Home » स्वायत्तता और विकेन्द्रीकरण

स्वायत्तता और विकेन्द्रीकरण

ललित सुरजन
यदि सरकार को सचमुच समाज से नजदीकियाँ बनाना हैं, यदि सत्ता का वास्तविक अर्थों में विकेन्द्रीकरण करना है तो इसके लिये भारत जैसे विशाल देश में छोटे प्रान्तों का गठन करना समय की माँग है, यह बात पहिले कही जा चुकी है। इसके साथ-साथ यदि संविधान की मंशा के अनुसार शासन-प्रशासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना है तो इस हेतु स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की खुले मन से स्वायत्तता देना भी अपरिहार्य है, इस ओर मैंने अपने पिछले लेख में संकेत किया था। यह देखना भी जरूरी है कि देश के विभिन्न विधान मण्डलों के चुने गये सदस्य जनाकाँक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने में किस सीमा तक समर्थ हैं। यह कुछ आश्चर्य की ही बात है कि बदलते हुये समय की जरूरतों के अनुसार इस ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था नहीं दिया गया।

भारत की जनतान्त्रिक व्यवस्था व चुनाव प्रणाली में जो भी वास्तविक या काल्पनिक विसंगतियाँ हैं उन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हम कभी अमेरिका की नकल पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली की माँग उठाते हैं, तो कभी जर्मनी की तर्ज पर आम चुनाव करवाने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने विधान मण्डलों को भी कैसे ज्यादा उत्तरदायी बनाया जा सकता है इस पर हमने शायद ही कभी विचार किया हो। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी आदि देशों में जो व्यवस्था लम्बे समय से चली आ रही है उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि वहाँ जनसंख्या लगभग स्थिर है। इसके विपरीत भारत में लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण अनुपातहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। एक लोकसभा सदस्य से कैसे उम्मीद की जाये कि वह पच्चीस या तीस लाख जनता का प्रतिनिधित्व सही ढंग से कर पाएगा? इसी तरह विधानसभा सदस्यों पर भी 1952 के मुकाबले आज चार गुना अधिक जनता का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। यहाँ इस विपर्यय पर भी ध्यान जाता है कि कई जगह नगरीय निकायों में चुने गये प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दिल्ली नगर निगम को एक साल पहले ही तीन में हिस्सों बाँट दिया गया है। गरज यह कि जो फार्मूला नगर निगम के स्तर पर उपयोगी है उसे प्रदेश व देश के स्तर पर किस रूप में कहाँ तक उपयोगी है इस पर चर्चा करना लाजिमी है।

मेरा तो मानना है कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए। अगर बारह सौ हों तो और बेहतर। इसे लेकर कुछ साल पहले बहस चली थी जो आगे नहीं बढ़ पाई। जिन राज्यों की जनसंख्या स्थिर है उन्हें आशंका थी कि लोकसभा का स्वरूप वृहद् हो जाने से उनके महत्व में कमी आ जायेगी और उनकी बातों की अनसुनी होने लगेगी। इस चिंता में सत्य का अंश हो सकता है लेकिन बहस को वहीं के वहीं समेटने के बजाय बेहतर होता कि सभी पक्षों की आशंका और आपत्तियों का निराकरण कैसे हो इसे ध्यान में रखकर बहस आगे बढ़ाई जाती।

इस सन्दर्भ में आज हमारे संसद सदस्यों और विधायकों पर कितना शारीरिक और मानसिक दबाव है इस ओर हमारी तवज्जो जाना चाहिए। यह सच है कि निर्वाचित प्रतिनिधि सदन की कार्रवाई में वांछित रुचि नहीं लेते। इस पर उनकी लगातार आलोचना भी होती है किन्तु दूसरी तरफ अपने क्षेत्र की जनता से बचने का कोई उपाय उनके पास नहीं है। वे मतदाताओं की नाराजगी झेलने की जोखिम उठाने में खुद को असमर्थ पाते हैं। अपने क्षेत्र में एक दिन में उन्हें कितने लोगों से मिलना होता है, कितने कार्यक्रमों में शिरकत करना पड़ती है, कितने आवेदन पत्र उन्हें मिलते हैं इसका मानो कोई हिसाब ही नहीं है। अमूमन जब हम उनके कामकाज की समीक्षा करते हैं तो उनकी इस मजबूरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। सोचिए कि आज यदि एक विधायक को दो लाख की जगह उसके आधे याने एक लाख जनता की नुमाइंदगी करने की व्यवस्था हो तो फिर उनसे सभी मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है या नहीं?

स्थानीय स्वशासी निकायों की स्वायत्तता एक और प्रमुख विचारणीय मुद्दा है। तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन विधेयक लागू हो जाने के बाद अब पूरे देश में स्थानीय संस्थाओं के चुनाव नियमित अवधि में होने लगे हैं। अन्यथा एक समय ऐसा था जब राज्य सरकार की मर्जी हो तो चुनाव करवाए और मर्जी न हो तो निकाय भंग कर प्रशासक बैठा दे। याद करें कि 1957 में रायपुर नगर पालिका के चुनाव हुये तो अगले चुनाव उसके बाइस साल बाद 1979 में कहीं जाकर सम्पन्न हो पाये। चुनाव न करवाने के पीछे प्रदेश के कद्दावर नेताओं के निजी व राजनैतिक दोनों कारण थे। रायपुर जैसी ही स्थिति मध्यप्रदेश के अन्य शहरों में भी थी। यही स्थिति पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर बनी। इस नाते उपरोक्त संविधान संशोधन विधेयकों का लागू होना जनतान्त्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की दृष्टि से एक ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। इसका श्रेय राजीव गांधी को दिया जाना चाहिए।

यह तो ठीक है कि अब नियमित रूप से चुनाव हो रहे हैं, लेकिन सम्बंधित कानूनों में भी कुछ ऐसी कमियाँ हैं जिनके कारण उनसे अपेक्षित लाभ मिलने में बाधाएं आ रही हैं। इनमें कहा गया है कि राज्य सरकारें स्थानीय निकायों के संचालन के लिये अपने स्तर पर नियम-उपनियम बना सकती हैं। इसके कारण विसंगतियाँ पैदा हो रही हैं। किसी राज्य में महापौर का कार्यकाल एक वर्ष का है तो कहीं पाँच वर्ष का। कहीं महापौर का निर्वाचन प्रत्यक्ष हो रहा है, तो कहीं अप्रत्यक्ष। कहीं सामान्य सभा में निर्णय हो रहे हैं तो कहीं महापौर की मंत्रणा परिषद में। पंचायत स्तर पर कहीं दलगत आधार पर चुनाव हो रहे हैं, तो कहीं बिना उसके। इसके अलावा इन निकायों में जो अधिकारी बैठाए गये हैं वे अपने आपको निर्वाचित निकाय के बजाय राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह मानते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर की इन प्रतिनिधि संस्थाओं का सुचारू रूप से चलना कठिन होते जा रहा है।

इस बारे में हमारी सोच स्पष्ट है। हमारे यहाँ केन्द्र और राज्य के बीच सम्बंध इस तरह के हैं कि राज्य सरकारें अपने दैनन्दिन कामों व सामान्य जरूरतों के लिये केन्द्र पर निर्भर नहीं हैं। केन्द्र और राज्य के बीच अधिकारों व शक्तियों का बँटवारा स्पष्ट है। राज्य के पास ऐसे अनेक अधिकार हैं जिनमें केन्द्र का हस्तक्षेप हो ही नहीं सकता। ऐसे भी कुछ क्षेत्र हैं जिनमें दोनों को अधिकार हैं जो कि समवर्ती सूची में वर्णित हैं। यही नहीं दोनों के बीच आर्थिक संसाधनों का बंटवारा करने के लिये भी एक पारदर्शी प्रणाली लागू है। केन्द्र द्वारा निश्चित अन्तराल पर वित्त आयोग का गठन किया जाता है। उसकी सिफारिशों के आधार पर केन्द्र से संचित निधि व आयकर आदि मदों से राज्यों को धनराशि का आबंटन होता है।

इसके विपरीत दुर्भाग्य से केन्द्र व राज्य के बीच स्वस्थ सम्बंध बनाने के लिये जो प्रणाली अपनाई गयी है उसकी भावना को राज्य सरकारें समझने से इंकार करती हैं। हमारे छत्तीसगढ़ में ही तीन बार राज्य वित्त आयोग का गठन हो चुका है, लेकिन इनकी कार्यप्रणाली, इनकी सिफारिशें व उन पर अमल को लेकर कोई साफ तस्वीर हमारे सामने नहीं है। जिन नगरीय निकायों में विपक्षी दल का महापौर अथवा बहुमत है उनके प्रति सौतेला बर्ताव होने की खबरें आए दिन प्रकाशित होती हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि सत्ता पक्ष द्वारा विपक्षी महापौर के क्रियाकलापों में हर तरह से अड़चन खड़ी करने की कोशिश होती है। इसी तरह जिला पंचायत व जनपद पंचायत में भी ओछी राजनीति के खेल देखने मिलते हैं। ऐसे में स्थानीय निकायों की स्वायत्तता एक अधूरी इच्छा बनकर रह जाती है।

आदर्श स्थिति तो तब होगी जब राज्य व स्थानीय निकायों के बीच भी परस्पर संवाद हो, कामकाज का स्पष्ट बँटवारा हो व पारदर्शी तरीके से संसाधनों की भागीदारी हो। इसके लिये हर राज्य में मुख्यमंत्री को ही उदारभाव से पहल करना होगी। उन्हें राजनीति में त्वरित लाभ के मोह से बचना होगा।

देशबंधु में 06 मार्च 2014 को प्रकाशित

About the author

ललित सुरजन, लेखक प्रख्यात साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं। देशबंधु के प्रधान संपादक हैं।

 

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: