Home » समाचार » दुनिया » सुरक्षित नहीं जल, जंगल और जमीन
Environment and climate change

सुरक्षित नहीं जल, जंगल और जमीन

05 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष | Special on world environment day in Hindi

राख के कटोरे में तब्दील हो जाएगा धान का कटोरा

जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई (Indiscriminate cutting of trees in the forests) और लगातार बढ़ती जनसंख्या के अलावा बड़े पैमाने पर लग रहे उद्योगों से पर्यावरण असंतुलित होने लगा है। उद्योगों के कारण उपजाऊ भूमि सिमट रही है, वहीं फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं और अपशिष्ट पदार्थों से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। बढ़ते प्रदूषण के कारण धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ के आगामी कुछ दिनों में राख के कटोरे में तब्दील होने में कोई संदेह नहीं है।

छत्तीसगढ़ राज्य में तेजी से पांव पसारते औद्योगिक इकाईयों से यहां प्रदूषण का खतरा दिनों-दिन बढ़ने लगा है। पर्यावरण प्रदूषण से मनुष्य सहित पेड़-पौधे व जीव-जन्तु भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। औद्योगिकीकरण व जनसंख्या में वृद्धि के कारण पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ के कई जिलों के भूजल स्तर में काफी गिरावट आई है। वहीं रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से भी भूमि प्रदूषित हो रही है।

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले की बात करें तो इस जिले में वर्तमान में 10 से अधिक छोटे-बड़े उद्योग लग चुके है, जिससे आम जनजीवन प्रदूषण की मार झेल रहा है। बावजूद इसके राज्य सरकार ने यहां पावर प्लांट लगाने उद्योगपतियों द्वार खोल दिए हैं।

पिछले तीन वर्षों में अकेले जांजगीर-चांपा जिले में मुख्यमंत्री ने 40 से अधिक उद्योगपतियों से पावर प्लांट लगाने एमओयू किए हैं, जिनके चालू होने के बाद इस जिले की क्या दशा होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

The existence of rivers is also in crisis

इधर व्यापक पैमाने पर औद्योगिक इकाईयों की स्थापना से नदियों का अस्तित्व भी संकट में है। औद्योगिक इकाईयां सिंचाई विभाग व सरकार से किए गए अनुबंध से ज्यादा नदी के पानी का उपयोग करती है, जिसके कारण गर्मी शुरू होने से पहले ही कई नदियां सूख जाती है। वहीं कई उद्योगों द्वारा तो नदियों में कैमिकलयुक्त पानी भी छोड़ा जाता है, जिससे नदी किनारे गांव में रहने वालों को बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ती है।

दरअसल, 5 जून को देश भर में पर्यावरण दिवस के मौके पर एक बार फिर औपचारिकता निभाई जाएगी। एयरकंडीशनर कमरों में बड़े-बड़े नेता, अधिकारी और सामाजिक संगठन के लोग जुटेंगे, घंटों चर्चा करेंगे तथा फोटो खिंचवाकर सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित कराएंगे। दूसरे दिन लोगों को समाचार पत्रों व टीवी चैनलों से पता चलेगा कि कुछ लोगों को देश व जनजीवन की चिंता है, जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखने घंटों सिर खपाया है।

क्या वास्तव में इस तरह की औपचारिकता निभाना सही है?

भले ही इस अवसर पर बड़े-बड़े व्याख्यान दिये जाएं, हजारों पौधा-रोपण किए जाएं और पर्यावरण संरक्षण की झूठी कसमें खाई जाएं, पर इस एक दिन को छोड़ शेष 364 दिन प्रकृति के प्रति हमारा अमानवीय व्यवहार इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हम पर्यावरण के प्रति कितने उदासीन और संवेदनशील हैं। आज हमारे पास शुद्ध पेयजल का अभाव है, सांस लेने के लिए शुध्द हवा कम पड़ने लगी है। जंगल कटते जा रहे हैं, जल के स्रोत नष्ट हो रहे हैं, वनों के लिए आवश्यक वन्य प्राणी भी लुप्त होते जा रहे हैं। औद्योगीकरण ने खेत-खलिहान और वनक्षेत्र निगल लिए हैं। वन्य जीवों का आशियाना छिन गया है तथा कल-कारखाने धुआं उगल कर प्राणवायु को दूषित कर रहे हैं। यह सब खतरे की घंटी ही तो है।

Today, environment is the most discussed issue in Chhattisgarh.

आज छत्तीसगढ़ में पर्यावरण सबसे ज्यादा चर्चित मुद्दा है। हम जब पर्यावरण की बात करते हैं तो धरती, पानी, नदियाँ, वृक्ष, जंगल आदि सभी की चिन्ता उसमें शामिल होती है। पर्यावरण की यह चिन्ता पर्यावरण से लगाव से नहीं, मनुष्य के अपने अस्तित्व के खत्म हो जाने के भय से उपजी है। आजकल पर्यावरण की इसी चिन्ता से कुछ नए नए दिवस निकल आए हैं। किसी दिन पृथ्वी दिवस है तो कभी जल दिवस और कोई पर्यावरण दिवस। पिछले दो-तीन दशकों मे हमनें तरह-तरह के दिवस मनाने शुरू किए हैं। पर्यावरण, जल, पृथ्वी, वन, बीज, स्वास्थ्य, भोजन आदि न जाने कितने नए-नए दिवस सरकारी, गैर-सरकारी तौर पर मनाए जाते हैं। मगर विडम्बना यह है कि जिन विषयों पर हमने दिवस मनाने शुरू किए, वे ही संसाधन या चीजें नष्ट होती जा रही हैं।

आज पर्यावरण के विषय पर कोई भी गंभीरता से विचार नहीं कर रहा है। न ही सरकार और न ही सामाजिक संगठन तथा आमजन। लोग आज भले ही खुद को पढ़ा लिखा व जागरूक मानते हो, मगर पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर किसी में जागरूकता नहीं दिख रही है।

विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास

विश्व पर्यावरण दिवस के इतिहास पर नजर डाले तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनितिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है। पर्यावरण दिवस का आयोजन 1972 के बाद शुरू हुआ। सबसे पहली बार 5 से 15 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में मानवी पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ, जिस में 113 देश शामिल हुए थे। इसी सम्मेलन की स्मृति बनाए रखने कि लिए 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस घोषित कर दिया गया। सवाल तो यह है कि पर्यावरण दिवस के इस दिन का हमसे क्या रिश्ता? क्या 1972 के बाद लगातार पर्यावरण दिवस मना लेने से हमारा पर्यावरण ठीक हो रहा है? यह सोंचने वाली बात है।

एक अहम बात यह भी है कि बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्कूल और कालेजों में पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से जोड़ने का निर्देश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर पर्यावरण को पाठ्यक्रम में शामिल तो कर लिया गया, लेकिन इससे भी लोगों में कोई जागरूकता नहीं आई। स्कूल-कालेजों में इस विषय पर वर्ष भर किसी तरह की पढ़ाई नहीं होती, जबकि परीक्षा में सभी को मनचाहे नंबर जरूर मिल जाते हैं। बहरहाल, आज पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा जिस तरह से हो रही है, उससे कहीं ऐसा न हो कि एक दिन इस भयंकर भूल का खामियाजा हमें और हमारी भावी पीढ़ी को भुगतना पड़े।

राजेन्द्र राठौर

About हस्तक्षेप

Check Also

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: