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Jagadishwar Chaturvedi at Barabanki
Jagadishwar Chaturvedi at Barabanki

हिन्दी की देह है फोटो, प्राण है संगीत

Hindi is neither the national language nor the mother tongue, nor the mother tongue.

हिंदी भाषा में अहंकार का भाव नहीं है। नायक नहीं हैं। यह ऐसी भाषा है जो प्रकृति से उदार है। हिंदी न तो राष्ट्रभाषा है न मातृभाषा है और न पितृभाषा बल्कि वातावरण या परिवेश की भाषा है। भारतीय समाज में संचार और संबंध की स्वाभाविक भाषा है,जीवन में इसे दूसरी प्रकृति कहते हैं। हिंदी को सीखने-सिखाने की जरूरत कम पड़ती है वह स्वाभाविक गति से अपना विकास कर रही है। किसी भाषा का स्वाभाविक गति से दूसरी प्रकृति के रूप में विकास करना उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। विश्व में अनेक भाषाएं हैं जिन्हें अपने विकास के लिए धर्म के कंधों का सहारा लेना पड़ा,साम्राज्य और सत्ता के सहारों की जरूरत पड़ी, हिंदी को इनमें से किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ी। हिंदी आरंभ से लेकर आज तक अपना विकास सत्ता,धर्म,राष्ट्रवाद,नायक के बिना करती रही है।

हिंदी में समय-समय पर सत्ता, धर्म और राष्ट्रवाद के खिलाफ जबर्दस्त आवाजें उठी हैं।

मजेदार बात यह है कि हिंदी में आने के बाद किसी भी किस्म का धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषायी फंडामेंटलिज्म अपनी मूल ध्वनि खो देता है। हमने कभी सोचा नहीं कि हिंदी में इस तरह की रूपान्तरणकारी क्षमता कहां से आयी है। हिंदी एक भाषा,एक सस्थान,एक आदत,प्रकृति के नाते उदार है। हिंदी की उदारता का प्रधान कारण है हिंदी का संचार की भाषा और संदर्भ की भाषा में रूपान्तरण।

हिंदी में यह रूपान्तरण कब और कैसे हुआ इसकी अभी खोज नहीं की हुई है। हिंदी मूलतः अंतर्वस्तु और सूचना को जरूरत के अनुसार सक्रिय करने का काम करती है। भाषाविज्ञान के पंडितों ने खासकर रामविलास शर्मा और अन्य मार्क्सवादियों ने हिंदी के साथ जुड़े राजनीतिक-आर्थिक परिणामों की ओर ध्यान दिया है, दूसरे भाषाविज्ञानियों ने हिंदी के भाषिक विकास के ऐतिहासिक क्रम को खोजने का काम किया है।

भारतेन्दु युग आने के बाद से जो लोग भाषा पर विचार करते रहे हैं हिंदी को राजनीति और शिक्षा के विकास के साथ जोड़कर देखते हैं। वे सीमित क्षेत्र में भाषा की भूमिका देखते हैं। असल में आज भाषा को रूपान्तरण के पैराडाइम पर रखकर देखा जाना चाहिए।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है भाषा कभी भी अपना विकास सीधी रेखा के विकास की तरह नहीं करती। वह उन तमाम अनजानी जगहों पर जाती है जिनके बारे में कभी सोचा नही गया। मसलन हिंदी वाले पहले सोच नहीं सकते थे कि हिंदी मीडिया, बाजार और इंटरनेट की सशक्त भाषा हो सकती है। हिंदी मीडिया की बड़ी भाषा हो सकती है।

भाषा उन रास्तों से भी गुजरती है जहां राजनीति ले जाना चाहती है और भाषा उन रास्तों से भी गुजरती हैं जहां इच्छाएं और आदतें लेजाना चाहती हैं। भाषा उन मार्गों से भी गुजरती है जहां बंदिशों-नियमों का पालन सख्ती से किया जाता है और उन रास्तों से भी गुजरती हैं जहां रोज नियम तोड़े जाते हैं। मसलन् दैनिक अखबार और पत्रिकाओं में भाषा के नियमों का पालन किया जाता है लेकिन रेडियो-टेलीविजन में भाषा के नियमों को प्रतिक्षण तोड़ा जाता है। भाषा के विकास के औपचारिक और अनौपचारिक दोनों रूप हैं। ये समान रूप से प्रभावशाली हैं, इसके बावजूद भाषा हमेशा व्यवहार में बनती है। किताबों में नहीं। बोलचाल में बनती है अखबारों में नहीं। टेलीविजन चूंकि बकबक का मीडियम है अतः वहां हिंदी जिस रूप में बन-संवर रही है उसका सामाजिक असर ज्यादा देखा जा सकता है।

Advertisements make the language of communication

यह धारणा है भाषा को साहित्य बनाता है, मौजूदा दौर में इस धारणा में संशोधन करने की जरूरत है। संचार की भाषा को विज्ञापन बनाते हैं। इनका विधाओं की प्रकृति और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर भी असर पड़ता है। हिंदी के सामयिक इडियम को बनाने में साहित्य से ज्यादा सिनेमा और विज्ञापन के स्क्रिप्ट लेखकों की बड़ी भूमिका है। इनकी भूमिका राज्य की भूमिका से भी बड़ी है। वे आज भाषा के नए रूपों को बना-बिगाड़ रहे हैं।

सिनेमा-विज्ञापन की भाषा को सारी दुनिया में सम्प्रेषित करने में सुविधा मिलती है। हिंदी की जातीय पहचान का इससे रूपान्तरण हुआ है। पहले हिंदी जातीयभाषा थी लेकिन आज ग्लोबल भाषा है सैटेलाइट टेलीविजन और इंटरनेट के कारण पहले अखबार देशज थे, स्थानीय थे लेकिन इंटरनेट पर जाते ही ग्लोबल हो गए हैं। यह परिवर्तन इसलिए आया क्योंकि संचार के माध्यमों में क्रांतिकारी बदलाव आया। हिंदी भाषा के विकास को हमें हमेशा कम्युनिकेशन के रूपों के साथ जोड़कर देखना चाहिए। इससे भाषा के विकास की सही दिशा को समझने में मदद मिल सकती है। हमारे अनेक हिंदीभक्तों की मुश्किल यह है कि वे हिंदी को जातीयता से जोड़कर देखते हैं, राष्ट्र से जोड़कर देखते हैं और उसके अनुसार अपनी भाषा की मांगें पेश करते हैं।

भाषा के विकास की संभावनाओं को देखने का यह तरीका सीमित हद तक मदद करता है। इससे भाषा के विकास की सही दिशा का पता नहीं चलता।

भाषा के विकास की सही दिशाओं का पता तब चलता है जब सामयिक संचार रूपों और माध्यमों के साथ उसे जोड़कर देखा जाए। भाषा का प्राथमिक काम है कम्युनिकेट करना।

हिंदी को हमने कम्युनिकेशन की भाषा के रूप में कम और अन्य राजनीतिक-सामाजिक-भाषायी पहलुओं के साथ जोड़कर ज्यादा देखा है। इससे भाषा की संकुचित समझ बनी है।

आधुनिककाल में राजनीति के साथ भाषा को जोड़कर देखने के कारण ही अनेक भाषा संबंधी मांगों का जन्म हुआ। भाषा के प्रति वफादारी तय हुई। इस समूची प्रक्रिया में भाषा को हमने राजनीति के हवाले कर दिया। राष्ट्रभाषा की मांग राजनीतिक मांग है। इसका भाषा के विकास से कम और राजनीतिक हितों के विस्तार से ज्यादा संबंध है।

सवाल किया जाना चाहिए कि हिंदी को राजनीति से जोड़ा गया लेकिन विज्ञान से क्यों नहीं जोड़ा गया ?

हिंदी को विज्ञान से जोड़ा गया होता तो हिंदी का भविष्य कुछ और होता। मध्यकाल में हिंदी साहित्य की भाषा रही, आधुनिक काल में सत्ता की भाषा बनी लेकिन इन दोनों ही युगों में हिंदी विज्ञान की भाषा नहीं बन पायी।

कहने का मकसद यह है कि हिंदी के दायरों को संचार, अन्य भाषाओं से संवाद-संपर्क और विज्ञान के साथ जोड़ने से हिंदी की प्रकृति और उसकी समस्याओं की प्रकृति एकदम भिन्न नजर आएगी।

बाहर का संसार ही हमारे मन में प्रवेश करके आंतरिक मन बन जाता है। आंतरिक मन कोई वायवीय चीज नहीं है। मनुष्य के आंतरिक मन में बाहरी जगत की ध्वनियां, रंग, क्रोध, आनंद, विस्मय, आशंका, सुख-दुःख आदि प्रवेश करते हैं। इसलिए बाहरी जगत को हम जितना गहराई से जानेंगे हिंदी वाले के मन को भी उतना ही गहराई से पकड़ सकते हैं।

हमने यह तो माना कि भाषा पर साहित्य और राजनीति का असर होता है लेकिन हममें से अधिकांश यह नहीं मानते कि भाषा पर मीडिया, संगीत, पॉपुलर कल्चर आदि का भी असर होता है। हम मानते हैं भाषा का संबंध साहित्य से है, पुरूष से है, पुंससत्ता से है, संस्कृति से है, लेकिन औरत और पॉपुलर कल्चर से नहीं है। यही वजह है कि जितने भी भाषा वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं वे पॉपुलर कल्चर और स्त्री के साथ भाषा के संबंध की अनदेखी करते हैं।

मध्यकाल में औरतें घरों में कैद थीं या फिर उनके पास सामाजिक जीवन में न्यूनतम जगह थी लेकिन आधुनिककाल में ऐसा नहीं है। आधुनिककाल में औरतें सामाजिक जीवन में व्यापक शिरकत कर रही हैं वे मीडिया से लेकर नौकरी के क्षेत्र तक अपनी जगह बना रही हैं। पहले स्त्री घर में कैद थी तो हम उसके हृदय को कम जानते थे ,भाषा में उसके हृदय की धड़कनें कम सुनी जाती थीं लेकिन आधुनिककाल में ऐसा नहीं है।

औरत घर की कैद से बहर आई है उसने सामाजिक जीवन में अपना स्थान बनाया है उसके समाज में बाहर आने से समाज पहले से ज्यादा सुंदर बना है, भाषा में सौंदर्य आया है। पुरूष के लिए जैसे-का -तैसा होना आवश्यक है लेकिन स्त्री को सुंदर होना चाहिए। उसकी वेश-भूषा, लाज-शरम, भाव-भंगी के सामाजिक एक्सपोजर ने भाषायी रूपों को बदला है। इससे भाषा भी प्रभावित हो रही है, खासकर विज्ञापन और मीडिया की भाषा को औरतें गहराई से प्रभावित कर रही हैं। इसके अलावा हिंदी पर मीडिया,संगीत और फोटोग्राफी का गहरा असर हो रहा है।

अब भाषा का कम और फोटो का संचार के लिए प्रयोग ज्यादा किया जा रहा है। भाषा का कम और संगीत धुनों का ज्यादा प्रभावी ढ़ंग से इस्तेमाल हो रहा है। नए दौर की हिंदी की देह है फोटो प्राण है संगीत।

साहित्य समीक्षकों और भाषा वैज्ञानिकों की मुश्किल है कि वे भाषा को साहित्य के खूंटे से बांधकर देखते हैं। वे इस क्रम में ठहर गए हैं। भाषा में ठहरा या रूका हुआ चिंतन अर्थहीन होता है। जो लोग भाषा को सृष्टि मानते हैं वे उसे साहित्य से बांधकर कैसे रख सकते हैं ? भाषा को किसी एक खूंटे से बांधकर रखना सही नहीं है। भाषा को यदि हम साहित्य से बांध देंगे, राजनीति से बांध देंगे तो क्या भाषा वहीं पर बंधी रहेगी ? भाषा कोई पशु नहीं है जिसे पशुशाला या कठघरे में बांधकर रख दिया जाए। रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में भाषा और साहित्य तो पकड़ने -बाँधने से परे है। भाषा को हमें मानव चरित्र में आए बदलावों की रोशनी में देखना चाहिए।

जो लोग समझते हैं अंग्रेजी से देश तेजी से तरक्की करेगा वे भ्रम के शिकार हैं। उनकी धारणाओं को विगत 63 सालों के अनुभव ने गलत साबित किया है। अंग्रेजी हमारी सत्ता और योजनाकारों की भाषा है किसी ने इसके विकास में बाधा नहीं दी इसके बावजूद अंग्रेजी आज भी बहुसंख्यक समाज, खासकर शिक्षितवर्ग का मन मोहने में असमर्थ रही है। ज्यादातर शिक्षित लोग ठीक से अंग्रेजी नहीं जानते। यहां तक कि बच्चों को अंग्रेज पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक-शिक्षिका भी ठीक से अंग्रेजी पढ़ाना नहीं जानते।

सवाल उठता है भारत में अंग्रेजी के विकास को किसने रोका ?

अंग्रेजी यदि संचार की सबसे प्रभावी भाषा है तो हमारी पंचवर्षीय योजनाएं आम जनता से क्यों नहीं जुड़ पायीं ? अधिकांश सरकारी योजनाएं फाइलों तक सीमित क्यों रह गयी ? साधारण लोगों की बात छोड़ दें, जरा अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों से बात करके देख लें कि वे देश की योजनाओं के बारे में वे कितनी समझ या जानकारी रखते हैं ?

आजाद भारत में हिंदीभाषियों एकवर्ग पैदा हुआ है जो हमेशा अंग्रेजी बोलता है और उनके बच्चे कॉन्वेट स्कूलों में पढ़ते हैं। ये लोग हिंदी बोलने में अपमान महसूस करते हैं। इनकी श्रेष्ठता कलंकित होती है। अंग्रेजी को पुचकारने, पालने और सत्ता संरक्षण देने की नीति से 63 सालों में कोई खास उन्नति नहीं हुई है।

हमें भारतीय भाषाओं को अपमानित करने के भावसे मुक्त होना होगा। हमें अंग्रेजी दा मध्यवर्ग से यही कहना है कि वे अपनी दैनंदिन भाषा में से हिंदी के शब्दों को बहिष्कृत करके अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोगों को बंद करें इससे वे हिंदी का अपमान कर रहे हैं। यह दुख की बात है कि हिंदीभाषी मध्यवर्ग और संभ्रांतवर्ग के लोग हिंदी के लिए स्वयं तो कुछ नहीं करते लेकिन हिंदी लेखकों -शिक्षकों और विद्यार्थियों से उम्मीद करते हैं कि वे हिंदी के उत्थान के लिए कुछ करें। वे भूल गए हैं कि उनकी भी अपनी भाषा के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी है। वे चाहते हैं हिंदी शुद्ध और समृद्ध हो जाए। ग्लोबल भाषा बन जाए। संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बन जाए। इन लोगों को यह सोचना चाहिए कि हिंदी क्या हिंदी के लेखकों-शिक्षकों-छात्रों की भाषा है ? वह पूरे समाज की भाषा है। एक अन्य चीज जिस पर ध्यान देने की जरूरत है वो है हिंदीभाषी पूंजीपतिवर्ग की भूमिका पर।

हिंदीभाषा के साथ आधुनिक काल में हिंदीभाषी बुर्जुआवर्ग ने अपने को नहीं जोड़ा, उसने अंग्रेजी से जोड़ा। इससे हिंदी के विकास में बाधा आयी है।

आधुनिक काल में किसी भी भाषा को विकास के लिए अपने बुर्जुआ वर्ग का समर्थन न मिले तो उसके स्वाभाविक विकास में बाधाएं आती हैं। अंग्रेजी, फ्रेंच, बंगला, तमिल, मलयालम, तेलुगू, मराठी आदि के साथ बुर्जुआवर्ग का गहरा संबंध है लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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