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हाशिमपुरा जनसंहार से भी खौफनाक है मलियाना की हकीकत

हाशिमपुरा जनसंहार से भी खौफनाक है मलियाना की हकीकत
हाशिमपुरा गोलीकाण्ड में कोर्ट ने फैसले के बाद कहा गया कि ऐसे दर्दनाक हादसे का ऐसा फैसला नहीं होना था, 42 लोगों को पीएससी की गोलियों से मार देना एक सामूहिक कत्ल है, लेकिन मेरठ के मलियाना की हकीकत हाशिमपुरा गोलीकाण्ड से भी खौफनाक है। हाशिमपुरा गोलीकाण्ड पर आए फैसले के बाद मलियाना के लोगों में एक डर है कि कहीं इसका भी अंजाम हाशिमपुरा जैसा ना हो। आरोपी बरी हो जाय और कत्ल किए गए लोगों की चीख इन मोहल्लों में गूंजती रहे। मुमकिन है कि कोर्ट में चल रहे मामले पर देर-सबेर फैसला आए, लेकिन इतना जरूर है कि फैसला आने के बाद भी मलियाना के लोगों को इंसाफ नहीं मिलेगा, इनकी इंसाफ की आस अधूरी ही रह जाएगी, क्योंकि मलियाना में 23 मई 1987 के दिन जो कुछ भी हुआ उसका पूरा सच आज तक कहीं दर्ज ही नहीं हुआ है, शायद दर्ज भी हुआ हो उन जांच कमीशन की रिपोर्ट में जिन्हें आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। ये सच ऐसा है जो अभी कहा जाना बाकी है, ऐसा सच जिसमें मलियाना के लोग पीएसी के जवानों को आरोपी मानते हैं, लेकिन एफआईआर में कहीं भी इनके नामों का जिक्र ही नहीं है। ऐसा सच जो सवाल करता है किमलियाना के मुस्लिमों के गर्दन और सर पर सटीक गोलियां मारने वाले कौन थे, ऐसा सच जिसमें वादी को ही नहीं पता कि उसके अंगूंठे के निशान और हस्ताक्षर लेकर किनको आरोपी बनाया गया, ये सारे सच और इनसे निकलने वाले सवाल आज मलियाना दंगे में गवाह बने लोगों के जहन में जिंदा हैं लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं।

 हाशिमपुरा जैसे मलियाना में भी मारी गईं गोलियां –
सन 1987 के मई महीने में मेरठ के कई हिस्सों में आगजनी, लूटपाट और हत्याओं के चलते 19 मई को शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। उस समय मेरठ के डीएम थे आरएस कौशिक। यहां के हाशिमपुरा में 22 मई को 42 लोगों का कत्ल किया गया, आरोप उन्ही पर लगे, जिन्हें दंगे को रोकने के लिए लगाया गया था। हाशिमपुरा से कुछ दूरी पर बसे मलियाना में भी पीएसी के जवानों द्वारा कुछ ऐसा ही कत्लेआम करने का आरोप है बस फर्क इतना है कि यहां पर पीएसी के जवान आरोपी नहीं बनाए गए हैं। हाशिमपुरा में 42 लोगों के मारे जाने की खबर पूरी तरह से फैली भी नहीं थी कि अगले ही दिन यानी 23 मई को मलियाना में कई लोग मारे गए। सरकारी आकड़ों में दर्ज नामों के आधार पर 73 लोगों को इस शर्त पर मुआवजा दिया गया, कि अगर लापता लोग घर वापस आ गए तो मुआवजे का पैसा सरकार को वापस करना होगा। फिलहाल लापता लोगों में अभी तक कोई घर वापस नहीं आया। मारे गए लोगों में से 21 लोगों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मौजूद है बाकियों का कुछ भी पता नहीं। मामला कोर्ट में है, 61 लोग गवाह बनाए गए हैं, और 93 आरोपी, जो कि आम लोग हैं। आरोपियों में पीएसी का कोई भी जवान शामिल नहीं है, जबकि गोली लगने से घायल वकील अहमद और रईस अहमद कहते हैं कि पीएसी के जवानों ने ही लोगों पर गोलियां बरसाना शुरू किया था। इन गवाहों के शरीर पर आज भी गोली लगने के निशान हैं।

‘पीएसी ने लुटवाई शराब की दुकान’ –   
मलियाना में इस्लाम नगर, संजय कॉलोनी और शेरखान नाम के तीन मोहल्ले शामिल हैं। इस्लाम नगर के रहने वाले वकील अहमद के हाथ और कमर में दो गोलियां लगने के निशान हैं। दंगे में गोली लगने की वजह से इनकी एक किडनी भी खराब हो गई। वकील अहमद की माने तो ये दोनों गोलियां पीएसी के जवानों ने ही इन्हें मारी। दंगे के दिन को याद करते हुए वकील अहमद कहते हैं कि सुबह करीब दस बजे होंगे, पीएसी के जवानों ने शराब की दुकान के ताले को बट से मारकर तोड़ दिया। फिर शराब बटवाई। दोपहर करीब दो बजते-बजते पीएसी के जवानों ने मलियाना को दो तरफ से घेर कर गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। दो से ढाई घंटे तक गोलियां बरसाईं होंगी, जब मुझे गोली लगी उस समय चार बजे होंगे। वकील अहमदमलियाना दंगे के चश्मदीद हैं, जिसकी गवाही कोर्ट में हो चुकी है। ये पूछने पर की आपने कोर्ट में ये बाते बताई, तो इन्होंने कहा कि हां मैंने कोर्ट में ये बात बताई, लेकिन मुझे नहीं लगता की पीएसी के जवानों को सजा मिलेगी। हाशिमपुरा में तो पीएसी के जवान आरोपी होने पर कोर्ट से बरी हो गए, यहां पर तो ये आरोपी ही नहीं हैं।
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‘हम बचाने नहीं मारने आए हैं’-
मलियाना दंगे में पीएससी के जवानों की भूमिका बचाने की नहीं बल्कि मारने की थी। कोर्ट में बयान दे चुके वकील अहमद इस बात की तस्दीक करते हैं कि पीएसी के संरक्षण में ही आगजनी और मारकाट की जा रही थी। शुरूआत पीएसी के जवानों ने ही की। दंगे में एक भी हिंदू को खरोंच तक नहीं आई। जब घरों को जलाया जा रहा था तो वहीं मौजूद पीएसी के कमांडर आर.पी. त्रिपाठी से बचाने की गुहार लगाई गई तो उनका साफ कहना था कि हम बचाने नहीं मारने आए हैं। इनके साथ तत्कालिक टीपी नगर एसएचओ वी. के सिंह भी थे। ये लोग डेढ़ सौ के करीब रहे होंगे। मेरे सामने ही पीएसी की एक गोली से दो लोग मरे। जिसमें एक का नाम नसीर अहमद उर्फ मुन्ना था। मुद्सिर और तसलीम भी पीएसी की गोली से मरे।

 ‘सर और गर्दन में मार रहे थे गोलियां’-
मलियाना दंगे में चल रही सुनवाई में इस्लाम नगर के रहने वाले याकुब को वादी बनाया गया है। याकुब बताते हैं कि 23 मई के दिन हम सभी अनजान थे कि हाशिमपुरा में क्या हुआ है। छिटपुट घटनाओं की खबर आने से हम जरूर दहशत में थे। मोहल्ले में सुबह से ही पीएसी के जवान आने शुरू हो गए। मोहल्ले के बाहर पीएसी ने दो प्वाइंट बनाए। उन्होंने छत पर खड़े या फिर रेंज में आ रहे लोगों को निशाना बनाया और गोलियां चलाना शुरू कर दिया। गोली गर्दन या फिर सर पर मार रहे थे जिससे की बचने की कोई उम्मीद ही ना हो।
 ‘पता ही नहीं चला कब दर्ज हुई एफआईआर’-
मलियाना दंगे में जिस मुख्य एफआईआर के आधार पर कोर्ट में मामला चल रहा है उसे तथाकथित इस्लाम नगर के रहने वाले याकूब ने लिखवाई है। कागज पर याकूब का नाम भी दर्ज है। लेकिन याकुब का कहना है कि उसे पता ही नहीं चला कि आखिर ये एफआईआर कब लिखी गई। याकूब बताता है कि उस दिन पीएसी के जवान गोलियां चला रहे थे जिससे पेड़ों की टहनियां तक टूट कर गिरने लगी। ये देख मोहल्ले के लोग घरों में छिपना शुरू हो गए। कुछ देर बाद ये मोहल्ले के अन्दर घुस आएं, और जवान लड़कों को पकड़ने लगे। पुलिस और पीएसी के जवानों ने छह लड़को को पकड़ कर एक साथ खड़ा कर दिया। इनमें मैं भी शामिल था, फिर बुरी तरह से मारने लगे, हाथ और पैर बुरी तरह से जख्मी कर दिया। उस समय एक सरदार था जो टीटी नगर में सब इंस्पेक्टर था, गुरुजीत सिंह गिरेवाल नाम का। वो अपनी जीप लेकर आया और हमें अपने साथ थाने ले गया और वहां बंद कर दिया, उसने कहा कि यहां पर तुम्हारी जान बच जाएगी। कुछ देर बाद मुझे खोजते हुए मेरे घर वाले आएं और मुझे वहां से ले गए। अगले दिन सादी वर्दी में कुछ अफसर आएं और उन्होंने कुछ कागज पर मेरे अगूठे का निशान और साइन लिया। मैं भी दहशत में कुछ पूछ ना सका और चुपचाप साईन कर दिया। बाद में पता चला कि ये एफआईआर थी।
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 ‘इतना सटीक निशाना लगाने वाले कौन थे’ –
एक और चश्मदीद रईस अहमद के मुंह पर गोली लगने का निशान आज भी है। ये बताते हैं कि उस दिन हंगामा होने पर मैं घर के अन्दर ही था, लेकिन घर में जालियां लगी होने की वजह से मुझे बाहर से कोई भी देख सकता था। तभी छत पर निशाना साधे पीएसी के जवान ने गोली मारी जो मेरे मुंह को छूते हुए निकल गई। लेकिन गोली का घाव भी साफ-साफ दिख रहा है। गोली ने मेरे चेहरे का हुलिया ही बिगाड़ दिया। मलियाना में जितनी भी गोलियां मारी गईं वो सर पर या गर्दन में लगी। तो फिर मैं पूछता हूं कि आखिर इतना सटीक निशाना लगाने वाले कौन थे। ये कोई सिविलयन तो नहीं कर सकता है।
 ‘मैं तो मेरठ में ही नहीं था’-
मलियाना काण्ड के आरोपी बनाए गए रूपचंद शर्मा और गवाह याकुब अच्छे दोस्त हैं। दोनों मलयाना में रहते हैं और एक दूसरे के शादी समारोह में शरीक होते हैं। याकूब भी आश्चर्य में है कि आखिर रूपचंद का नाम एफआईआर में कैसे दर्ज हुआ। रूपचंद बताते हैं कि मैं 23 मई के दिन मेरठ में नहीं था। मेरा ट्रांसपोर्ट का धंधा है। मैं उस दिन ब्यावर में था। दो महीने बाद मेरे पास कागज आया तो पता चला कि मैं आरोपी हूं। पीएसी ने अपनी जान बचाने के लिए दूसरे लोगों को फंसा दिया। ये काण्ड पीएसी ने किया।
 ‘वोटर लिस्ट से दर्ज हुए आरोपियों के नाम’-
मलियाना के रहने वाले गरीबदास गाड़ियों के कलपुर्जे सही करते हैं। इनकी भी याकूब से अच्छी दोस्ती है। लेकिन जब याकूब को पता चला कि दंगे में गरीब दास का भी नाम है तो इनको बड़ा ही आश्चर्य हुआ। याकूब का कहना है कि दर्ज 93 नामों में कुछ आरोपी तो हैं लेकिन अधिकतर बेगुनाह हैं। जिनका नाम वोटर लिस्ट से देखकर दर्ज किया गया है। आरोपी गरीब दास का भी यहीं कहना है कि हमारा नाम वोटर लिस्ट से देखकर लिखा गया है। अगर हम दंगे में शामिल होते तो हमें भी कहीं तो खरोंच तक आती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमें कहीं पर खरोंच नहीं आई। पीएसी ने अपने आप को बचाने के लिए हमें फंसाया है।
 पीएम रिपोर्ट में भी गोली मारने का जिक्र-
इस्लाम नगर का आखिरी मुस्लिम घर –
आज कोई भी मलियाना दंगे के बारे में यहां के लोगों से पूछता है तो लोग ये घर जरूर दिखाते हैं। ये इस्लाम नगर का आखिरी मुस्लिम घर था, इसके बाद से हिन्दू आबादी शुरू हो जाती है। इस घर में दंगे के दौरान आग लगा दी गई, जिसमें एक ही परिवार के छह लोग जिंदा जला दिए गए। सुबह बच्चों की लाश एक दूसरे से चिपकी हुई मिली। आज भी मकान की वो जमीन ऐसे ही खाली पड़ी है लेकिन परिवार की बची इकलौती लड़की की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो यहां पर घर बना सके। यहां के लोगों का कहना है कि जब हाशिमपुरा में पीएसी के जवानों के खिलाफ केस दर्ज था तब तो वो छूट गए, यहां तो स्थिति उससे भी खराब है। यहां पर पीएससी के जवान आरोपी है नहीं हैं, जिन्होंने गोलियां चलाई, लाशों के ढेर लगा दिए, वो आज खुलेआम घूम रहे हैं। ऐसे में अगर मलयाना दंगे पर फैसला आयेगा भी तो वो अधूरा ही होगा।
 28 सालों में हुई सिर्फ एक गवाही-
मलियाना काण्ड को हुए 27 सालों से ज्यादा का समय बीत चुका है। 850 तारीख दी जा चुकी है। लेकिन जिस गति से सुनवाई चल रही है उससे यहां के लोगों के इंसाफ की उम्मीद भी टूट सी गई है। मलियाना मामले में 28 सालों में सिर्फ वकील अहमद नाम के एक व्यक्ति की गवाही हुई है, ये गवाही साल 2008 में हुई, जबकि गवाहों की संख्या 61 है। इस केस के वादी बनाए गए याकूब का कहना है कि इन गवाहों की संख्या तो अब और भी कम हो गई है क्योंकि इससे से करीब दस से पन्द्रह लोग मर चुके हैं, गवाहों के मरने की संख्या पुख्ता इसलिए नहीं बताई जा सकती है क्योंकि इसमें से अधिकतर मलियाना से बाहर रहने लगे हैं। यानी कोई दिल्ली में रहता है तो कोई गाजियाबाद में। अब तो कई लोग गवाही के लिए भी नहीं आते हैं।
 एफआईआर कॉपी गायब-
मलियाना केस की सुनवाई का सबसे हास्यापद पक्ष तो ये है जिस याकूब अहमद की मुख्य एफआईआर पर ये सुनवाई हो रही थी वो एफआईआर कॉपी ही गायब हो गई है। कोर्ट ने ये कहते हुए सुनवाई टाल दी की पहले एफआईआर कॉपी लाओं, फिर सुनवाई करेंगे।
 मर गए कई गवाह और आरोपी-
मलियाना केस में चल रही सुनवाई को 27 सालों से ज्यादा का समय बीत चुका है। इतने सालों में इस मामले के करीब 10 आरोपियों की मौत हो चुकी है। याकूब बताते हैं कि कई गवाह तो मेरठ से बाहर रहते हैं और पैसे की कमी के चलते सुनवाई के लिए कोर्ट भी नहीं आ पाते हैं। सबकों बस यहीं लगता है कि अब इस केस का कुछ नहीं होना है। हाशिमपुरा गोलीकाण्ड में कम से कम फैसला तो आया, यहां पर तो उसकी भी उम्मीद कम ही दिख रही है। इस मामले में वकील नईम अख्तर सिद्दीकी कहते हैं कि अब हाईकोर्ट में एक रिट दायर करके ही इस मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि मलियाना के लोगों को जल्दी न्याय मिल सकेगा।
प्रियम वर्मा

About the author

प्रियम वर्मा हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड में वरिष्ठ संवाददाता हैं। जी मीडिया, इंडिया न्यूज में भी कार्य कर चुकी हैं।

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