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Jagadishwar Chaturvedi

हमारी विरासत- झारखंड की भूमि और किसानचेतना- स्वामी सहजानंद सरस्वती

बिहार और छोटानागपुर सूबे का दक्षिणी हिस्सा (Southern part of Chhotanagpur provinces and Bihar) ही झारखंड (Jharkhand) कहा जाता है। यह पुराना नाम है। संस्कृत में वनखंड या वनषंड शब्द जंगली या पहाड़ी भूभाग के लिए बार-बार पुरानी पोथियों में आया है। आज भी चलती भाषा में झाड़ शब्द पेड़ों के ही मानी में आता है। ‘झार’ और ‘झाड़’ इन दोनों में कोई फर्क नहीं है। ‘झाड़’ की ही जगह पहले ‘झार’ बोलते थे। इस प्रकार संथाल परगना और छोटानागपुर के पाँच जिले इस प्रान्त के जंगल प्रधान भूभाग को लेकर ही बने हैं।

शाहाबाद के सहसराम  सब-डिविजन के कुछ हिस्से, गया का अधिकांश दक्षिणी हिस्सा, मुंगेर और भागलपुर के भी दक्षिणी भाग का बहुत कुछ अंश इसी झारखंड से मिलकर इसे और भी विस्तृत बनाता है।

इसी झारखंड के सिंहभूम जिले के पश्चिमी हिस्से से एक ओर उत्कल के गांगपुर स्टेट का मेल हो जाता है और दूसरी ओर दक्षिणी भाग में उत्कल या उड़ीसा के सूबे के मयूरभंज, बोनाई, क्योंझर रियासतों का।

पलामू के साथ युक्तप्रान्त के मिर्जापुर का भी गंठजोड़ा है। और सरगुजा स्टेट का। राँची के साथ सरगुजा, जशपुर और गांगपुर राज्यों का सम्बद्ध हो जाता है। सिंहभूम तथा मानभूम के पूर्वी हिस्से बंगाल से जुट जाते हैं। संथाल परगना तो दक्षिण और पूर्व में बंगाल से जुटा हुआ ही।

खूबी तो यह है कि बंगाल, उत्कल, मध्‍यानप्रान्त या युक्तप्रान्त के जिन हिस्सों से इस झारखंड का सम्‍बन्‍ध जुटा है वे सभी इसी तरह पर्वत तथा जंगल मय हैं। फलत: चारों ओर अपने जैसे ही भूभागों से घिरे होने के कारण यह झारखंड अत्यन्त विस्तृत हो जाने के साथ ही दुष्प्रवेश और अगम no man’s land बन जाता है। यही कारण है कि यहाँ के निवासियों की अपनी निराली दुनिया मानी जाती थी।

जैसे अथाह समुद्र के भीतर के जीव-जंतु अपने आपको सुरक्षित समझते हैं वैसे ही ये लोग अपने को कम सुरक्षित नहीं मानते थे। इनने ठेठ प्रकृति माता की गोद में ही बसेरा समुद्री मच्छ-कच्छपों की तरह लिया था। इन भयंकर काँटों-कुशों से घिरे, निबिड़ और दुष्प्रवेश प्रदेश में उन्हें सताने के लिए जाने की हिम्मत किसे होती? अगर काँटे-कुशों की परवाह कोई न भी करता तो भी भयानक सिंह-व्याघ्रों और भालू-भेड़ियों की याद से तो दुश्मनों के देवता ही कूच कर जाते। प्रकृति माता ने अपने इन पुत्रों की रक्षा के लिए अपने हाथों बनाए इस गढ़ के भीषण सन्तरी के रूप में इन खूँखार जानवरों को काफी तादाद में चारों ओर रख छोड़ा था, ताकि उसमें घुसने की हिम्मत करनेवालों से दूर से ही ये चिंघाड़ मार के कह दें, डाँट दें कि खबरदार कौन आ रहा है who comes there ?

इसीलिए तो दिन-रात इनका पहरा पड़ता रहता है। मगर क्या इतने पर भी इनकी जान बच सकी है? क्या इस अभेद्य दुर्ग के भीतर भी शत्रु लोग घुस नहीं आए? उनने इनकी लूटपाट क्या खूब ही नहीं की? क्या अब भी नहीं कर रहे हैं? इसी का कुछ-कुछ पता तो आगे मिलेगा।

इस वर्णन में और तो कुछ है नहीं सिवाय इस लूट के संक्षिप्त वर्णन के। जैसे अथाह और अतल सागर के गर्भ में क्रीड़ा करने वाले जीव-जंतुओं को फँसाने के लिए मनुष्य के दिमाग ने महाजाल तैयार किया है; जिस प्रकार गहरे पानी के बीच रहने वाली मछलियों को फँसाने के लिए बंशी तैयार की गई है, ठीक उसी प्रकार इन झारखंडवासियों को फँसाने और इनका रक्त-माँस वगैरह सभी कुछ चाट जाने के लिए सैकड़ों उपाय चतुर खिलाड़ियों और काइयाँ यारों ने ढूँढ़ निकाले हैं।

ऐसे-ऐसे जाल बिछाए गए हैं कि यदि एक से बचे तो दूसरे, नहीं तो तीसरे, चौथे में तो खामख्वाह फँसेगे ही। ज्यादातर तो ऐसा होता है कि एके बाद दीगरे कई जालों में ये बेचारे सीधो-सादे लोग फँस के छट्ट-पट्ट करते और तिलमिला के मरते रहते हैं।

खूबी तो यह है कि जितना ही दक्षिण बढ़ते जाइए उतना ही शोषण ज्यादा मिलेगा, हालाँकि उसी तरफ अपार धानराशि है कोयला है, अबरक है, लोहा है और क्या-क्या नहीं है। ऐसा क्यों होता है यह जानने के पूर्व इस झारखंड के दक्षिणी या यों कहिए कि दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों की रचना पर थोड़ा ध्‍यान देना जरूरी है। इसके लिए नक्शे को देखना होगा।

उड़ीसा की रियासतों का जिक्र तो पहले किया ही है। उन रियासतों ने समूचा दक्षिणी हिस्सा तो घेरी लिया है। वह पश्चिमी हिस्से का भी अधिाकांश घेरे पड़ी है और मध्‍यप्रान्त के सरगुजा ने भी कुछ पश्चिमी हिस्से को छेंक लिया है। उत्कल की सरायकेला, करायकेला और खरसवाँ इन तीनों रियासतों की तो यहाँ तक हालत है कि सिंहभूम के पेट में घुस गई हैं। या यों कहिए कि इस जिले को ही काट के ये तीनों बनी हैं।

सिंहभूम जिले के पूर्वी सब-डिविजन दलभूम (धाल या ढलभूम भी कहते हैं) को पश्चिम के सदर या चाईबासा सब-डिविजन के बीच में ही सरायकेला है और उसी से मिली उससे छोटी रियासत खरसवाँ है जो उससे पश्चिम है।

इस प्रकार जिले को दो हिस्सों में बेलाग बाँट देने (क्योंकि सिंहभूम में तो दोई सब-डिविजन हैं) के बाद भी सन्तोष नहीं हुआ और चाईबासा के उत्तारी हिस्से को काट के एक नन्हीं सी रियासत करायकेला नाम की उसकी छाती पर बिठा दी गई है।

इसके बाद दलभूम के दक्षिण पूर्व से बंगाल की सीमा शुरू होती है। जिसका पहला जिला मिदनापुर उसके दक्षिण-पूर्व और पूर्व में है। मानभूम के पूर्व में बांकुड़ा और बर्दवान का कुछ हिस्सा है।

संथाल परगना के पूर्व-दक्षिण कुछ हिस्से में बर्दवान और उसके पूर्व वीरभूम, मुशदिाबाद और मालदा का कुछ भाग पड़ता है। इस प्रकार समस्त छोटानागपुर का पूर्वी हिस्सा बंगाल के अनेक जिलों से घिरा है। यही कारण है कि छोटानागपुर (झारखंड के पूर्वी) जिले या उनके पूर्वी हिस्से बंगालियों की भूमि जैसे बन गए हैं और उनमें या तो सीधो बंगाली लोग या बंगलाभाषी दूसरे लोग बसते हैं। ये हिस्से बिहार की अपेक्षा बंगाल से ज्यादा मिलते और उसी के भाग मालूम पड़ते हैं। वहाँ जो आदिवासी लोग हैं उनकी भाषा भी खिचड़ी-सी हो गई है और उनकी अपनी तथा बंगला भाषा की खिदमत मिदमत के करते अजीब-सी मालूम पड़ती है। उसे अकसर खोरठा बोली भी कहा करते हैं।

अब जहाँ तक सरगुजा या उत्कल की रियासतों का ताल्लुक है, उनमें तो निरंकुश शासन टाँगें तोड़ के बैठ गया है। उनके लिए तो बीसवीं सदी मालूम होता है, आई ही नहीं है। मध्‍यानयुग के अन्धाकाराच्छन्न समय से ही वे रियासतें गुजरती हैं जहाँ तक जनता के अधिकारों और लोकशासन का ताल्लुक है। उनके राजे खुद तो मोटर, रेडियो वगैरह सभी अपटुडेट चीजें रखते हैं। मगर जनता को पशु की जिन्दगी बिताने पर ही विवश करते हैं।

उत्कल राज्य-परिषद के मंत्री श्री शार्र्धार दास ने जो जाँच कमिटी की रिपोर्ट छपवाई है उसे पढ़ के तो पता लगता है कि वहाँ दूसरी ही दुनिया है, जहाँ विवाह-शादी, सभा-सोसाइटी, पंचायत और मृतक जलाने तक पर भी कर लगते हों या सरकारी आज्ञा की जरूरत हो और जहाँ पान वगैरह की बिक्री पर टैक्स लगे हों उन राज्यों की जनता का तो खुदा हाफिज।

तीन-चार साल पूर्व उत्कल की कई रियासतों में जो गोली कांड हुआ था और सिंहभूम के पड़ोसी राज्य गांगपुर में ऐसी ही घटना हुई थी उसका चित्र तो हमारी आँखों के सामने ताजा ही है। और जब वही रियासतें न सिर्फ झारखंड को बहुत दूर तक घेरे हुए हैं, बल्कि उसके पेट तक में घुस गई हैं तब यहाँ के लोगों की दशा यदि अत्यन्त पिछड़ी न हो और इनका यदि कोई सच्चा पुर्साहाल न हो तो इसमें आश्चर्य होई क्या सकता है? पड़ोसी का असर तो होना ही चाहिए।

बंगाल से घिरे होने के कारण भी इनकी अजीब दशा इसलिए है कि यहाँ रोज खींच-तान बनी रहती है कि यह बंगाल में रहे या बिहार में। जमशेदपुर, राँची, पुरूलिया आदि शहरों में तो इसकी धूम बराबर ही रहती है।

बदकिस्मती से बिहार में बंगाली-बिहारी झमेला उठ खड़ा हुआ है। उसका सबसे बुरा नतीजा इस झारखंड को ही भोगना पड़ता है। यह साझे का खेत जो ठहरा। बिहार के बाकी जिले तो ऐसे हैं नहीं। मगर यहाँ कुछ ऐसी बात है कि कई लोग इन पर दावेदार हैं। नतीजा यह है कि प्रगति का असली काम हो पाता नहीं। साझे की जमीन तो हमेशा परती ही रहा करती है। उसमें उपज कोई हो कैसे?

इधर एक तीसरे दावेदार हो गए हैं आदिवासी आन्दोलन वाले मध्‍यमवर्गीय लोग। जिस प्रकार बंगाली-बिहारी समस्या मध्‍यमवर्गीय बाबुओं और पढ़े-लिखों की है, ठीक वैसी ही यह भी है। इनने देखा कि हमीं क्यों चूकें जबकि हमारे दो प्रतिद्वन्द्वी आपस में लड़ते हैं तो हम उससे फायदा क्यों न उठा लें। क्योंकि ‘जबकि दो मूजियों में हो खटपट। अपने बचने की फिक्र कर झटपट।’

इस तरह इस तिहरी लड़ाई (triangular fight) के बीच यह झारखंड पिस रहा है।

झारखंड के संथाल परगना जिले की तो यह हालत है कि वह प्राय: सब ओर से सभ्य कहे जाने वाले लोगों से घिरा है। बंगाल के जिलों के सिवाय बिहार के भागलपुर और मुंगेर ने दूसरी ओर से घेर लिया है। यह ठीक है कि जो भाग भागलपुर और मुंगेर का संथाल परगना या हजारीबाग से मिलता है उसमें बहुत कुछ आदिवासी भी रहते हैं। मगर वे एक तो दूसरों से मिले-जुले हैं। दूसरे सभ्य लोग नजदीक ही तो हैं जो आसानी से सर्वत्र घुस जाते हैं। यही बात बाकी हिस्से की है जो गया, पटना और शाहाबाद आदि जिलों से सटे हुए हैं। उनसे मिला हुआ इन जिलों का हिस्सा पहाड़ी और जंगली जरूर है और उसमें कुछ असभ्य या अर्धअसभ्य कहे जाने वाले लोग बसते हैं। मगर सभ्य बाबू लोग भी वहाँ तथा नजदीक में ही पड़े होने के कारण भीतर घुस गए हैं, घुसते जाते और इन भोले-भाले लोगों को हर तरह लूटते हैं। इस प्रकार चारों ओर से उनकी जमीनें और कमाई लुट रही है और वे तबाह हो रहे हैं।

इस बात की ज्यादा जानकारी आगे होगी कि लूट के तरीके कौन-कौन से हैं। मगर इतना तो साफ है कि इन झारखंडवासियों के साथ दूसरे शोषक लोग महाजन, सूदखोर आदि के रूप में मिल के इन्हें तबाह करते आ रहे हैं।

यदि इस तरह के सभ्य कहे जाने वाले इलाकों से इनका सम्‍बन्‍ध ‍नहीं होता, तो यह दुर्दशा तो हर्गिज नहीं होती, और अगर होती भी तो थोड़ी-थोड़ी, सो भी बहुत धीरे-धीरे। यह विस्तार और तेजी उस तबाही की हर्गिज नहीं होती।

पहले तो संथाल परगना के बारे में ही ऐसा खयाल किया जाता था कि सभ्य लोग उसके भीतर घुस के वहाँ के मूल निवासियों को तबाह करते हैं। सरकार का तो कम से कम ऐसा ही कहना है। इसीलिए उस जिले के लिए खासतौर की शासन व्यवस्था बनाई गई बताई जाती है।

हो सकता है, हिन्दुओं का एक प्रधान तीर्थ स्थान होने के कारण यह बात वहाँ पहले ज्यादा रही हो और भक्ति के बहाने भगवान को ठगने वाले वहाँ ज्यादा संख्या में पहुँच के इन भोले-भाले लोगों को भी बहुत पहले ठगने लगे हों। मगर अब तो यह बात कमोबेश सभी जिलों में एक ही तरह की पाई जाती है। सर्वत्र जमीनों पर दूसरे लोग काबिज हो गए और होते जा रहे हैं धाड़ाधाड़। इसलिए कांग्रेसी मंत्रिायों के जमाने की जाँच कमिटी की रिपोर्ट के चौथे पृष्ठ में जो बात इस सम्‍बन्‍ध्  में कही गई है वह सर्वत्र लागू है। वहाँ लिखा है कि,

‘The system was designed and created to meet the needs of an area which contains a large proportion of somewhat primitive aboriginals and semi-aboriginals intermingled in varying proportions with a more advanced population.  The problems arising out of this mixture of population are intensified by the fact that, unlike the other large aboriginal tracts in the province, the district is almost surrounded by areas inhabited by more advanced people and suffering from an excessive pressure of population on the soil.  This has throughout the last century produced a steady tendency for the surrounding population to encroach upon the land of the aboriginals and to exploit that population.* ‘

खास ढंग जो की शासन प्रणाली यहाँ बनाई गई वह इस इलाके की जरूरतों को पूरा करने के ही लिए बनी। क्योंकि यहाँ एक खासी तादाद मूल आदिवासियों तथा अर्ध-आदिवासियों की है जिसके साथ कहीं कम, कहीं ज्यादा इस तरह प्रगतिशील लोग मिले हुए हैं। इस तरह की खिचड़ी जनसंख्या को लेकर जो समस्याएँ खड़ी हुई हैं वह और भी पेचीदा इसलिए हो गई हैं कि इस प्रान्त के और आदिवासियों के निवास स्थान स्वरूप बड़े हिस्सों के विपरीत यह जिला प्राय: चारों ओर ऐसे इलाकों से घिरा है जहाँ ज्यादा प्रगतिशील और सभ्य लोग बसते हैं और उनकी आबादी घनी होने के कारण जमीन जोतने पर ज्यादा जोर देते हैं। इसी का फल है कि गत समूची शताब्दी में इर्द-गिर्द के लोगों ने यहाँ के आदिवासियों की जमीनों को दबाया है और इनका शोषण करने पर वे ज्यादा झुके हैं।’

यह कहना कि यह बात केवल संथाल परगना के लिए है, बेबुनियाद है। हजारीबाग या मानभूम की जनसंख्या का विश्लेषण करने से पता लग जाता है कि वहाँ भी बहुसंख्य ऐसे लोग पाए जाते हैं जो आदिवासी नहीं हैं और किसी न किसी रूप में वहाँ के मूल निवासियों के शोषक के रूप में ही वहाँ जा बसे हैं। आज भी उनका शोषण अविच्छिन्न रूप से जारी है। अधिकांश जमीनें उनने हथिया ली हैं।

पारसनाथ पहाड़ और उसके पास की जमीनों तथा जंगल-झाड़ियों की कहानी यदि आज सुनाई जाए तो सहृदय लोगों के खून के ऑंसू बह निकलें।

जैसे वैद्यनाथ धाम हिन्दुओं का तीर्थस्थान है वैसे ही वह जैनियों का। मगर जीव हिंसा से भागने वाले तथा जीव दया के बडे हामी कहे जाने वाले जैनी मालदारों ने वहाँ के संथालों तथा दूसरे निवासियों को जितना सताया है, आज भी वे उन्हें जितना सता रहे हैं वह वर्णनातीत है। उनने पहाड़ और पास के जंगल, झरने खरीद लिए हैं और सर्वे में सब पर अपना पूरा कब्जा लिखवा लिया है।

भोले-भाले गरीब लोग सर्वे क्या जानने गए? मगर उसी के बल पर कानून की छत्रछाया में संथाल लोग पानी, घास, पात, लकड़ी, जलावन, फल, फूल आदि वहाँ के सभी पदार्थों से बुरी तरह वंचित कर दिए गए हैं। उनकी दुर्दशा ऐसी है कि उनकी खबर लेने वाला कोई दीखता नहीं। यहाँ तक कांग्रेसी मंत्रिमंडल के जमाने में भी उनकी सुनवाई नहीं हो सकी!

ऐसे बहुतेरे दृष्टान्त हैं। इसलिए अब संथाल परगना को छोटानागपुर के और जिलों से इस मामले में जुदा बताया जा सकता है नहीं। ऐसा कहना सरासर गलत है। टाटा  की लूट तो आगे बताएँगे।

एक बात जरूर हुई है कि बंगाली-बिहारी झमेले के चलते और बिहारखंड तथा झारखंड की सीमा पर सर्वत्र पहाड़ी इलाके दूर तक फैले रहने के कारण बिहार से भी आदिवासियों तथा झारखंड के किसानों एवं जनता की जागृति का काम ठीक-ठीक हो नहीं सका है।

जब हम खुद गया, पटना, मुंगेर, भागलपुर आदि के दक्षिणी पहाड़ी हिस्सों में ही पूरा काम नहीं कर पाते जिससे और भागों की अपेक्षा वे पिछड़े हुए हैं तो और आगे बढ़ के झारखंडवासियों में जन-जागरण कैसे कर सकते हैं?

मेरा तो निजी अनुभव है कि इन दक्षिणी भागों में ज्यादा जा नहीं सका हूँ। कुछ स्थान तो ऐसे हैं जहाँ एक बार भी जाना हो नहीं सका है, हालाँकि ऐसे स्थान इने-गिने ही हैं। इनके दक्षिण जाके आदिवासियों में विशेष काम मैं खुद नहीं कर सका हूँ। जोकि मेरे दौरे प्राय: सर्वत्र हुए हैं। मगर वे तो बहुत ही नाकाफी हैं। उनसे काम करने का रास्ता ही तैयार हो सका है, न कि ज्यादा कुछ। खैर, यह तो एक बात है।

झारखंड की भूमि, जैसा कि कही चुके हैं, जंगल और पर्वत की ही भूमि है। पलामू के कुछ हिस्सों में और हजारीबाग, मानभूम के भी कुछ भाग में समतल जमीन मिलती है। समतल के मानी सिर्फ इतना ही कि पहाड़ों की श्रेणियाँ नहीं मिलती हैं। सिर्फ कहीं-कहीं पहाड़ियाँ खड़ी मिलती हैं।

संथाल परगना की भी कुछ ऐसी बात है। फिर भी बिहार की तरह उपजाऊ और समतल भूमि कहीं भी क्यों मिलने लगी? नदी-नाले तो सर्वत्र मिलते ही हैं जो न सिर्फ जमीन को ऊबड़-खाबड़ बना देते हैं, बल्कि उसे धोधा के साथ और प्राय: निर्जीव कर देते हैं। इसीलिए जमीन में पैदावार बहुत ही कम होती है।

पलामू की तो यह दशा है कि जमीन बहुत ही रद्दी है। पहाड़ों के बीच की ही जमीनें कुछ अच्छी और पैदावार हैं। पहाड़ी इलाके तो पैदावार के लिहाज से बहुत ही चौपट हैं। फिर चाहे वह झारखंड में हैं, या दूसरी जगह। जिस प्रकार चीन की जमीनें धान की उपज के लिए बहुत ही अच्छी मानी जाती हैं वह बात यहाँ नहीं है। इसलिए यहाँ के किसान बहुत ही गरीब और भूखे हैं।

हजारीबाग और राँची जिले के कुछ हिस्से काफी ऊँचे और ठंडे भी हैं। इसीलिए गवर्नर वगैरह गर्मियों में राँची में रहने और नेतरहाट भी चले जाते हैं।

नेतरहाट तो पलामू के महुवाडांड थाने के सिवाने पर ही है। इसीलिए पलामू का वह हिस्सा भी ठंडा है। बिहार की अपेक्षा छोटानागपुर तो ठंडा ही, क्योंकि यह समस्त भूखंड कछुवे पीठ की तरह ऊँचा है। इसी ठंडक और यहाँ की पिछड़ी दशा ने शोषकों को मौका दिया कि वे इसके भीतर हजार बहानेबाजी से घुस के मूक जनता का वस्त्रामोच करें और उन्हें जिबह करें। लेकिन यह भूमि देखने के लिए ऊपर से जितनी ही रूखी, नीरस और रद्दी प्रतीत होती है, भीतर से उतनी ही सरस, बहुमूल्य, सरस तथा वांछनीय है। यहीं कोयले का अपार भंडार है। जिसके बिना आज के कल-कारखाने, हमारी रेलें और सारा का सारा शासन यंत्रा ही रुक जाए।

इस कोयले को काला सोना (Black Gold) कहते हैं और यह अक्षरश: सही है। इस दुनिया का तो सारा कारबार ही आज बन्द हो जाए यदि यह अमूल्य पदार्थ न हो।

वर्तमान पूँजीवाद की नींव इसी कोयले, पेट्रोल, लोहे और रबर आदि से ही बनी है। अबरक भी उनमें एक है। इसीलिए इस दृष्टि से इस भूभाग को अमूल्य कह सकते हैं। यह सारे सूबे का प्राण है यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं है।

संथाल परगना, मानभूम, हजारीबाग और राँची के कुछ भाग में यह बहुतायत से पाया जाता है। कतरास, झरिया की कोयले की खानें तो संसार में प्रसिद्ध हैं। लोहा भी यहाँ काफी है।

टाटा का जो जमशेदपुर में बड़ा भारी लोहे का कारखाना है और उसी के साथ जो और भी दर्जनों कारखाने हैं वह आखिर इस झारखंड में ही तो हैं। सिंहभूम जिले के दलभूम सब-डिविजन का ही हेडक्वार्टर जमशेदपुर है। वहाँ लोहे के सिवाय दूसरी चीजें भी तैयार होती हैं। ताँबा और पीतल ये दो चीजें भी उसी सब-डिविजन के जमशेदपुर और घाटशिला के इलाके में तैयार होती हैं।

लोहे का यह कारबार तो भारत में सबसे बड़ा है। ऐसा कारखाना और कहीं नहीं है। अबरक भी यहाँ बहुत है। ज्यादातर हजारीबाग जिले के उत्तारी हिस्से में इसकी खानें जगह-जगह पाई जाती हैं। वह सारी की सारी भूमि अबरक को ही अपने गर्भ में रखे पड़ी है।

कोडरमा अबरक का बड़ा सेण्टर माना जाता है। यहाँ से वह देश-विदेश भेजा जाता है। असल में हजारीबाग का गिरिडीह सब-डिविजन इस अबरक के लिए काफी प्रसिद्ध है। उसकी जमीन के भीतर यह अमूल्य पदार्थ बहुतायत से पाया जाता है। उस इलाके में हमने कदम-कदम पर इसकी खानें और कारखाने देखे हैं। अमेरिका आदि देशों के लोगों ने भी यहाँ खानें ले रखी हैं। गिरिडीह में तो कोयले की भी बड़ी भारी खान है। यह तो हुई जमीन के भीतर की बात। मगर जमीन के ऊपर जो साखू वगैरह की लकड़ियों की अपार राशि है वह कम मूल्य की चीज नहीं है। सभी तरह के जंगल यहाँ हैं और तरह-तरह के काष्ठएँ उनमें पाए जाते हैं।

आजकल बाँस से कागज बनता है और उन बाँसों की बहुतायत यहीं पर है। पत्थरों का तो पूछिए मत। तरह-तरह के पत्थर यहाँ भरे पड़े हैं। जिस लाख (लाह) की बड़ी कीमत है वह भी तो यहीं पैदा होती है। पलास, कुसुम और बेर इन तीन वृक्षों पर ही खासतौर से यह चीज पैदा होती है और ये वृक्ष मानभूम, पलामू, राँची, संथाल परगना आदि सभी जिलों में बहुतायत से पाए जाते हैं। यहाँ लाह की यह उपज काफी है। इसके चलते किसानों की कम परेशानी नहीं होती। जमींदार लोग लाह के पेड़ों पर जबर्दस्ती अपना कब्जा किए बैठे हैं। खेत है किसान का। मगर उसी खेत में जो पलास है और जिस पर लाह के कीड़े लगते हैं वह जमींदार का माना जाता है!

सिर्फ जबानी ही यह हिसाब नहीं है। सर्वे खतियान में भी दर्ज है! यह बात अक्ल में तो आने की नहीं। मगर कागज में तो आई गई है। फलत: हाकिमों के दिमाग में भी आसानी से आ जाती है। इस कागज के मुकाबले में सोचने की कोई कीमत वे नहीं करते और ऑंख मूँद के फैसला देते हैं! फिर तो किसान की खुदा ही खैर करे! उसे पूछता कौन है?

इस तरह हमने देखा कि झारखंड की भूमि तो सोना पैदा करती है, अपार सम्पत्ति देती है। इसका अबरक, इसका कोयला, इसका लोहा, इसकी लाह इसकी बहुमूल्य लकड़ियाँ और इसके रंग-बिरंगे पत्थरों के चलते देश-विदेश के लोग करोड़पति बन बैठे हैं, बनते चले जा रहे हैं। तमाम खानें दूसरों के हाथों में हैं। बम्बई से टाटा ने असंख्य धन कमाया है, लूटा है। मगर पाँव तले अंधेरा है। खुद इसी इलाके के लोग दरिद्र के दरिद्र हैं।

कहते हैं कि महादेव झारखंडी कहलाते हैं, झाड़ों और जंगलों में रहते जो हैं। वे स्वयं तो दरिद्र हैं। मगर सेवकों को कुबेर बनाते हैं। ठीक यही बात इन झारखंडियों की है। खुद दरिद्र हैं। मगर गैरों को मालामाल बना दिया है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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