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स्वामी असीमानन्द और ‘वक्तव्य वापस लेने’ की कला

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राम पुनियानी
स्वामी असीमानंद मालेगांव, मक्का मस्जिद, हैदराबाद, अजमेर दरगाह और समझौता एक्सप्रेस में हुये धमाकों के कथित मुख्य कर्ताधर्ता बताये जाते हैं। ये धमाके सन् 2006 से शुरू हुये थे और उनने देश को हिलाकर रख दिया था। इन धमाकों की शुरूआती जाँच का नेतृत्व हेमंत करकरे ने किया था, जिन्हें 26/11/2008 को मुंबई में हुये आतंकी हमले में मार डाला गया। बाद में राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने इस जाँच को अपने हाथों में लिया और कड़ी मेहनत के बाद हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं के आतंकी नेटवर्क का खुलासा किया, जिसका संचालन आरएसएस से जुड़े या उसकी विचारधारा में विश्वास रखने वाले विभिन्न संगठन कर रहे थे। इस नेटवर्क के कई सदस्य अब जेल में हैं। हाल (जनवरी 25, 2014) में असीमानंद और तीन अन्यों पर समझौता एक्सप्रेस धमाकों के सिलसिले में औपचारिक रूप से आरोप लगाए गये। असीमानंद आरोपी क्रमांक 1 हैं।
अपनी गिरफ्तारी के बाद उन्होंने एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष इकबाल-ए-जुर्म किया था। यह इकबाल-ए-जुर्म पूरी तरह ऐच्छिक था और मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक डबास के समक्ष 18 दिसंबर को तीस हजारी अदालत में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज कराया गया था। स्वामी ने किसी भी प्रकार की विधिक सहायता लेने से इंकार कर दिया था और उनका बयान उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के 48 घंटे बाद कराया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे किसी प्रकार के भय या दबाव में नहीं है। इस बयान में उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे और अन्य हिन्दू कार्यकर्ता, मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर बम विस्फोटों में शामिल थे और उन्होंने ये विस्फोट इसलिये कराए थे क्योंकि वे इस्लामिक आतंकवाद को ‘बम के बदले बम’ का प्रतिउत्तर देना चाहते थे। यह इकबालिया बयान 42 पृष्ठों का था और उसके बारे में मीडिया में काफी कुछ छपा था।
बाद में वे अपने इस बयान से पीछे हट गये और उन्होंने यह आरोप लगाया कि उन्हें डरा धमका कर बयान देने पर मजबूर किया गया था। उनका यह दावा आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय था। हम सब जानते हैं कि पुलिस के समक्ष दिये गये बयान अक्सर दबाव या डर के कारण दिये जाते हैं परन्तु जज के सामने दिये गये बयानों के मामले में अमूमन ऐसा नहीं होता। बयान देने के पहले वे 48 घंटे तक जेल में थे और उन्हें पूरे मसले पर विचार करने का पर्याप्त समय था। ऐसा लगता है कि वे जानबूझकर अपने बयान से पलट गये क्योंकि वे अपने साथियों और अपने पितृ संगठन को बचाना चाहते थे।
यह घटना हमें महात्मा गांधी की हत्या के मुकदमे के दौरान नाथूराम गोडसे द्वारा दिये गये बयान की याद दिलाती है जिसमें उसने यह दावा किया था कि उसका आरएसएस से कोई सम्बंध नहीं है। बाद में उनके भाई गोपाल गोडसे ने एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने आरएसएस से अपने सम्बंधों से इसलिये इंकार किया था क्योंकि वे संघ के अपने साथियों को बचाना चाहते थे। स्वामी भी विधिक सहायता प्राप्त करने के बाद अपने बयान से पीछे हट गये।
अब एक बार फिर उन्होंने वैसी ही पल्टी खाई है। ‘केरेवेन‘ में प्रकाशित उनके साक्षात्कार से देश भर में बवाल मचने के बाद उन्होंने यह कह दिया कि पत्रिका के संवाददाता को दिये गये साक्षात्कार में उन्होंने वह नहीं कहा था, जो कि उनके हवाले से छापा गया है। पत्रिका के संपादक और सम्बंधित रिपोर्टर ने यह दावा किया है कि जो छापा गया है, वह ठीक वही है जो स्वामी असीमानंद ने कहा था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में साक्षात्कार की ऑडियो रिकॉर्डिंग के कुछ हिस्से भी जारी किये हैं। केरेवेन में प्रकाशित साक्षात्कार से न सिर्फ यह सिद्ध हो गया है कि स्वामी का इकबालिया बयान सही था वरन् इससे कई नए तथ्य भी उजागर हुये हैं। यह साक्षात्कार धमाकेदार है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि आतंकी नेटवर्क के तार आरएसएस के मुखिया तक से जुड़े हुये थे। केरेवेन में प्रकाशित खबर कहती है
‘‘…जिस षड़यंत्र में असीमानंद शामिल थे, उसका विवरण शनैः शनैः और विस्तृत होता गया। हमारे तीसरे और चौथे साक्षात्कार में उन्होंने मुझे बताया कि उनके द्वारा किये गये आतंकी हमलों को आरएसएस के शीर्ष स्तर से स्वीकृति प्राप्त थी। वर्तमान आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत, जो उस समय संघ के महासचिव थे, ने इसकी स्वीकृति दी थी। असीमानंद ने मुझे बताया कि धमाकों के सम्बंध में भागवत ने उनसे कहा था, ‘यह महत्वपूर्ण है कि यह किया जाये परन्तु तुम्हें उसे संघ से नहीं जोड़ना चाहिए…’। असीमानंद ने मुझे एक बैठक के बारे में बताया, जो कथित रूप से जुलाई 2005 में…मन्दिर से कई किलोमीटर दूर नदी के किनारे लगाये गये एक टेंट में हुयी थी। भागवत और कुमार, असीमानंद और उनके साथी सुनील जोशी से मिले। जोशी ने भागवत को देश के कई मुस्लिम स्थलों पर बम धमाके करने की अपनी योजना के बारे में बताया। असीमानंद के अनुसार दोनों आरएसएस नेताओं ने योजना को स्वीकृति दी। भागवत ने उनसे कहा ‘तुम सुनील के साथ इस पर काम कर सकते हो। हम इसमें शामिल नहीं होंगे परन्तु अगर तुम यह कर रहे हो तो तुम यह मान सकते हो कि हम तुम्हारे साथ हैं।’’
 (द बिलिवर: स्वामी असीमानंदस् रेडीकल सर्विस टू द संघ, लीना गीता रेघुनाथ, केरेवेन, 1 फरवरी 2014)।
इस लेख में लीना गीता रेघुनाथ लिखती हैं कि उन्होंने पिछले दो वर्षों में स्वामी से चार बार मुलाकात की और उनकी लंबी बातचीतें हुयीं। इस लेख में स्वामी असीमानंद, जो कि आरएसएस के सहयोगी संगठन वनवासी कल्याण आश्रम में थे, की गतिविधियों का विस्तृत विवरण दिया गया है। असीमानंद प्रशिक्षित आरएसएस स्वयंसेवक हैं जो गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में काम करते थे। गुजरात के डांग जिले में आयोजित शबरी कुंभ के वे मुख्य आयोजक थे। वे अपने एजेण्डे का वर्णन काफी साफ शब्दों में करते हैं। उनका लक्ष्य था घरवापसी अभियान के जरिए आदिवासियों को हिन्दू समाज का हिस्सा बनाना। उन्हें आदिवासियों से जुड़े असली मुद्दों में कोई रूचि नहीं थी। आदिवासियों की भलाई के कार्यक्रमों, उनके अधिकारों से उन्हें कोई मतलब नहीं था। मुझे भी याद है कि जब नागरिकों के एक दल के सदस्य बतौर मैं स्वामी के आश्रम गया था, तो वहाँ हमने कुपोषित, अर्द्धनग्न आदिवासी बच्चों को देखा, जो जय श्रीराम कहकर हमारा स्वागत कर रहे थे। हम लोग वहाँ शबरी कुंभ की तैयारियों का अध्ययन करने गये थे। केरेवेन में छपे लेख के कुछ हिस्से आदिवासी क्षेत्रों में उनके काम के बारे में है। मीडिया के एक हिस्से और डांग में ईसाईयों पर हमलों की जाँच रपटों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वे शबरी कुंभ के मुख्य आयोजनकर्ता थे। अब यही बातें स्वामी असीमानंद स्वयं बता रहे हैं।
केरेवेन के लेख का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्वामी असीमानंद अपने राजनैतिक एजेण्डे की चर्चा अत्यन्त गर्व से करते हैं। उन्हें इस बात पर भी गर्व है कि वे जेल की उसी कोठरी में हैं, जिसमें फाँसी दिये जाने के पहले नाथूराम गोडसे को रखा गया था। अपने साक्षात्कार में वे यह भी बताते हैं कि उन्होंने आतंकी हमलों की योजना बनाने, बम धमाकों के लिये स्थान चुनने, बम बनाने के लिये धन जुटाने और बम लगाने वालों को छिपने का स्थान उपलब्ध करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यही बातें उन्होंने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने अपने इकबालिया बयान में भी कहीं थीं।
असीमानंद के अनुसार, ‘‘भागवत ने हिंसा के बारे में कहा…अगर तुम यह करोगे तो लोग यह नहीं कहेंगे कि तुमने कोई अपराध किया। इसे विचारधारा से जोड़ा जायेगा। यह हम हिन्दुओं के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। कृपया यह करो। हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है’’।
अब यह सारा मुद्दा साक्षात्कार की सत्यता पर बहस और ऑडियो टेपों की फोरेन्सिक जाँच आदि में उलझ जायेगा। जब स्वामी मजिस्ट्रेट के सामने दिये गये बयान से पीछे हट सकते हैं तो साक्षात्कार को गलत बताना तो उनके लिये बांये हाथ का खेल है। आरएसएस की गतिविधियों के इस पहलू की गहन जाँच की आवश्कता है और इसमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि आतंकी हमलों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े लोगों की हैसियत क्या है।
(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)  

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