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हाशिमपुरा- बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा

हाशिमपुरा- बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा

निकल गली से तब हत्यारा 
आया उसने नाम पुकारा 
हाथ तौल कर चाकू मारा 
छूटा लोहू का फव्वारा 
कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी? 
( रघुवीर सहाय)

क्या दिव्य संयोग है कि जब कई हाई प्रोफाइल केसों में सरकार की पैरवी कर चुके वकील उज्ज्वल निकम खुलासा कर रहे थे कि सरकार ने अजमल आमिर कस्साब को कभी बिरयानी नहीं खिलाई, बल्कि उसके पक्ष में बन रहे माहौल को रोकने के लिए उन्होंने (निकम) ने यह कहानी फैलाई थी, ठीक उसके बाद मेरठ के हाशिमपुरा जनसंहार के 16 आरोपियों को दिल्‍ली की तीस हजारी कोर्ट ने बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपियों के खिलाफ कोई भी सबूत पेश नहीं किए जा सके।
यह फैसला हमारी न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के मुँह पर करारा तमाचा है। 27 चले मुकदमे के बाद सारे आरोपी बरी हो जाते हैं और अदालत कह देती है आरोपियों के विरुद्ध कोई सबूत पेश नहीं किए जा सके। तो आखिर सबूत पेश करने की जिम्मेदारी किसकी थी ? क्या अदालत ने सबूत पेश न कर पाने वाली एजेंसी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई की ? 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा में हुए नरसंहार में 42 निर्दोष लोगों को मार दिया गया था और उन्हें गाजियाबाद में फेंक दिया गया था, उस समय गाजियाबाद के पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय थे, जिन्होंने इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया था। राय का बयान आया है कि सीआईडी ने जिस तरह इस मामले में लचर ढंग से तफ्तीश की थी, उससे यही होना था। यह फैसला एक बार फिर सत्ता के निरंकुश चरित्र को बेनकाब करने वाला है। किसी भी ऐसे बड़े मामले में अभियुक्तों के खिलाफ न ढंग से पैरवी होती है और न ही तफ्तीश। जिसकी वजह से अदालत साक्ष्य के अभाव में अभियुक्तों को बरी कर देती है।
यहां यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिस समय ये हत्याकांड हुआ उस समय केंद्र व राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। उसके बाद राज्य में 4 बार सपा और 4 बार बसपा सत्ता में रह चुके हैं और आज जब यह फैसला आया है उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार है। जाहिर है कांग्रेस, सपा और बसपा भी इस कत्ल में अपने अपराध से बच नहीं सकते हैं।
यह फैसला निश्चित रूप से न्यायपालिका और लोकतंत्र में विश्वास पर कुठाराघात करने वाला है। ठीक ऐसा ही लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार के फैसले में हुआ था। बरसों चले मुकदमे के बाद 58 हत्यारोपी बरी कर दिए गए थे। बथानी टोला जनसंहार के गवाह की गवाही को अदालत ने यह कहकर खारिज कर दिया था कि इतने रक्तपात के बीच तुम कैसे मौजूद रहे। जाहिर है कि अदालत के इस सवाल में उत्तर भी छिपा है कि ऐसे जनसंहारों में गवाहियां नहीं मिल सकतीं और हत्यारे हमारी न्याय व्यवस्था का मखौल उड़ाते हुए खुलेआम घूम सकते हैं। जब अदालत ने अभियुक्तों को रिहा कर दिया गया है तब यह सवाल तो पैदा होता ही है कि आखिर उन 42 लोगों की हत्या किसने की थी? हत्याएं तो हुई ही थीं, फिर इन हत्यारों तक न पहुंच पाने का दोषी कौन है ?
लेकिन हाशिमपुरा जनसंहार बाकी जनसंहारों से इस तरह भिन्न है कि यह राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और जनसंहार था। जाहिर है कि इसमें उत्तर प्रदेश की सरकारों को मुस्तैदी से काम करना चाहिए था, खासतौर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों को। हाशिमपुरा जनसंहार को साधारण दंगों की तरह देखने की जरूरत नहीं है। हाशिमपुरा जनसंहार राज्य मशीनरी के सांप्रदायिक और हत्यारी हो जाने का सुबूत है, इसलिए जब यह फैसला आया है तो हमारे लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार सलीम अख्तर सिद्दीकी ने फेसबुक पर लिखा है -“हाशिमपुरा कांड के आरोपियो में ज़्यादातर यादव थे, उनमें भी ज़्यादा इटावा के थे। अब?” ये सवाल अभियोजन पक्ष की लचर पैरवी के विषय में काफी कुछ कह देता है। और सलीम अख्तर सिद्दीकी के फेसबुकिया स्टेटस की पीछे छिपी भावना को रिहाई मंच का वक्तव्य खुले तौर पर अभिव्यक्त कर देता है। मंच ने आरोप लगाया है कि समाजवादी पार्टी सरकार ने अपने राजनैतिक फायदे के लिए आरोपियों के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने में कोताही बरतते हुए अदालत में लचर पैरवी की, ताकि उस पर हिन्दुत्व के विरोधी होने का आरोप न लगे सके और उसका गैर मुस्लिम वोट बैंक सुरक्षित रहे। रिहाई मंच के नेता राजीव यादव ने कहा है कि हाशिमपुरा के आरोपियों के बरी हो जाने के बाद यह साफ हो गया है कि इस मुल्क की पुलिस मशीनरी तथा न्यायिक तंत्र दलितों-आदिवासियों तथा मुसलमानों के खिलाफ खड़ा है, चाहे वह बथानीटोला का जनसंहार हो या फिर बिहार के शंकरबिगहा में दलितों की सामूहिक हत्या, इस मुल्क के लोकतंत्र में अब दलितों-आदिवासियों और मुसलमानों के लिए अदालत से इंसाफ पाने की आशा करना ही बेमानी है।
मुंबई के सरकारी वकील उज्ज्वल निकम के कसाब के संबंध में दिए गए बयान को हल्के में लेने की आवश्यकता नहीं है। अगर निकम के बयान की गहराई से पड़ताल करें और रिहाई मंच के वक्तव्य को उस बयान की रोशनी में देखने की कोशिश करें तो मालूम पड़ जाएगा कि हाशिमपुरा के कातिल कैसे बरी हो गए।  निकम का बयान अभियोजन पक्ष की मानसिकता को बयां कर देता है। स्वयं गाजियाबाद के तत्कालीन एसपी और बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक विभूति नारायण राय, जिन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई थी, का बयान भी हत्यारों को सत्ता के संरक्षण की दासतां बयान कर रहा है।
इसीलिए एक के बाद एक ऐसी खबरें आ रही हैं जिसमें हत्यारोपी आराम से बाहर आ रहे हैं। अमित शाह बरी हो रहे हैं, डीडी वंजारा बाहर आ रहे हैं, माया कोडनानी बाहर आ रही हैं, शंकरबिगहा, लक्ष्मणपुर बाथे और हाशिमपुरा के हत्यारे बरी हो रहे हैं और हम “मेक इन इंडिया” का नारा देकर “मन की बात” कर रहे हैं।
हाशिमपुरा जनसंहार के फैसले पर कवि जसबीर चावला की प्रतिक्रिया काबिले गौर है-

“ न्याय अंधा होता है/ कुछ नहीं देखता / कानून के लंबे हाथ / अपराधी थाने के पास /  पकड़ नहीं पाते / चुप रहैं / ‘गुजरात माडल’ / लागू है “

मेरठ दंगों के बाद बशीर अहमद बद्र ने एक शेर लिखा था- “तेग़ मुंसिफ़ हो जहां, दारो रसन हो शाहिद/ बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा” यानी जहां तलवार जज हो और फांसी का फंदा गवाह हो, उस शहर में कातिल के सिवाय बेगुनाह कौन हो सकता है ? हाशिमपुरा जनसंहार पर अदालत का फैसला आने के बाद बशीर बद्र का शेर फिर प्रासंगिक हो गया है।
अमलेन्दु उपाध्याय
 

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अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं। हस्तक्षेप.कॉम के संपादक हैं।

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