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हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएं का लोकार्पण

डॉ. प्रकाश मनु की पुस्तक : हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएं का लोकार्पण

नई दिल्ली। सोमवार को हिंदी बाल साहित्य के जाने-माने प्रमुख हस्ताक्षर डॉ. प्रकाश मनु की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आलोचना-पुस्तक “हिन्दी बाल साहित्य : नई चुनौतियां और संभावनाएं” का नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पण किया गया। लोकार्पण शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, दिविक रमेश, ओम निश्छल, रमेश तैलंग ने मिलकर किया।

डॉ. प्रकाश मनु  का बाल साहित्य रचना एवं आलोचना में महत्वपूर्ण अवदान है।

पिछले दो-तीन दशकों से वे हिंदी बाल साहित्य की एक शती से ज्यादा लम्बी परंपरा और उसके बदलते परिदृश्य पर सतत रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। हिंदी बाल कविता का इतिहास जैसी चर्चित पुस्तक के बाद अब उनके यत्र-तत्र प्रकाशित विविध लेखों को समेटती दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक –हिंदी बाल साहित्य-नई चुनौतियाँ और संभावनाएं (कृतिका बुक्स, 19 रामनगर एक्सटेंशन -2, निकट पुरानी अनारकली का गुरुद्वारा, दिल्ली-110051, मूल्य -495/-) प्रकाशित हो कर सामने है।

हिंदी बाल साहित्य-नई चुनौतियाँ और संभावनाएं 11 अध्यायों में विभाजित है। जिसमें पहला अध्याय एक तरह से पूरी पुस्तक का पूर्वावलोकन है और अंतिम अध्याय हिंदी के युवा लेखक श्याम सुशील द्वारा लिया डॉ. प्रकाश मनु का साक्षात्कार है।

ये अध्याय क्रमशः इस प्रकार हैं :

1- हिंदी बाल साहित्य: मेरे कुछ नोट्स

2- बाल कविता : अभिव्यक्ति के नए रंग और छवियाँ

3- रंग-बिरंगे खिलौनों की तरह हैं नटखट शिशुगीत

4- आज की बाल कहानी : नए प्रयोग, नया अंदाज

5- बाल उपन्यास : संभावनाएं अभी भी

6- बच्चों के जासूसी उपन्यासों का रहस्य भरा संसार

7- बाल नाटक : सौ वर्षों का सफ़र

8- बच्चों के लिए विज्ञानं-लेखन की शताब्दी-यात्रा

9- जीवन में नई उम्मीदों के रंग भरती बाल जीवनियाँ

10- बाल साहित्य की उपेक्षित विधाएं

11- बच्चों की दुनिया एक तरह की जादुई दुनिया है –श्याम सुशील के सवालों के जवाब

डॉ. प्रकाश मनु ने इस पुस्तक में हिंदी बाल साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर अपने आलोचनात्मक दृष्टि डाली है और उन विधाओं की वर्तमान शक्तियों एवं कमजोरियों को भी रेखांकित किया है।

डॉ. मनु की नज़र, पहले के बच्चे और आज के बच्चे के बीच सामाजिक, मनोवैज्ञानिक स्तर पर मूलभूत रूप से क्या अंतर आया है, या नहीं आया है, इस प्रश्न पर भी रही है। यही नहीं, हिंदी के बाल साहित्यकारों ने बच्चे के काल्पनिक तथा मनोवैज्ञानिक संसार को किस तरह आत्मसात और अभिव्यक्त किया है, इस बात का भी सम्यक विवेचन आपको इस पुस्तक में मिल सकेगा। ध्यान रहे, यह पुस्तक उन पुस्तकों से सर्वथा अलग है जो बेहद शुष्क ढंग से शैक्षिक प्रबंधों के रूप में लिखी जाती हैं।

यह पुस्तक हिंदी बाल साहित्य के आलोचना जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाएगी और सभी बाल साहित्य प्रेमी इसका भरपूर स्वागत करेंगे, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

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