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हमारे गाँव और पीडीएस

धनंनजय कुमार
हमारे गाँवों का मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है। कृषि उत्पादन पहले की अपेक्षा बढ़ा भी है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह दुखद सच उद्घाटित होता है कि दुनिया का हर दूसरा कुपोषित नागरिक भारतीय है। भारत सरकार भी मानती है कि गाँव की 75% प्रजा भूख से जूझ रही है। निश्चित तौर पर यह हमारे लिये चिंता और चिंतन की बात है कि कृषिप्रधान देश होने के बावजूद हमारे देशवासी सेहत के योग्य भोजन पाने में अक्षम क्यों है, जबकि देश के सरकारी गोदाम अनाज से भरे हैं। रखे-रखे अनाज गोदामों में सड़ भी रहे हैं ? सरकार इसकी वजह गरीबी को मानती है। आम आदमी गरीब है, इसलिये ज़रूरत भर अनाज भी वह खरीद नहीं पाता। सरकार इसमें अपनी असफलता मानने से भी नहीं हिचकती, क्योंकि गरीबी दूर नहीं कर पाने की वजह वह देश की बढ़ती जनसंख्या को मानती है, जिसके लिये उससे कहीं अधिक जिम्मेवार जनता है।

बहरहाल, उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद भारत सरकार ने भोजन को नागरिक के अधिकार में शामिल किया, ताकि हर आदमी को दोनों समय का भोजन अनिवार्य रूप से मिल सके। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक नेक निर्णय है। एक तरफ अनाज गोदामों में सड़ता रहे और दूसरी तरफ जनता भूख से मर जाय, कुपोषण का शिकार बनकर बीमारियों से मर जाय, लोकतंत्र में इससे अधिक क्रूर मज़ाक कुछ और नहीं हो सकता। सरकार उन ज़रूरतमंदों तक अनाज पहुँचाने का काम करती है, बेशक यह एक उत्तम काम है, मगर सरकार जिस तरह से यह काम कर रही है, उसमें उसकी मंशा पर शक और सवाल दोनों खड़े होते हैं।

भारत की भूखी जनता तक अनाज पहुँचाने की व्यवस्था (पीडीएस) पहली बार 1940 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत को तब करनी पड़ी थी, जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था। उसके बाद भारत सरकार को फिर इस प्रणाली की मदद लेनी 60 के दशक में देश में आये भयंकर अकाल से जनता को बचाने के लिये। उसके बाद देश में हरित क्रांति आई, अनाज की पैदावार दूनी हो गयी। इसके साथ ही बिजली के प्रसार और सिंचाई के लिये नहर आदि अन्य विकल्पों ने सूखे की आशंका को कमतर बना दिया। मगर पीडीएस फिर भी रुका नहीं, तब से वह लगातार अपनी सेवा देता आ रहा है। और अब जब सरकार ने भोजन को नागरिक अधिकार में शामिल कर दिया है तब पीडीएस की भूमिका और उपयोगिता और बढ़ गयी है। देश भर में अभी तकरीबन पाँच लाख पीडीएस दुकानें हैं।

मगर गाँव के ज़रूरतमंदों तक सरकार जिस तरह से अनाज पहुँचाती है, वह अव्यावहारिक, खर्चीला और भ्रष्टाचार से भरी कुव्यवस्था का शिकार है। सरकार यह अनाज विदेशों से नहीं मँगवाती, बल्कि राज्य सरकारें गाँव के किसानों से ही खरीदकर भारत सरकार को देती है। भारत सरकार उस अनाज को शहर स्थित खाद्य निगम के गोदामों में जमा करती है। फिर केन्द्र सरकार पीडीएस के तहत बाँटने के लिये गोदाम से अनाज वापस राज्य सरकार के पास भेजती है और राज्य सरकार उसे गाँव स्थित पीडीएस दुकानों में भेजती है। यानी गाँव से शहर गया अनाज वापस गाँव आता है। इस तरह अनाज की इस आवाजाही में करोड़ों रुपयों का गैरज़रूरी खर्च तो होता ही है, अनाज की इस उठापटक में अनाज की अच्छी खासी बर्बादी भी होती है। जबकि यही अनाज पंचायत या ब्लॉक स्तर पर गोदाम बनाकर जमा किये जा सकते हैं और समय के साथ वहीं बाँटा जा सकता है। इससे अनाज की बर्बादी रुकेगी और रखरखाव पर खर्च भी कम आयेगा।

फिर पीडीएस तक पहुँचने वाले अनाज की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती। यह अनाज प्रजा को कुपोषण से बचाने के लिये दिया जा रहा है, मगर वह नया और बढ़िया होने के बजाय पुराना और कई बार कीड़े लगे होते हैं। अनाज जिस राशन कार्ड के आधार पर बाँटा जाता है, उसमें भी गड़बड़ियाँ हैं। सही आदमी का राशन कार्ड असानी से बनता नहीं, वहीं जो ज़रूरतमंद नहीं हैं, वे भी गलत राशनकार्ड बनवाकर राशन उठा लेते हैं और बाज़ार की दुकानों में ज्यादा मूल्य पर बेच आते हैं। यह बेहद चिंताजनक है पीडीएस के भ्रष्टाचार में गाँव की सामान्य जनता भी शामिल हो गयी है। कई जगह यह भी शिकायत मिलती है कि पीडीएस डीलर खुद ही अनाज को खुले बाज़ार में बेच देता है।

हालाँकि अब सरकार ज़रूरतमंद को सहायता पहुँचाने के बेहतर विकल्प के तौर पर नगद भुगतान करने की योजना बनाने जा रही है। सरकार की नीयत पर फिर भी सवाल उठ जाता है कि सरकारी भोजन कराकर सरकार गरीब आदमी को भुखमरी के दलदल से निकालकर शारीरिक श्रम द्वारा अर्जित स्वाभिमान का भोजन करने का अवसर देना चाहती है या जीवन भर यूँ ही सरकारी भोजन कराकर सिर्फ वोट देने लायक बनाए रखना चाहती है?

सरकार वाहवाही के लिये अनाज बाँटती तो है, मगर इस बात की कभी जाँच नहीं करती कि सरकारी अनाज खाकर कुपोषित सेहतमन्द बने भी या नहीं, और जो सेहतमंद हो गये, देश के लिये वह कौन सा काम कर रहे हैं? सिर्फ वोट के काम आ रहे हैं या देश के विकास में उनका सकारात्मक योगदान भी हो रहा है? या किसी अपराध या अपराधी की भेंट चढ़ गये? क्योंकि हमारे गाँव में यह कहावत बहुत प्रचलित है इंसान जैसा खाता है वैसा ही बनता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ऐसे किसी भी तन्दुरुस्त आदमी को मुफ्त भोजन देने के खिलाफ थे, जिसने ईमानदारी से कुछ न कुछ काम न किया हो। उनका कहना था कि मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन हुआ है। सुस्ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्साहन मिला है। नियम यह होना चाहिए कि मेहनत नहीं तो खाना नहीं। हाँ जो शरीर से लाचार हैं, उनका पोषण राज्य को करना चाहिए।

मगर वास्तविकता यह है कि पीडीएस लाचार, बीमार, वृद्ध और कुपोषितों का पोषण करने के बजाय भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय से लेकर गाँव के पीडीएस डीलर तक को भ्रष्टाचार करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है, और इसका लाभ उठानेवाली प्रजा को पेट भरने के लिये उद्यम करने के बजाय काहिल बने रहने के लिये प्रेरित करता है। नहीं तो, गाँव में गरीबी होने के बावजूद किसी काम के लिये मजदूरों की कमी नहीं होती। सिर्फ खेती के काम के लिये ही नहीं, जिसमें ज्यादा मजदूरी न देना किसानों की मजबूरी है, बल्कि अन्य कामों के लिये भी मजदूर नहीं मिलते।

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धनंजय कुमार, लेखक स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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