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सोपा ने दोहराया नवउदारवादी व्यवस्था का जड़ से विरोध जारी रखने का संकल्प

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
बिहार प्रदेश
राज्य सम्मेलन 1-2 फरवरी 2014
पटना
प्रस्ताव
देश में अगले तीन महीनों में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। सभी स्थापित राजनीतिक दल किसी भी तरह देश की सत्ता पर काबिज होने की होड़ में लगे हैं। झूठे वायदों, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, सांप्रदायिक उन्माद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद, धनबल, बाहुबल और वंचित समूहों के प्रति दिखावटी सहानुभूति के सहारे ये पार्टियाँ गरीब और मेहनतकश जनता को गुमराह कर अपने-अपने पक्ष में लामबंद करने का दांव खेल रही हैं। इस पूरे राजनीतिक शोर-शराबे के बीच गरीबी, गरीबों और अमीरों के बीच में मौजूद विषमता की लाखों गुनी खाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, लाखों किसानों की आत्महत्या, नागरिक अधिकारों का दमन, आदिवासियों-दलितों-स्त्रियों-अल्पसंख्यकों की बढ़ती असुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर कोई चर्चा नही हो रही है। दरअसल ये सभी पार्टियाँ नब्बे के दशक से लागू की गईं नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, भूमंडलीकरण, बाजारवादी उपभोक्तावाद, केंद्रवाद, अंधराष्ट्रवाद के पक्ष में एकमत हैं। ये विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन जैसी कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा संस्थाओं के आदेश पर बड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों के हितों के अनुसार अपनी नीतियाँ बनाती हैं। इस तरह ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियाँ देश की धरोहर – जल, जंगल, जमीन- को कारपोरेट घरानों को बेचने वाली एजेंट बन गई हैं।

देश में फैली गरीबी और भ्रष्टाचार का स्रोत यही नवउदारवादी व्यवस्था है। इसे बदले बगैर गरीबी और भ्रष्टाचार नहीं हटाए जा सकते। इन्हें हटाने के नाम पर कारपोरेट समर्थक मुख्यधारा मीडिया और विदेशी धन के बल पर राजनीतिक सत्ता की लूट के खेल में जरूर शामिल हुआ जा सकता है। जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ तंत्र के कुछ सरगना राजनीतिक पार्टी बना कर रहे हैं।

गरीबी और भ्रष्टाचार हटाने के लिए भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और संविधान के मुताबिक लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण और स्वावलंबन पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की स्थापना ही एकमात्र रास्ता है। गांधी, डॉ. अंबेडकर, जेपी, डॉ. लोहिया, आचार्य नरेंद्रदेव, एसएम जोशी, युसुफ मेहरअली, अच्युत पटवर्द्धन, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, कर्पूरी ठाकुर, किशन पटनायक सरीखे महान नेताओं व चिंतकों की विरासत से प्रेरित सोशलिस्ट पार्टी (सोपा) इस सम्मेलन में समाजवाद के बुनियादी सिद्धान्तों में दृढ़ आस्था रखते हुए नवउदारवादी व्यवस्था का जड़ से विरोध जारी रखने का संकल्प दोहराती है।

बिहार में अभी हाल के महीनों में जदयू और भाजपा का बेमेल और अवसरवादी सत्तारूढ़ गठबंधन टूट गया है। 16 साल चले इस गठबंधन ने बिहार की धर्मनिरपेक्ष धरती पर सांप्रदायिक ताकतों की जड़ें गहरी ओर मजबूत कर दी हैं। बिहार की धर्मनिरपेक्ष जनता को इस चुनौती के खिलाफ लंबा संघर्ष करना होगा। बहरहाल, गठबंधन की सरकार और अब अकेले जदयू की सरकार की नीतियों व क्रियाकलापों में काई बुनियादी फर्क नहीं है। जनता के वास्तविक मुद्दों का समाधान करने की जगह यह सरकार कारपोरेट पूंजीवादी एंजेडे को ही लागू करने की कवायद कर रही है। पूरे प्रशासन में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का बोलबाला है। लिहाजा, सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते उनका लाभ जनता तक नहीं पहुँच रहा है। सोशलिस्ट पार्टी बिहार प्रदेश इस राज्य सममेलन में प्रखंड से लेकर राज्य मुख्यालय तक व्याप्त भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के विरोध में संघर्ष करने का संकल्प लेती है।

बिहार में भूमाफियाओं, ठेकेदारों और शराब कारोबारियों द्वारा आम जनता को बर्बाद किया जा रहा है। आज गाँव-गाँव में शराब की दुकानें खुल गयी हैं, जिससे समाज का पूरा वातावरण बिगड़ रहा है। इस बुराई की मार सबसे ज्यादा महिलाओं, बच्चों और युवाओं पर पड़ रही है। भूमाफियाओं का बड़ा गिरोह किसानों की जमीनें काफी कम कीमत पर खरीद कर ऊँचे दामों पर बेच रहा है, जिससे जमीन के दामों में कृत्रिम उछाल आ गया है। सोशलिस्ट पार्टी राज्य में पूर्ण शराबबंदी के साथ इन भूमाफियाओं पर अंकुश लगाने की माँग राज्य सरकार से करती है।

बिहार में सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के लिए किया गया भूमि अधिग्रहण भी भ्रष्टाचार और लालफीताशाही में डूबा हुआ है। किसानों को उनकी भूमि का उचित मूल्य सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण के वर्षों बाद तक नही दिया गया है। भागलपुर में बियाडा भूमि अधिग्रहण में भ्रष्टाचार और सरकार की ज्यादती के खिलाफ पार्टी लंबे समय से संघर्ष कर रही है। अभी हाल ही में बिहटा, पटना, में किसानों का एक लंबा आंदोलन इन्हीं माँगो को लेकर किया गया, जिसमें किसानों ने 10-12 दिनों का अनशन भी किया। सोशलिस्ट पार्टी ने इस आंदोलन का समर्थन किया। बिहार के विभिन्न इलाकों में किसानों, खेती और भूमि अधिग्रहण की समस्याओं को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। सोशलिस्ट पार्टी किसानों को उनकी भूमि का उचित और समय पर मुआवजा दिए जाने की मांग करती है। साथ ही पार्टी का किसानों से अनुरोध है कि वे बहुत सोच-विचार के बाद ही निजी और सरकारी परियोजनाओं के लिए अपनी भूमि देना स्वीकार करें।

वर्तमान सरकार के शासन में बिहार की शिक्षा व्यवस्था (प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक) लगभग चैपट हो गयी है। माता-पिता खर्च और जोखिम उठा कर अपने बच्चों, यहाँ तक कि स्कूली बच्चों को भी, पढ़ने के लिए बाहर भेजते हैं। नियोजित शिक्षकों से सरकार का अमर्यादित और असंवेदनशील व्यवहार निरंतर देखने को मिलता है। ‘मिडडे मील’ योजना में भ्रष्टाचार की कीमत मासूम बच्चों की मौत के रूप में हमारे सामने है। सोशलिस्ट पार्टी ठेके पर शिक्षकों को नियोजित करने का विरोध करती है और नियोजित शिक्षकों को पूर्ण वेतनमान के साथ स्थायी करने की माँग करती है। सरकार ने 2005-06 में समान स्कूल शिक्षा प्रणाली (सीएसएस) पर प्रसिद्व शिक्षाविद् प्रो. अनिल सद्गोपाल और प्रो. मुचकुन्द दुबे की एक समिति बनायी थी। इस समिति ने जल्दी ही अपनी रपट सरकार को सौप दी थी। परंतु सरकार ने उसे लागू करना तो दूर, उस पर चर्चा तक नहीं की। सोशलिस्ट पार्टी माँग करती है कि सरकार उक्त रपट पर चर्चा कर उसे अविलंब लागू करे और राज्य में सभी छात्रों को केजी से पीजी तक समान, निःशुक्ल और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करे।

बिहार में सरकार ने अभी हाल ही में निजी विश्वविद्यालय खोलने के लिए एक कानून बनाया है। यह उच्च शिक्षा के निजीकरण का ही एक प्रयास है। इससे उच्च शिक्षा मंहगी होने के कारण बिहार की आम जनता के लिए असंभव हो जायेगी। पार्टी यह माँग करती है सरकार इस तरह के निजीकरण की कोशिशें बंद करके बिहार के मौजूदा विश्वविद्यालयों की बेहतरी पर ध्यान दे, जो बर्बाद होने के कगार पर पहुंच गए हैं। इसके साथ नालंदा विश्वविद्यालय की तर्ज पर विक्रमशिला विश्वविद्यालय विकसित किया जाए। राज्य के महाविद्यालयों में आधे से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं, जिससे पढ़ाई बुरी तरह बाधित है। सोशलिस्ट पार्टी सरकार से महाविद्यालयों में शिक्षकांे की अविलम्ब नियुक्ति की माँग करती है। पार्टी की मांग है कि बिहार के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संध के नियमित चुनाव हों।

बिहार में कृषि और किसानों की स्थिति पर पार्टी गहरी चिंता व्यक्त करती है। बिहार में खेती की सुविधाओं की भारी कमी है और किसानों को अपनी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता है। बिचैलियों द्वारा किसानों का शोषण हो रहा है। लेकिन सरकार उदासीन है। सोशलिस्ट पार्टी माँग करती है कि सरकार प्राथमिकता के आधार पर खेती के लिए सिंचाई, बीज, ऋण, ढुलाई, मंडी, भंडारण आदि बुनियादी सुविधाएं बहाल कर किसानों की उपज का वाजिब मूल्य सुनिश्चित करे।

बिहार की सम्यक उन्नति और आर्थिक प्रगति का रास्ता लघु और कुटीर उद्योगों से ही हो सकता है। बिहार के गांवों में कृषि आधारित छोटे उद्योगों की स्थापना करके गाँवों के जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। लेकिन सरकार की उदासीनता के कारण बिहार के सभी छोटे-बड़े उद्योग-धंधे बंद हो गए हैं। सोशलिस्ट पार्टी डालमिया नगर के उद्योग, कटिहार के जुट-मिल, भागलपुर के बुनकरों, बिहार में चल रहे विभिन्न जिलांे, विशेषकर मधुबनी का खादी-ग्रामोद्योग, चंपारण के चीनी-मिलों को अविलम्ब खोलने की मांग करती है। साथ ही मुजफ्फरपुर में लीची आधारित उद्योग, नवगछिया व बिहपुर क्षेत्र में केला और लीची आधारित उद्योग, लखिसराय में जल प्रबंधन करके मछली उत्पादन उद्योग, हाजीपुर में केले पर आधारित उद्योग खोलने की माँग करती है। पार्टी कृषि-उद्योग आधारित नीति लागू करने के लिए पूरे बिहार में आंदोलन चलाएगी। सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार से माँग रही है कि सभी काम करने सक्षम स्त्री-पुरुषों को रोजगार देने के लिए देश में पूर्ण रोजगार गारंटी कानून बनाया जाए। सोशलिस्ट पार्टी बिहार प्रदेश इस सम्मेलन में बिहार सरकार से अनुरोध करती है कि वह राज्य स्तर ऐसा कानून बनाने की पहल करे। साथ ही शिक्षित और कुशल बेरोजगार युवक-युवतियों को प्रति माह 5 हजार रुपया बेरोजगारी भत्ता देने और वरिष्ठ नागरिकों को प्रति माह 5 हजार रुपया पेंशन देने की माँग पार्टी करती है।

मुजफ्फरपुर में बागमती बाँध के विस्थापितों को न्याय दिलाने के लिए लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। सोशलिस्ट पार्टी इस आंदोलन का समर्थन करती है और सरकार से विस्थापितों को तुरंत न्याय देने की माँग करती है।

राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है। पार्टी फारबिसगंज गोली कांड के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की माँग करते हुए कानून व्यवस्था को जनहित, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से चुस्त-दुरुस्त बनाने की माँग सरकार से करती है।

सार्वजनिक यातायात को सुविधाजनक और प्रभावी बनाने के लिए बिहार राज्य पथ परिवहन निगम को मजबूत और विस्तारित करने की माँग भी पार्टी करती है। पार्टी की मांग है कि सरकार पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए घर में शौचालय होने की शर्त जैसी अतार्किक शर्त की बात करने के बजाय देहात के सभी घरों में सरकारी खर्च से शौचालय बनावाने का काम करे।

आज बिहार की लोक-कलाएं और लोक-कलाकार सरकार की उदासीनता के कारण बदहाल स्थिति में हैं। लोक-कलाओं और लोक-कलाकारों को देश-विदेश में उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। बिहार की विविध बोलियों और भाषाओं की स्थिति भी काफी खराब है। विविध भाषाई अकादमियाँ मृतप्राय हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन भाषाओं एवं बोलियों के साहित्यकार गुमनामी के अँधेरे में खो गए हैं। सोशलिस्ट पार्टी बिहार के सांस्कृतिक गौरव को कायम रखने के लिए कृतसंकल्प है। इसके लिए पार्टी लोककलाओं के संरक्षण के लिए सरकार की ओर से विशेष कदम उठाने और भाषा अकादमियों को सक्रिय व जीवंत बनाने व अंगिका भाषा अकादमी बनाने की माँग करती है।

बिहार में एक रचनात्मक युवा नीति की बेहद जरूरत है। युवाओं में विचार, साहित्य, कला, संस्कृति, थियेटर, खेल-कूद आदि के प्रति लगाव बढ़े, इसके लिए सरकार को सुझाव देने के लिए एक विशेष समिति का गठन करना चाहिए। समिति की सिफारिशों के आधार पर ग्रामीण और शहरी युवाओं के लिए सरकार युवा नीति का निर्माण और कार्यान्वयन करे।

सोशलिस्ट पार्टी का नारा

समता और भाईचारा

प्रस्तावक : डॉ. भानु उदयन (महामंत्री)

अनुमोदक : सच्चिदानंद सिंह, डॉ. सुशील कुमार, रेणु सिंह, रंजीत मंडल, गौतम प्रीतम, नीरज

 

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