया कि जनतन्त्र सिर्फ एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि वह मनुष्य संस्कृति का एक नया रूप है। श्री राजिमवाले ने अपने उद्बोधन का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केन्द्रित किया कि विज्ञान व टेक्नालॉजी में खासकर सूचना प्रौद्योगिकी में जो नए आविष्कार हुये हैं उनसे समाज में जनतन्त्रीकरण की प्रक्रिया मजबूत होने की सम्भावना बढ़ी है। इस बारे में कुछ अन्य वक्ताओं के साथ मैंने भी आंशिक असहमति दर्ज की।
एक सत्र में राज्यसभा के संयुक्त सचिव सत्यनारायण साहू अतिथि वक्ता थे। उन्होंने अपने रोचक वक्तव्य में अनेक दृष्टान्त देते हुये यह स्थापित किया कि सामाजिक रूपान्तरण के लिये जनतन्त्र से बेहतर अन्य कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। श्री साहू ने महात्मा गांधी को याद करते हुये प्रतिपादित किया कि भारत में यदि जनतन्त्र मजबूत हुआ है तो उसका मूल आधार अहिंसा है। उन्होंने वर्तमान की चर्चा करते हुये विश्वास व्यक्त किया कि आम चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया अपनाने से बेहतर ढँग से चुनाव संचालन सम्भव हो रहा है। इसी सत्र में हैदराबाद के तकनीकीविद् एम. विजय कुमार ने तर्क रखा कि विकेन्द्रीकरण और जनतन्त्रीकरण दो अलग-अलग बातें हैं। विकेन्द्रीकरण एक सीमित प्रक्रिया है जबकि जनतन्त्रीकरण का दायरा व्यापक है। उन्होंने यह आशंका भी व्यक्त की कि आज की प्रौद्योगिकी कहीं अधिनायकवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम तो नहीं कर रही?
गोवा के डॉ. ईश्वर सिंह दोस्त का भी प्रश्न था कि- विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास से होने वाला लाभ अन्तत: कौन उठा रहा है। दिल्ली के वैज्ञानिक डॉ. सोमा एस. मार्ला ने नवउदार पूँजीवाद की चर्चा करते हुये कुछ मौजूं प्रश्न सामने रखे जैसे कि टेक्नालॉजी के विकास से श्रमिकों को क्या लाभ मिला है? क्या इससे अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी है? क्या इससे श्रमिक समुदाय का जीवनस्तर बेहतर हुआ है? उन्होंने यह भी बताया कि आज दुनिया के दो तिहाई से ज्यादा वैज्ञानिक बहुराष्ट्रीय निगमों के लिये काम कर रहे हैं।
परिसंवाद में एक सत्र ”मीडिया एवम् सामाजिक परिवर्तन” पर हुआ। इस सत्र में सुप्रसिद्ध पत्रकार हरतोष सिंह बल अतिथि वक्ता के तौर पर मौजूद थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कुछ बहुत ही चुभते हुये प्रश्न उठाये। उन्होंने पूछा कि भारत में मीडिया की वृद्धि की जो बात की जा रही है वह किस हद तक सही है? उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मीडिया का स्वामित्व धीरे-धीरे कुछेक पूँजीपतियों के हाथों सिमटता जा रहा है। उन्होंने बतलाया कि कितने ही मीडिया समूह भारी घाटे में चल रहे हैं और इस घाटे की पूर्ति मीडिया मालिक अपने दूसरे व्यवसाय में मुनाफा उठाकर करते हैं। श्री बल ने मीडिया, कॉरपोरेट और राजनेताओं के गठबंधन पर भी चिंता जाहिर की तथा मीडिया को स्वतन्त्र व निष्पक्ष बनाने के लिये दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए। एक- मीडिया के क्रियाकलाप भी जनता के पड़ताल के लिये खुले होना चाहिए, जिस तरह आईटीआई के अन्तर्गत सरकार के कार्यकलाप। दो- देश की संसद और जनप्रतिनिधियों को मीडिया की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिये हस्तक्षेप करना चाहिए। इस सत्र में सोशल मीडिया व न्यू मीडिया पर भी बहुत बातें हुयीं। अधिकतर वक्ताओं का मानना था कि सोशल मीडिया अपने आप में परिवर्तन का वाहक नहीं, बल्कि एक सुलभ माध्यम मात्र है। असली परिवर्तन तो जनता ही करती है। भारत के सन्दर्भ में रेखांकित किया गया कि सोशल मीडिया यहाँ अभी प्रारम्भिक अवस्था में है। वह मुख्यत: शहरी क्षेत्र तक केन्द्रित है और उसकी पहुँच सीमित है। जनता के हक में इसका बेहतर और अधिकतम इस्तेमाल कैसे हो सकता है इस पर अभी और विचार करना होगा।
परिसंवाद के एक सत्र में ”जनतन्त्र और वर्चस्ववाद” पर चर्चा हुयी तो एक में ”भारतीय जनतन्त्र व धर्मनिरपेक्षता” पर। समापन दिवस पर एक सत्र में हाशिए का समाज और ‘जेंडर जस्टिस’ (लैंगिक न्याय) पर चर्चा हुयी तथा दूसरे सत्र में संस्थाओं के जनतंत्रीकरण पर। स्थानाभाव के कारण उन पर चर्चा फिर कभी। कुल मिलाकर यह एक विचारोत्तेजक कार्यक्रम था। शास्त्रार्थ के लिये प्रसिद्ध इस देश में आवश्यक है कि ऐसी चर्चाएं निरंतर होती रहें, अन्यथा भावनाओं में बहकर हम किसी भी दिन किसी तानाशाह को गद्दी सौंपकर जनतन्त्र को खो देंगे।
 देशबंधु में 06 फरवरी 2014 को प्रकाशित

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ललित सुरजन, लेखक प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं। देशबंधु के प्रधान संपादक हैं।

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