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हिंदू राष्ट्र या इस्लामी राष्ट्र भारत कभी नहीं बन सकता पर अमेरिका का हिंदू राष्ट्र बनना तय

हिंदू राष्ट्र या इस्लामी राष्ट्र भारत कभी नहीं बन सकता पर अमेरिका का हिंदू राष्ट्र बनना तय
कभी ना कहना फासीवाद!
पलाश विश्वास
भक्तजनों के लिए खुशखबरी है कि भारत अमेरिकी उपनिवेश के मुक्तबाजार में तब्दील होने के बावजूद हिंदू राष्ट्र नहीं बन सका, लेकिन अमेरिका में हिंदुत्व की जयजयकार है क्योंकि जैसे पाकिस्तान का मतलब हिंदुस्तान के खिलाफ फौजी इस्लामी हुकूमत की तर्ज पर हिंदुत्व का मतलब मुसलमानों, दलितों और बहुजनों, शरणार्थियों और मेहनतकशों का एकमुश्त सफाया है तो नागपुर मुख्यालय और तेलअबीब के जायनी हिंदुत्व गठजोड़ की वजह से 2020 और 2030 से पहले ही अमेरिका हिंदू राष्ट्र बनने जा रहा है।
अमेरिका में अंतिम चरण के चुनाव प्रचार में डेमोक्रैट उम्मीदवार हिलरी क्लिंटन और रिपब्लिकन ट्रंप के बीच अब इकॉनमी अहम मसला बन गई है।
वहीं, शनिवार को ट्रंप के बेटे के एक आरती में हिस्सा लेने से उनके कैंपेन में हिंदू प्रतीकों के इस्तेमाल का एक और घटक जुड़ गया है।
ग्लोबल हिंदुत्व का यही हमारा राष्ट्रवाद है। जिसे सार्वभौम बनायेंगे महान धर्मयोद्धा डोनाल्ड ट्रंप।
अब इसकी कोई क्यों चिंता करें कि डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका इस वक्त नौकरियों की सबसे बड़ी चोरी से जूझ रहा है और ये नौकरियां भारत और चीन में जा रही हैं।
दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर वोटरों के वोट निर्णायक हैं, यह बातभी अर्थव्यवस्था से बेखबर हम भारतीयों की समझ में नहीं आने वाली है।
बहरहाल, हर हाल में बाजी नागपुर तेल अबीब गठबंधन के हक में है। क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप जीते तो अमेरिका में मुसलमानों का सफाया है और मैडम हिलेरिया जीतीं तो दुनियाभर में मुसलमानों का सफाया है।
बहरहाल राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विवादों के कारण डोनाल्ड ट्रंप को ज्यादा नुकसान हुआ है, हिलेरी को कम।
अमेरिका का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा ये तो आठ नवंबर को होने वाले मतदान के नतीजे आने पर पता चलेगा। फिलहाल हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप उन निर्णायक मतदाताओं को आखिरी पलों में रिझाने की कोशिश कर रहे हैं जो आखिरी पलों में किसी पार्टी के पक्ष में वोट डालने का मन बनाते हैं।
मजा यह है कि ट्रंप लगातार भारतीय मूल के वोटरों का दिल जीतने में लगे हुए हैं। इसके लिए ट्रंप हिंदू संगठनों के कार्यक्रम में शामिल होने से लेकर मोदी सरकार की तारीफ करने तक, हसंभव कोशिश कर रहे हैं।
पर हफिंगटन पोस्ट और सीवोटर का सर्वे ट्रंप की इस आकांक्षा को धूमिल कर रहा है।
हालिया सर्वे के मुताबिक भारतीय मूल के वोटरों की पसंद हिलरी क्लिंटन हैं, न कि ट्रंप। सर्वे के मुताबिक भारत और अमेरिका, दोनों जगह रहने वाले ज्यादातर भारतीय हिलरी क्लिंटन के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
इस चुनाव नतीजे से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है और हालात जैसे बन रहे हैं, भारत हो या न हो, अमेरिका का हिंदू राष्ट्र बनना तय है।
अमेरिका और रूस की मेहरबानी से हिंदू ग्लोब का एजंडा भी बहुत मुश्किल नहीं है।
यही हमारा वाम दक्षिण राष्ट्रवाद है तो यही अब अंबेडकरी मिशन का बहुजन राष्ट्रवाद भी है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गूंगों बहरों का संवैधानिक अधिकार भले हों, हकीकत में जब हम अपने हक हकूक के लिए भी लड़ने के लिए तैयार नहीं है तो लिखने बोलने की आजादी हमें क्यों चाहिए! कभी ना कहना फासीवाद!
एकदम ताजा खबर यह है कि रिपब्लिकन प्रत्‍याशी डोनाल्‍ड ट्रंप ”भारतीय संप्रभुता और परंपराओं के प्रति सम्‍मानजनक रुख रखेंगे लेकिन दुनिया भर में ऐसी सरकारों का समर्थन नहीं करेंगे जहां महिलाओं को दबाया जाता है और उनके प्रति सम्‍मानजनक नजरिया नहीं रखा जाता।”
यह पहेली बूझने जैसी बात ट्रंप के चुनाव अभियान की प्रमुख केलीएन कोनवे ने NDTV से खास बातचीत में कही। वही एनडीटीवी जिस पर एकदिन का प्रतिबंध लगा है। लेकिन लगता है कि ट्रंप ने इस प्रतिबंध के बारे में अपने उच्च विचार प्रकट नहीं किये हैं। भारत में भी लोग कमोबेश खामोश हैं।
मुश्किल यह है कि भारत की संस्कृति कभी नरसंहार की संस्कृति नहीं रही है।
विदेशी नस्लों ने मूलनिवासियों को बार बार पराजित किया है लेकिन उनका वह अश्वमेधी वैदिकी हिंसा उत्तर अमेरिका मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में काबिज श्वेत विदेशियों की अनंत रंगभेदी नरसंहार के मुकाबले निहायत शाकाहारी है।
वैज्ञानिक तथ्यों से प्रामाणित है कि अटूट वर्ण व्यवस्था और वंशगत जन्मजात जाति व्यवस्था के बावजूद, लगातार विदेशी नस्लों की घुसपैठ के बावजूद तथागत गौतम बुद्ध की क्रांति से पहलसे कोई दो हजार साल पहले भारतीय जनता के खून में एक दूसरे से कोई फर्क नहीं है।
गोरापन की अंधी दौड़ चाहे जितनी अश्लील और उत्कट है, दुनिया भर में सारे भारतीय अश्वेत हैं।
अमेरिका की तरह भारत में श्वेत बिरादरी कोई नहीं है हांलांकि रक्त की शुद्धता हमारा धर्म कर्म है लेकिन हमारा लोकसंसार सहिष्णुता और बहुलता का निरंतर महोत्सव है जो अब भी मुक्त बाजार का कार्निवाल पर भारी है।
हमारी मातृभाषाएं और जनपदों की बोलियां अभी विलुप्त नहीं हुई है।
हिंदू राष्ट्र या इस्लामी राष्ट्र भारत कभी नहीं बन सकता
जाहिर है कि इसीलिए हिंदू राष्ट्र या इस्लामी राष्ट्र भारत उसी तरह नहीं बन सकता जैसे महान सम्राट अशोक और सम्राट कनिष्क के बुद्धमय भारत भी कभी धर्मराष्ट्र नहीं रहा है। हमारा यह लोकसंसार ही हिंदू राष्ट्र के खिलाफ है।
मुश्किल यह है कि सिंधु सभ्यता की निरंतरता अभी जारी है। सालाना रावणवध और असुरवध के बावजूद उनके अनार्य वंशज अब भी भारत के बहुजन हैं जिनका आर्यों ने यथासंभव हिंदुत्वकरण कर दिया है और जो हिंदू हीं बने, वे आदिवासी भी हजारों साल से अपने वदूद, जल जंगल जमीन की लडा़ई जारी रखे हुए हैं।
वैदिकी काल में भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बना।
ब्राह्मण धर्म के वर्चस्व के बावजूद भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बना।
मुहम्मद गोरी के भारत विजय के बाद पलासी के युद्ध तक करीब सात सौ साल के इस्लामी निरंकुश राजकाज के दौरान भी भारत इस्लामी राष्ट्र नहीं बना और न हिंदुओं का सफाया हुआ।
दो सौ साल की ब्रिटिश हुकूमत के दौरान न हम अंग्रेज बने और न छिटपुट धर्मांतरण के बावजूद यूरोप और अमेरिका की तरह भारत ईसाई बना।
भारतीय लोकतंत्र में पद और गोपनीयता की शपथ किसी धर्मस्थल पर नहीं ली जाती और स्वतंत्र भारत का घोषित लक्ष्यभी न्याय और समता है तो पांच साल का चुनाव जीतकर कौन माई का लाल इसे धर्म राष्ट्र बना सकता है!
फिर भी धर्मराष्ट्र के नाम राम की सौगंध में जो देशभक्ति का जन्म हुआ है, उससे हजारों साल की सहिष्णुता और विविधता बहुलता निशाने पर है और यह हमलावर राष्ट्रवाद हिंदुत्व का एजंडा है। जिसे केंद्रित पक्ष विपक्ष की राजनीति है और उसी राजनीतिक समीकरण के मद्देनजर राष्ट्रवाद की नई परिभाषा है।
देशभक्ति का यह अभूतपूर्व नरसंहारी सौदर्यबोध है जिसके शिकंजे में सारे माध्यम और विधायें हैं।
कभी ना कहना फासीवाद!
मेहनतकश आम जनता के हाथ पांव सर काट लिये जायें, आदिवासी भूगोल में कत्लेआम हो जाये, देश के चप्पे चप्पे पर बेलगाम स्त्री आखेट जारी हो, जनता बुनियादी जरुरतों और सेवाओं की क्या कहें गैस चैंबर में कैद अनाज और हवा पानी के भी मोहताज हो जाये और इंडिया गेट पर किसी लापता छात्र की मां और बहन को पुलिस घसीटें, पीटे, बेइज्जत करें, दलितों बहुजनों पर अत्याचारों की सुनामी जारी रहे, जल जंगल जमीन मानवाधिकार आजीविका रोजगार नागरिकता से अनंत बेदखली अश्वमेध के बावजूद कभी ना कहना फासीवाद!
क्योंकि बहुमत का राज है।
क्योंकि बहुमत का धर्मराष्ट्र बनाने का पवित्र एजंडा का यह राजकाज है और रक्त की शुद्धता का रंगभेदी वर्चस्व का अनुशासन हमारा राष्ट्रवाद है।
आम जनता के हकहकूक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक हैं।
पीड़ित उत्पीड़ित दमन और नरसंहार के शिकार अल्पसंख्यक और बहुजनों की नागरिकता संदिग्ध हैं, इसलिए वे और उनके साथ खड़े तमाम लोग राष्ट्रद्रोही है। कभी ना कहना फासीवाद!
क्योंकि तुर्की जैसे आधुनिक राष्ट्र जहां धर्म इस्लाम है लेकिऩ आधुनिकता अमेरिका और यूरोप के टक्कर की है, जहां भाषा की लिपि रोमन, आटोमन, वैजंतिया और यूरोपीय साम्राज्यवाद के शिकंजे से आजाद होने के बाद रोमन लिपि में हैं और जहां स्त्री यूरोप और अमेरिका की तरह आजाद है लेकिन ग्रामीण समाज और जनपदों की संस्कृति कमोबेश शक आर्य अतीत की तरह सामाजिक और पारिवारिक तौर पर अटूट है।
वहां भी फेसबुक, ट्वीटर और तमाम सोशल मीडिया प्रतिबंधित हो गया है राष्ट्र की सुरक्षा के बहाने और सैन्य अभ्युत्थान के बाद अखबार और टीवी पर सेंसरशिप है तो सैकड़ों पत्रकार गिरफ्तार हैं।
सब कुछ वहां भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हो रहा है। कभी ना कहना फासीवाद!
राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर मीसा लागू करके जिन देशभक्त संघियों को इंदिरा गांधी के आपातकाल में गिरफ्तार किया गया था, सत्तर के दशक के जेपी आंदोलन से लेकर सिखों के नरसंहार , गुजरात नरसंहार के रामजन्मभूमि आंदोलनके मुक्तबाजार में वे ही अब राष्ट्र के कर्णधार हैं और वे भी इंदिरा के आपातकाल को लागू कर रहे हैं और उनका राष्ट्रवादी भी मैडम हिलेरी और डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति पुतिन के मुसलमान विरोधी तेलअबीब का राष्ट्रवाद है और यही 2020 तक हिंदू राष्ट्र और 2030 तक हिंदू ग्लोब बनाने का पवित्र एजंडा है तो आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप का शुद्धिकरण हो गया है और हिंदुत्वकरण से लेकर जायनीकरण की वैदिकी रस्म अदायगी भी हो गयी है और यही राष्ट्र की सुरक्षा में है तो देशभक्तों, कभी ना कहना फासीवाद!
मनुस्मृति अनुशासन का हिंदुत्व लागू करने का यह आपातकाल है, जिसे कमारेड लोग फासीवाद मानने को तैयार नहीं हैं और मनुस्मृति दहनका उत्सव माने वाले दलित और बहुजन भी इस फासीवादी आपातकाल के खिलाफ मोर्चाबंद लोगों की जाति और धरम की शिनाक्त करते हुए अपना बहुजन राष्ट्रवाद को उसी तरह भगवा राष्ट्रवाद में एकाकार करने में लगा है, जैसे बाबासाबहेब अंबेडकर और उनके एजंडा का भगवाकरण हुआ है। कभी ना कहना फासीवाद!
तुर्की जब सोशल मीडिया पर रोक लगा सकता है राष्ट्रहित में और सैकड़ों पत्रकार को गिरफ्तार कर सकता है तो किसी कारपोरेट टीवी चैनल के प्रसारण पर एक दिन के प्रतिबंध के खिलाफ मोर्चाबंदी बहुजन राष्ट्रवाद के खिलाफ भी है, क्योंकि निशाने पर जो पत्रकार है वह न ओबीसी है और न दलित और ना ही आदिवासी। कभी ना कहना फासीवाद!
सारे अखबार और सारे टीवी चैनल और समूचे सोशल मीडिया पर जब तक सेंसर लागू नहीं हो जाता, तब तक हम इंतजार करेंगे इस फैसले का कि यह राष्ट्रहित में माओवाद आतंकवाद दमन के लिए, मुसलमानों के सफाये के लिए अनिवार्य है या नहीं।
हमारे मौलिक अधिकार हो या न हों, हमारे नागरिक और मानवाधिकार बहाल रहे या न रहे, लोक गणराज्यभारत का वजूद कायम रहे या न रहे, देशभक्त नागरिकों को चुप ही रहना है।
सेना और पुलिस क्योंकि राष्ट्र के सेवक हैं और राष्ट्र के संसाधनों से उनका रक्षाकवच है तो सरकार चाहे उसका जैसा इस्तेमाल करें, हमारे लिए खामोशी से बेहतर कुछ नहीं है क्योंकि गूंगे बहरे का कोई दुश्मन होता नहीं है, हम गूंगे बहरे बने रहे तो बेहतर। कभी ना कहना फासीवाद!
क्योंकि भारत 2020 तक हिंदू राष्ट्र बने या न बने, अमेरिका अखंड नस्ली श्वेत वर्चस्व का आयुर्वेदिक विशुद्ध हिंदू राष्ट्र में तब्दील होने जा रहा है चाहे मैडम हिलेरी जीते या फिर डोनाल्ड ट्रंप।
अमेरिकी अखबार और मीडिया सत्तापक्ष के साथ है दस्तूर के मुताबिक इसलिए कागज पर अभी मैडम हिलेरी की बढ़त बनी हुई है। लेकिन मुसलमानों का काम तमाम करने के वायदे के साथ श्वेत वर्चस्व के कु क्लास क्लान गिरोह के शिकंजे में फंसा अमेरिकी बहुमत दक्षिणपंथी अति राष्ट्रवादी डोनाल्ड ट्रंप के साथ है और अच्छे दिन के सुनहले ख्वाब के साथ वे अमेरिका फतह कर रहे हैं।
मुसलमानों के खिलाफ घृणा करने वाले तमाम धर्मांध लोग उनके साथ हैं।
कभी ना कहना फासीवाद!
ट्रंप टैक्स घटाने की बात कर रहे हैं जैसे हमारे यहां टैक्स घटाने का जीएसटी समेत तमाम कर सुधार लागू है। वे आउटसोर्सिंग के खिलाफ हैं और अमेरिकी हाथों को भारत और चीन से छीनकर रोजगार देने का वायदा कर रहे हैं। उन्हें भी इजराइल का साथ मिला है और ग्लोबल हिंदुत्व सिर्फ उन्हीं के साथ है। कभी ना कहना फासीवाद!

जाहिर है कि अरबपति डोनाल्ड ट्रंप से बड़ा देशभक्त ओबामा या अमेरिका का कोई दूसरा राष्ट्रपति नहीं है।
मध्ययुग के दौरान यूरोप के धर्मयुद्ध के वे महान नाइट हैं जो यूरोप की तर्ज पर अमेरिका को इस्लाम मुक्त करने के धर्मयोद्धा हैं और हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक इस्लाम का सफाया हिंदुत्व का एजंडा है तो वे हिंदुत्व के भी धर्म युद्ध है। कभी ना कहना फासीवाद!
दूसरी तरफ, ताजा ईमेल लीक के मुताबिक मैडम हिलेरी का इजराइल के लिए सीरिया के विनाश के एजेंडा का खुलासा भी हो गया है। तेलयुद्ध के सच का खुलासा भी सामने है।
ट्विन टावर का सच भी उजागर होने लगा है। आईसिस को अमेरिकी हथियार और पैसों के बारे में भी सारे सबूत समाने आ रहे हैं। फिरभी अमेरिकी माडिया और सत्ता वर्ग और दुनियाभर के धर्मनिरपेक्ष लोग डोनाल्ट ट्रंप जैसे राष्ट्रवादी के बजाय अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था की महानायिका के पक्ष में हैं।

इसके बावजूद अंध राष्ट्रवाद के जीतने की प्रबल संभावना है।
गनीमत है कि अमेरिका में मुसलमानों के वोट भारत के निर्णायक मुसलमान वोट बैंक के आसपास नहीं है। अमेरिका के सारे मुसलमान एकमुशत ट्रंप के खिलाफ वोट करें तो भी उन्हें हराना मुश्किल है।
जिन शरणार्थियों के खिलाफ ट्रंप का जिहाद है, वे हालांकि अमेरिका में करोड़ों की तादाद में हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नागरिकता से वंचित हैं और नागरिक होंगे तो भी राष्ट्रपति चुनाव में उनके मताधिकार नहीं है।

शरणार्थी भी ट्रंप का कुछ बिगाड़ नहीं सकते।
अश्वेत मेहनतकश बिरादरी और पेशेवर नौकरीपेशा लोग जो ओबामा की जीत की जमीन बने रहे हैं, डोनाल्ड के अंध राष्ट्रवाद और सुनहले ख्वाबों के जाल में उलझ गये हैं। तो जाहिर है कि हिटलर के अवतार अमेरिका में कल्कि महाराज बनने को है। चूंक यह अखंड राष्ट्रवाद की जीत है। कभी ना कहना फासीवाद!
सोवियत संघ के पतन के बाद ऱूस और सोवियत के टूटे तमाम हिस्सों में इन्हीं राष्ट्रवादियों का वर्चस्व हैं। दक्षिणपंथी पराक्रम अब विश्वव्यापी है। रूस के राष्ट्रपति महामहिम पुतिन इस अंध राष्ट्रवाद के सबसे बड़े ईश्वर हैं इन दिनों जो सीरिया संकट के बहाने अरब दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व तोड़ने के युद्ध को तीसरे विश्वयुद्ध में बदलने की तैयारी भी कर रहे हैं और उनका खुल्ला समर्थन डोनाल्ड ट्रंप को है।

यह सारा खेल राष्ट्र और राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर बेरोकटोक जारी है।
बहुमत को बाकी जनता को रौंदने का यह अखंड राष्ट्रवाद है।
सत्तावर्ग के हितों का यह राष्ट्रवाद है। रंगभेदी वर्चस्व का यह राष्ट्रवाद है। लोकतंत्र के बहाने सैन्यराष्ट्र का यह राष्ट्रवाद अब भूमंडलीय और सार्वभौम है , जिसमें अमेरिका रूस और भारत के साथ साथ तुर्की जैसे राष्ट्र भी एकाकार है।
किसे मालूम था कि हिटलर का यह राष्ट्रवाद भूमंलीय उदारवाद के दौर में इतना सार्वभौम, इतना सर्वशक्तिमान सर्वत्र हो जायेगा, कभी ना कहना फासीवाद!

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