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स्पष्ट दिखलाई दे रहे हैं मोदी के खून से रंगे हाथ

गुजरात कत्लेआम और नरेन्द्र मोदी
दुष्प्रचार की गहरी धुंध के बावजूद ध्यान से देखने पर मोदी के खून से रंगे हाथ स्पष्ट दिखलाई दे रहे हैं।
राम पुनियानी

हाल (जनवरी 2014) में एक टेलीविजन चैनल पर प्रसारित अपने साक्षात्कार में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि सम्भव है कि कुछ कांग्रेसजन, सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में शामिल रहे हों। उन्होंने यह भी कहा कि सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम के लिये मोदी भी दोषी हैं।

इस साक्षात्कार पर कई विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आयीं। अरविन्द केजरीवाल ने सन् 1984 के दंगों की जाँच के लिये विशेष जाँच दल (एसआईटी) के गठन का वायदा दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले ही कर दिया था। उनकी सरकार इस मुद्दे को गम्भीरता से ले रही है और सम्भवतः जल्दी ही 1984 के त्रासद खून खराबे की जाँच के लिये विशेष जाँच दल नियुक्त कर दिया जायेगा। यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि इतना समय गुजर जाने के बाद, जाँच का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि अब तक अधिकांश सुबूत नष्ट या गुम हो चुके होंगे। परन्तु फिर भी, न्यायिक प्रक्रिया मशीनरी को सक्रिय कर जो कुछ भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। दंगों के पीड़ितों के साथ न्याय होना चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि सभी दंगा पीड़ितों को, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, न्याय मिलना चाहिए। कश्मीरी पंडितों के साथ भी न्याय होना चाहिए और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जब भी गुजरात की भयावह हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलवाने की बात होती है तब कश्मीरी पंडितों और सिक्ख दंगों के मुद्दे उछाल दिये जाते हैं। यह मूल मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

दो गलत चीजें मिलकर सही नहीं हो जातीं। किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ हिंसा से, उस समुदाय को न्याय नहीं मिल जाता जिसके साथ अन्याय हुआ हो। इसी तरह, भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय को इस आधार पर उचित ठहराना कि पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ अन्याय हो रहा है, पूरी तरह अमानवीय है। सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों, को सभी देशों में, हमेशा न्याय मिलना चाहिए। किसी एक स्थान या देश में अन्याय को सहना, हर जगह अन्याय को सहने के समकक्ष है।

राहुल गांधी की गुजरात के बारे में टिप्पणी के जवाब में भाजपा प्रवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि मोदी को एसआईटी और अदालत से क्लीन चिट मिल चुकी है। यह दुष्प्रचार है। गुजरात की हिंसा के शुरूआती दौर से ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गुजरात में हिंसा प्रायोजित करने के लिये मोदी को दोषी ठहराता रहा है। यद्यपि एसआईटी ने यह दावा किया है कि मोदी पर मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं है परन्तु एसआईटी की रपट में ही ऐसी कई बातें हैं जिनसे यह जाहिर होता है कि मोदी ने दंगों के दौरान और उनके बाद, वह नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था और वह किया जो उन्हें नहीं करना था। मोदी के समर्थक कहते हैं कि दिल्ली में तीन दिन तक सेना नहीं बुलाई गयी थी परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि दिल्ली की हिंसा पर तीन दिनों में नियन्त्रण स्थापित कर लिया गया था। इसके विपरीत, गुजरात में 27 फरवरी 2002 से लेकर मई तक हिंसा जारी रही। हिंसा तभी रुकी जब तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने केपीएस गिल को हिंसा पर नियन्त्रण करने के लिये विशेष रूप से गुजरात भेजा। इस मसले पर मोदी की लगातार निन्दा की जाती रही और यह निन्दा आधारहीन या बकवास नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार को लताड़ लगाते हुये कहा था ‘‘जब गुजरात जल रहा था तब वहाँ के नीरो बाँसुरी बजा रहे थे।‘‘ अटलबिहारी वाजपेयी तक ने मोदी से राजधर्म का पालन करने के लिये कहा था। गुजरात में जिस तरह का वातावरण बन गया था, उसी के चलते उच्चतम न्यायालय ने दंगों से सम्बंधित दो बड़े मामलों को राज्य से बाहर स्थानान्तरित किया था। गुजरात में आतंक के इस वातावरण का सृजन अगर मोदी ने नहीं किया था तो फिर किसने किया था? न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के ताजा निर्णय के बाद, मल्लिका साराभाई ने कहा, ‘‘गुजरात की किसी अदालत से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वह मोदी को क्लीन चिट के अलावा कुछ और देगी‘‘। एसआईटी की रपट की व्याख्या भी गलत ढँग से की गयी है। एसआईटी और न्यायमित्र राजू रामचन्द्रन- दोनों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय ने की थी। यह कहना कि एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दे ही है, पूरी तरह सच नहीं है। तथ्य यह है कि एसआईटी ने 2010 की अपनी रपट में कहा था कि गुलबर्ग सोसायटी और अन्य स्थानों पर मुसलमानों पर भयावह हिंसक हमलों पर सरकार की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी जैसी कि अपेक्षा की जाती है। मुख्यमन्त्री ने गुलबर्ग सोसायटी व नरोदा पाटिया की दिल दहलाने वाली घटनाओं को यह कहकर खारिज कर दिया था कि प्रत्येक क्रिया की विपरीत एवम् समान प्रतिक्रिया होती है। राजू रामचन्द्रन का यह स्पष्ट मत है कि एसआईटी की रपट के आधार पर मोदी को अभियोजित किया जा सकता है।

याद रहे कि राष्ट्रीय मानाविधकार आयोग ने 31 मई 2002 को जारी अपनी रपट में निष्कर्ष स्वरूप कहा था कि ‘गुजरात में राज्य, लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में पूर्णतः विफल रहा‘‘। न्यायमित्र ने अपनी अन्तिम रपट में मोदी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 166, 153-अ व 153-ब के तहत मुकदमा चलाए जाने की अनुशंसा की है। तो फिर कहाँ है क्लीन चिट? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मोदी को दोषी बताया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र का मत है कि मोदी के विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है। तीसरे, जकिया जाफरी मामले में न्याय प्रक्रिया की शुरूआत ही हुयी है। अदालत के निर्णय के बाद जकिया जाफरी ने कहा कि वे ऊँची अदालत में अपील करेंगी। हमारे देश में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है, खत्म नहीं। यह कहना कि मोदी को गुजरात दंगों के मामले में क्लीन चिट मिल गयी है, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना है। यह झूठा प्रचार एक विशिष्ट उद्देष्य से किया जा रहा है।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के नजदीकी साथी बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, गुजरात दंगों में हिंसा भड़काने और उसमें भाग लेने के दोषी पाए गए हैं और उन्हें कड़ी सजाएं सुनाई गयी हैं। तहलका के स्टिंग ऑपरेशन से यह स्पष्ट है कि बाबू बजरंगी व उनके साथियों की मोदी की सरकार से मिलीभगत थी। ‘‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एण्ड पीस‘‘ के तत्वाधान में गठित जन न्यायाधिकरण ने भी दंगों में मोदी की भूमिका को रेखांकित किया है। इस जन न्यायाधिकरण में पी बी सावंत जैसे जाने माने न्यायविद् शामिल थे। गुजरात दंगों से सम्बंधित केवल चन्द मामलों में न्याय हुआ है और वह भी इसलिये सम्भव हो पाया क्योंकि पीड़ितों और मानवाधिकारों के रक्षकों ने इसके लिये एक लम्बी और कठिन लड़ाई लड़ी। न्याय की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाये जाने की जरूरत है। गुजरात सरकार ने पीड़ितों के न्याय पाने की राह में हर सम्भव बाधा खडी़ की है। क्लीन चिट के दावों में कोई दम नहीं है। दुष्प्रचार की गहरी धुंध के बावजूद ध्यान से देखने पर मोदी के खून से रंगे हाथ स्पष्ट दिखलाई दे रहे हैं।

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राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।

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