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हारने, शहादत के लिए नहीं, मोर्चा फतह करने के लिए एक मुकम्मल लड़ाई लड़ते हैं नवारुणदा के पात्र

हमारे नवारुण दा और उन्हें हम जैसे जानते हैं-2
पलाश विश्वास

 यह आलेख समयांतर के सितंबर अंक में प्रकाशित है। स्थानाभाव के कारण थोड़ा संपादित भी है और दो किस्तों में
वर्चस्ववादी बंगीय समाज में इस रचनादृष्टि के लिए कोई स्पेस अभी तैयार हुआ ही नहीं है। आदिवासी जनविद्रोह को कथावस्तु बतौर पेश करने वाली उनकी मां महाश्वेता दी भी सत्ता हेजेमनी के खिलाफ इतना डट कर युद्धरत नहीं रही हैं और न उनके साहित्य में वह अंत्यज अस्पृश्य जीवन है।
मां बेटे के रचनाकर्म के समांतर पाठ से साफ जाहिर होता है कि नवारुण दा को हम समूचे भारतीय भाषां के लिए मुक्तबाजारी उपनिवेश समय में प्रतिरोध के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रासंगिक क्यों मानते हैं। उनका इतिहास बोध और उनका दृष्टिकोण अनिवार्य तौर पर सांप्रतिक इतिहास और समकालीन समाज वास्तव के साथ-साथ राज्यतंत्र के खिलाफ प्रतिरोध की प्रेरणा और ऊर्जा दोनों हैं,  इसीलिए।
मां बेटे का अलगाव भी निहायत पारिवारिक घटना नहीं है,  वैचारिक द्वंद्व और प्रतिबद्धता के भिन्न-भिन्न आयाम हैं।
जैसे नवारुणदा के पिता नवान्न नाटक और बहुरूपी के शंभु मित्र के प्राण बिजन भट्टाचार्य ने जैसे समझौता न करना अपनी उपलब्धि मानते रहे हैं,  नवारुण दा की कुल उपलब्धि यही है और आप ऐसा महाश्वेता दी के बारे में कह नहीं सकते जो आधिपात्यवादी व्यवस्था और सत्ता से नत्थी होकर भी लगातार क्राति की बातें करती हैं हूबहू बंगीय कामरेडों की तरह। कथनी और करनी का यह विभेद नवारुण दा का जीवनदर्शन नहीं रहा है। ऐसे थे हमारे नवारुण दा।
जाहिर है कि पंचशील अभ्यास के लिए प्रकृति का सान्निध्य अनिवार्य है बौद्धमय होने से हमारा तात्पर्य प्राकृतिक पर्यावरण चेतना है,  जिसके बिना धर्म फिर वही है जो पुरोहित कहें और आचरण में पाखंड का जश्न जो है और जो अनंत फतवा श्रंखला है नागरिक मानवाधिकारों के विरुद्ध दैवी सत्ता के लिए। इस ब्राह्मणी संस्कृति के खिलाफ युद्धघोषणा और भगवाकरण के खिलाफ निरंतर मोर्चा दरअसल नवारुण दा का साहित्य है।
इसे समझने के लिए यह भी समझ लें कि नवारुण दा का यही पंचशील मुझे तसलिमा के साथ भी खड़ा करता है पुरुषवर्चस्व के खिलाफ उनकी गैरसमझौतावादी बगावत के लिए जबकि उनकी देहगाथा में मैं कहीं नहीं हूँ। इससे नवारुण रचनाकर्म के दस दिगंत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
और चितकोबरा सांढ़ संस्कृति का तो हम सत्तर के दशक से लगातार विरोध करते रहे हैं। स्त्री वक्ष,  स्त्री योनि तक सीमाबद्ध सुनामी के बजाय प्रबुद्ध स्त्री के विद्रोह में ही हमारी मुक्ता का मार्ग है और हमें उसकी संधान करनी चाहिए। लेकिन सुनील गंगोपाध्याय संप्रदाय ने बंगीय साहित्य और सस्कृति को चितकोबरा बना छोड़ा है,  उसके खिलाफ भी है नवारुण दा का मुखर समाज वास्तव। देहगाथा से पृथक साहित्य,  नायकरहित नायिका रहित सामाजिक जनजीवन के पात्रों का साहित्य ही नवारुण दा का साहित्य है,  जिनका वर्गीय आधार पर ध्रुवीकरण प्रतिरोध की अनिवार्य शर्त है।
नवारुण दा की तरह हमारे लिए वाम कोई पार्टी नहीं,  न महज कोई विचारधारा है। यह शब्दशः वर्गचेतना को सामाजिक यथार्थ से वर्गहीन जातिविहीन शोषणविहीन समता और सामाजिक न्याय के चरमोत्कर्ष का दर्शन है जैसा कि अंबेडकर का व्यक्तित्व और कृतित्व,  उनकी विचारधारा,  आंदोलन,  प्रतिबद्धता,  उनका जुनून,  उनका अर्थशास्त्र,  धर्म और जातिव्यव्सथा के खिलाफ उनका बदतमीज बगावत और उनके छोड़े अधूरे कार्यभार।
गौरतलब है कि नवारुणदा वाम को वैज्ञानिक दृष्टि मानते रहे हैं और बाहैसियत लेखक मंटो वाम से जुड़े न होकर भी इसी दृष्टिभंगिमा से सबसे ज्यादा समृद्ध हैं जैसे अपने प्रेमचंद,  जिन्हें किसी क्रांतिकारी विश्वविद्यालय या किसी क्रांतिकारी संगठन या किसी लोकप्रिय अखबार के प्रायोजित विमर्श का ठप्पा लगवाने की जरूरत नहीं पड़ी। जैसे जनता के पक्ष में अंधेरे से निकलने की मुक्तबोध का ब्रह्मराक्षस कार्यभार है,  वैसा ही है नवारुण दा का रचनाकर्म।
इलियस,  शहीदुल जहीर से लेकर निराला और मुक्तिबोध का डीएनए भी यही है। शायद वाख,  वैनगाग,  पिकासो,  माइकेल जैक्शन,  गोदार,  ऋत्विक घटक,  मार्टिन लूथर किंग और नेसल्सन मंडेला का डीएनए भी वही। यह डीएनए लेकिन तमाम प्रतिष्ठित कामरेडों की सत्ता और सौदेबाजी से अलहदा है।
इसीलिए हमारे लिए अंबेडकर के डीप्रेस्ड वर्किंग क्लास और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के सर्वहारा में कोई फर्क नहीं है और न जाति उन्मूलन और वर्गहीन समाज के लक्ष्यों में कोई अंतर्विरोध है। नवारुण दा से इस मुद्दे पर संवाद हुआ नहीं,  लेकिन भरोसा है कि वे इससे असहमत होते नहीं क्योंकि उनकी रचनाओं का स्थाई भाव दरअसल यही है।
यही वह प्रस्थानबिंदु है,  जहां महाश्वेता दी से एक किमी की दूरी के हजारों मील के फासले में बदल जाने के बाद भी नवारुण दा उन्हींकी कथा विरासत के सार्थक वारिस हैं तो अपने पिता बिजन भट्टाचार्य और मामा ऋत्विक घटक के लोक विरासत में एकाकार हैं उनके शब्दों और आभिजात्य को तहस-नहस करने वाले तमाम ज्वालामुखी विस्फोट।
भाषाबंधन ही पहला और अंतिम सेतुबंधन है मां और बेटे के बीच। संजोग से इस सेतुबंधन में हम जैसे अंत्यज भी जहां- तहां खड़े हैं बेतरतीब।
महाश्वेता दी ने बेटे से संवादहीनता के लिए उनकी मत्यु के उपरांत दस साल के व्यवधान समय का जिक्र करते हुए क्षमायाचना की है और संजोग यह कि इन दस सालों में मैं दोनों से अलग रहा हूँ। जब दोनों से हमारे अंतरंग पारिवारिक सम्बंध थे,  तब हम सभी भाषा बंधन से जुड़े थे। पंकज बिष्ट,  मंगलेश डबराल से लेकर मैं,  अरविंद चतुर्वेद और कृपाशंकर चौबे तक।
तभी इटली से आया था तथागत,  जो हमें ठीक से जानता भी नहीं है।
अपनी विश्वप्रसिद्ध मां से निरंतर अलगाव के मध्य उनका व्यक्तित्व कृतित्व का विकास हुआ और इसीलिए उनके साहित्य में क्रांति का वह रोमांस भी नहीं।
उनके पात्र हारने के लिए नहीं,  शहादत के लिए भी नहीं,  मोर्चा फतह करने के लिए एक मुकम्मल लड़ाई रणनीतिक लड़ते हैं,  इसलिए उनका कांटेंट भी महज कांटेट नहीं है,  स्ट्रैटेजिक कांटटेंट हैं।
फैताड़ु बोम्बाचाक और कंगाल मलसाट तो क्या कीड़े की तरह खत्म हुए हर्बर्ट में भी मुक्तबाजारी साम्राज्यवाद और सामंतवाद के खिलाफ उनकी खुली युद्धघोषणा है,  जो मृत्यु उपत्यका का मूल स्वर और स्थाई भाव दोनों हैं।
वे रंग कर्मी भी रहे हैं।
बतौर रंगकर्मी वे पिता की विरासत की कमान भी संभालते रहे हैं और इसी रंगकर्म के तहत उनका साहित्य कुल मिलाकर एक मंचीय प्रस्तुति है चाहे आप नाटक कर लो या सिनेमा बना लो।
फालतू एक शब्द भी नवारुणदा ने कभी नहीं लिखा और उनके हर शब्द में युद्ध जारी है और रहेगा।
रंगकर्म के जरिये वे तेभागा से लेकर सिंगुर नंदीग्राम तक तमाम जनांदोलन,  जो उनके जीवन काल में हुए, उनमें उनकी सक्रिय भूमिका रही है और भारतीय जननाट्य आंदोलन के सलिल मित्र,  सोमनाथ होड़, देवव्रत विश्वास और पिता बिजन भट्टाचार्य की सोहबत की ठोस तैयारी है उनकी रनाधर्मिता की देसी पूंजी।
 साहित्य और संस्कृति की हर धारा में सक्रिय परिवार में पृथक धारा का निर्माण सबसे बड़ी चुनौती होती है। उनके नाना मनीश घटक बंगाल के सबसे अच्छे गद्यकार हैं तो उनके मामा ऋत्विक घटक इस उपमहाद्वीप के मूर्धन्य फिल्मकार। मां इतनी बड़ी साहित्यकार। लेकिन प्रखर जनप्रतिबद्धता के अलावा पारिवारिक कोई छाप उनके रचनाकर्म में नहीं है। न भाषा के स्तर पर और न शैली या सौंदर्यशास्त्र के पैमाने पर।
अपने अति घनिष्ठ मित्र बांग्लादेशी ख्वाबनामा के उपन्यासकार और छोटी कहानियों में उससे भी बड़े कथाकार अख्तराज्जुमान इलियस से बल्कि उनकी रचनात्मक निकटता रही है, जिनकी असमय मौत हो गयी।
अख्तर और नवारुण दा का समाज वास्तव जीवन के सबसे निचले स्तर से शुरु होता है, जहा भद्रजनों का प्रवेश नहीं है।
अख्तर की तरह नागरिक और ग्रामीण दोनों स्तर पर रचनाकर्म करने वाले रचनाकार भी नहीं है। वे बेसिकैली अरबन संस्कृतिकर्मी हैं और भाषा को उन्होंने हर स्तर पर अंत्यज व्रात्य जीवन से उठाकर नागरिक और सामाजिक यथार्थ को एकाकार करके एक विलक्षण संयुक्त मोर्चा का निर्माण करते रहे हैं।
कविता में नवारुणदा की प्रासंगिकता के संदर्भ में निवेदन है कि हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं,  जो कयामती हालात हैं, जो देश बेचो निरंकुश अश्वमेध है, उसके प्रतिरोध की प्रेरणा समसामयिक उत्तर आधुनिक किस कविता में है,  जरा उसे पेश कीजिये। जो समय को दिशा बदलने को मजबूर कर दें, पत्थर के सीने से झरना निकाल दें और सत्ता चालाकियों का रेशां रेशां बेनकाब कर दें,  जो मुकम्मल एक युद्ध हो जनता के हक हकूक के लिए, ऐसी कोई कविता लिखी जा रही हो तो बताइये।
उस कवि का पता भी दीजिये जो मुक्तबाजारी कार्निवाल से अलग थलग है किंतु और जनता की हर तकलीफ, हर मुश्किल में उसके साथ खड़ा है। जिसका हर शब्द बदलाव के लिए गुरिल्ला युद्ध है।
अस्थिकेशवसाकीर्णं शोणितौघपरिप्लुतं।
शरीरैर्वहुसाहस्रैविनिकीर्णं समंततः।।
महाभारत का सीरियल जोधा अकबर है इन दिनों लाइव, जो मुक्तबाजारी महापर्व से पहले तकनीकी क्रांति के सूचनाकाल से लेकर अब कयामत समय तक निरंतर जारी है।
उसी महाभारत के धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे युद्धोपरांत यह दृश्यबंध है।
उस धर्मक्षत्रे अस्थि, केश, चर्बी से लाबालब खून का सागर यह।एक अर्यूद सेना,  अठारह अक्षौहिणी मनुष्यों का कर्मफल सिद्धांते नियतिबद्ध मृत्युउत्सव का यह शास्त्रीय,  महाकाव्यिक विवरणश्लोक।
गजारोही, अश्वारोही, रथारूढ़, राजा महाराजा,  सामंत,  सेनापति,  राजपरिजन, श्रेष्ठी अभिजन और सामान्य युद्धक पैदल सेनाओं के सामूहिक महाविनाश का यह प्रेक्षापट है। जो सुदूर अतीत भी नहीं है, समाज वास्तव का सांप्रतिक इतिहास है और डालर येन भवितव्य भी।
मालिकों को खोने वाले पालतू जीव जंतुओं और युद्ध में मारे गये पिता, पुत्र, भ्राता, पति के शोक में विलाप में स्त्रियां का प्रलयंकारी शोक का यह स्थाईभाव है। नरभक्षियों के महाभोज का चरमोत्कर्ष है यह।
यह है वह शास्त्रीय उन्मुक्त मुक्तबाजार का धर्मक्षेत्र जिसे कुरुवंश के उत्तराधिकारी भरतवंशी देख तो रहे हैं रात दिन चौबीसो घंटे लाइव लेकिन सत्ताविमर्श में निष्णात इतने कि महसूस नहीं रहे हैं क्योंकि धर्मोन्मादी दिलदिमाग कोमा में है। आईसीयू में लाइव सेविंग वेंटीलेशन में है। कृत्रिम जीवन में है, जीवन में नहीं हैं।
अब उत्तरआधुनिक राजसूय अश्वमेध धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे तेलयुद्ध विकास कामसूत्र मध्ये अखंड भारतखंडे की पृष्ठभूमि भी वही महाकाव्यिक। नियति भी वही। मृत्यु उपत्यका शाश्वत वही।
यही कविता में नवारुणदा की याद की वजह भी है।
कविता अगर जीवित होती और किसी अंधेरे कोने में भी बचा होता कोई कवि तो इस मृत्युउपत्यका की सो रही पीढ़ियों को डंडा करके उठा देता और आग लगा देता इस जनविरोधी तिलस्म के हर ईंट में, सत्ता स्थापत्य के इस पिंजर को तोड़ कर किरचों में बिखेर देता।
दरअसल उभयलिंगियों का पांख नहीं होते और वे सदैव विमानयात्री होते हैं। पांख के पाखंड में लेकिन आग कोई होती नहीं है। विचारधारा और प्रतिबद्धताओं की अस्मितामध्ये किसी अग्निपाखी का जन्म भी असंभव है। कविता अंतत- वह अग्निपाखी है और कुछ भी नहीं और बिना आग कविता या तो निखालिस रंडी,  स्त्रियों के लिए अक्सर दी जाने वाली यह गाली किसी स्त्री का चरित्र है नहीं और दरअसल यह उपमा उभयलिंगी है जो सत्ता के लिए किराये की कोख भी है।
जो कविता परोसी जा रही है कविता के नाम पर वे मरी हुई सड़ी मछलियों की तरह मुक्तबाजारी धारीदार सुगंधित कंडोम की तरह मह मह महक रही हैं अवश्य, लेकिन कविता कंडोम से हालात बदलने वाले नहीं है।
यह काउच पर, सोफे पर, किचन में, बाथरूम में,  बिच पर, राजमार्गे, कर्मक्षेत्रे मस्ती का पारपत्र जरूर है, कविता हरगिज नहीं।
सच तो यह भी है कि इस धर्मक्षेत्रे महाभारते कविता के बिना कोई लड़ाई भी होनी नही है क्योंकि कविता के बिना सत्ता दीवारों की किलेबंदी को ध्वस्त करने की बारुदी सुरंगें या मिसाइली परमाणु प्रक्षेपास्त्र भी कुरुक्षेत्र की दिलोदमाग से अलहदा लाशें हैं।
लोक की नस नस में बसी होती है कविता।
हवाओं की सुगंध में रची होती है कविता।
बिन बंधी नदियां होती हैं कविता। उत्तुंग हिमाद्रिशिखरों की कोख में जनमी ग्लेशियरों के उल्लास में होती है कविता।
निर्दोष प्रकृति और पर्यावरण की गोद में होती है कविता।
कविता महारण्य के हर वनस्पति में होती है और समुंदर की हर लहर में होती है कविता।
मेहनतकशों के हर पसीना बूंद में होती है कविता।
खेतों और खलिहानों की पकी फसल में होती है कविता।
वह कविता अब सिरे से अनुपस्थित है क्योंकि लोक परलोक में है अब और प्रकृति और पर्यावरण को बाट लग गयी है।
पसीना अब खून में तब्दील है।
हवाएं अब बिकाऊ है।
कोई नदी बची नहीं अनबंधी।
सारे के सारे ग्लेशियर पिघलने लगे हैं और उत्तुंग हिमाद्रिशिखरों का अस्तित्व ही खतरें में है। हिमालय अब आफसा है। आपदा है।
खामोश हो गयी हैं समुंदर की मौजें और महाअरण्य अब बेदखल बहुराष्ट्रीय रिसार्ट, माइंनिंग है, परियोजना हैं या विकास सूत्र का निरंकुश महोत्सव है या सलवा जुड़ुम या सैन्य अभियान है।
वातानुकूलित सत्ता दलदल में धंसी जो कविता है कुलीन, उसमें शबाब भी है, शराब भी है, देह भी है कामाग्नि की तरह, लेकिन न उस कविता की कोई दृष्टि है और न उस निष्प्राण जिंगल सर्वस्व स्पांसर में संवेदना का कोई रेशां है।
अलख बिना, जीवनदीप बिना, वह कविता यौन कारोबार का रैंप शो के अलावा कुछ नहीं है और महाकवि जो सिद्धहस्त हैं भाषिक कौशल में दक्ष, शब्द संयोजन बिंब व्याकरण में पारंगत वे दरअसल मुक्तबाजार के दल्ला हैं या फिर सुपरमाडल।
हमने नवारुण दा की कविता में वह अलख जगते देखा है और उनके गद्य में भी फैताड़ुओं की कविता में ज्वालामुखी की वह धारा बहते हुई देखी है।
(समाप्त)

कथनी और करनी का विभेद नवारुण दा का जीवन दर्शन नहीं रहा

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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