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हिन्दुत्व नहीं, दलबदलुओं-धनवानों की हितपोषक भाजपा

अरविन्द विद्रोही
पार्टी विद द डिफरेन्स का नारा गढ़ने वाली भारतीय जनता पार्टी का अपने ही नेताओं-राजनैतिक कार्यकर्ताओं के प्रति असल सोच-रवैये की परत दिन प्रति दिन खुलती ही जा रही है। राष्ट्रवादी विचारधारा का ध्वजवाहक होने की प्रबल दावेदारी करती रहने वाली भाजपा इस लोकसभा चुनाव में एक बेहतरीन कन्वर्टर के तौर पर उभरी है। तमाम ऐसे दिग्गज नेता जो वर्षों से पानी पी-पी कर भाजपा के चाल-चरित्र-चेहरे पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुये वैचारिक-बौद्धिक विषवमन करते चले आ रहे थे, भाजपा के प्रति विगत वर्षों में नरेंद्र मोदी- मुख्यमंत्री, गुजरात के गढ़े गये व्यक्तिगत आभा मंडल के प्रभाव के चलते बने माहौल व जनता के रुख को भाँपते हुये शातिराना अंदाज़ में अपने पुराने दल रूपी केंचुल को त्यागकर भाजपा के रंग में रंग गये। तमाम दलों के दल-बदलू राजनेता तो अपने मकसद में पूरी तरह से कामयाब हो रहे हैं परन्तु स्वयं को बौद्धिक सम्पदा से सम्पूर्ण तौर से संपन्न मानने-समझने वाले भाजपा नेतृत्व का मानसिक दिवालियापन व अपने कार्यकर्ताओं-हिन्दू समाज के मन को ना समझ पाना पुनः सार्वजानिक हो ही गया है।
चुनावी बेला है, चुनावी समर में अपने योद्धाओं को उतारने की जगह जिस प्रकार से भाजपा नेतृत्व ने टिकटों का बंदरबाँट किया है उससे यह तो साफ हो ही चुका है कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के अंदरखाने ही भाजपा का बँटाधार करने की योजना, दुष्चक्र, साजिश रची जा चुकी है। भाजपा को अपनी रथयात्रा के माध्यम से राजनैतिक पटल पर चमकाने वाले और हिन्दू समाज के ह्रदय में अपनी विशिष्ट जगह बनाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की अनवरत उपेक्षा-तिरस्कार शनैः-शनैः गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव के पैनेपन को कुंद करने का कार्य कर च चुकी है। भाजपा के अंदरखाने पुराने-वरिष्ठ नेताओं को निपटाने की जो राजनीति राजनाथ सिंह के अध्यक्ष काल में रची गई है वो भाजपा को इसी लोकसभा चुनाव में पिछाड़ने के लिये आधार बना चुकी है।
भाजपा नित नया मुखौटा लगाने व नारा गढ़ने के फेर में यह विस्मृत कर चुकी है कि भारत की आम जनता नौटंकीबाजी व थेथरेबाजी कतई बर्दाश्त नहीं करती है। विचारधारा का बदलाव, “रात गई बात गई” की तर्ज पर करने वालों को समाज पसंद नहीं करता है। घोषित तौर पर भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाया है परन्तु यह मंसूबा अपने ह्रदय में राजनाथ सिंह- अध्यक्ष, भाजपा भी पाले बैठे हैं। उत्तर-प्रदेश में कल्याण सिंह जैसे मजबूत जनाधार, कुशल प्रशासक छवि वाले नेता को दरकिनार कर राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बन चुके हैं। उत्तर-प्रदेश भाजपा की दुर्दशा के लिये जिम्मेदार भी राजनाथ सिंह ही माने जाते हैं परन्तु पुरानी कहावत है ही कि जब अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। वैसे भी हसरतों की उड़ान पर कोई पाबन्दी नहीं है और अगर मोदी लहर में सत्ता सुंदरी का रसास्वादन करने का मौका हाथ आ ही जाये तो क्या कहना ? लेकिन वो राजनेता ही क्या जो सिर्फ मौके का बाट जोहे, कुछ तीन तिकड़म व अपनी गोटियाँ भी बिछानी एक चतुर कर्मयोगी की निशानी होती है और राजनाथ सिंह का राजनैतिक कर्म भी पार्टी के ही भीतर पार्टी के नेताओं के पर कतरने,ठिकाने लगाने एवं सिर्फ अपने प्यादों को पार्टी के पदों पर बिठाने, टिकट दिलाने का ही रहा है।
शातिराना अंदाज़ में एक मुद्दे को त्यागकर शब्दों की बाजीगरी, लफ्फाजी और नाटकीय भाव-भंगिमा के प्रदर्शनों से जनमानस अधिक वक़्त तक प्रभावित नहीं रहता। श्री रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के जरिए राजनैतिक सत्ता के शिखर केंद्र पर काबिज हो चुकी भाजपा ने समन्वय-गठबंधन की मजबूरियों का हवाला देकर मात्र सत्ता का सुख भोगा और श्री रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन से बड़ी चतुराई पूर्वक किनारा कस लिया। हिंदी-हिन्दू-हिन्दुत्व का उद्घोष करने वाली भाजपा के शीर्षस्थ नेता पत्रकारों से अक्सर अंग्रेजी में गपियाते हैं, हिन्दू के नाम पर पाकिस्तानी-बांग्ला देशी हिंदुओं की फिक्र का राग अलापते हैं और हिन्दुत्व के स्थान पर विकास का जाप करते हैं। दलबदलुओं को अंगीकार करने में कीर्तिमान स्थापित करने में सफल हो चुकी भारतीय जनता पार्टी का यह दौर हिन्दुत्व की भावना व जमीनी भाजपा कार्यकर्ताओं के हितों को ख़त्म करने वाला साबित हो रहा है। अतिरेक उत्साह में नमो-नमो का जाप, धार्मिक नारे के साथ नरेंद्र मोदी के नाम का बेजा जुड़ाव तथा राजनाथ सिंह की बिछाई शतरंजी बिसात की चाल इसमें पूरी तरह उलझ चुके नरेंद्र मोदी का प्रभाव-लहर तेजी से हिन्दुत्व के आधार पर समर्थन-मत देने वालों के माथे से उतर रहा है। साधू-संतों की नाराजगी सार्वजनिक हो ही चुकी है। अयोध्या विधानसभा चुनाव हारने वाले लल्लू सिंह को फैज़ाबाद लोकसभा से प्रत्याशी बनाना हो या बस्ती, खलीलाबाद, अम्बेडकरनगर तीनों श्रृंखलाबद्ध सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतारना हैरान करता है। बाराबंकी सुरक्षित से एक नौकरशाह की पत्नी को भाजपा प्रत्याशी के रूप में थोपे जाने से वर्षों पुराने भाजपाई भौचक हैं और नौकरशाह रहे पी एल पुनिया को कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर अपना साँसद चुन कर भुगत चुकी बाराबंकी की जनता भाजपा द्वारा नौकरशाह की पत्नी को प्रत्याशी बनाये जाने से असमंजस में पड़ा मतदाता बसपा के साथ जा सकता है। कैसरगंज, गोण्डा, डुमरियागंज इन तीनों सीटों पर दलबदल कर आये नेता ही भाजपा के प्रत्याशी हैं। अयोध्या आंदोलन के अगुवा रहे रामविलास वेदांती (पूर्व साँसद ), चिन्मयानन्द (पूर्व मंत्री ), हों या फिर आस्था के केंद्र गोरक्षपीठ के मठाधीश योगी आदित्यनाथ (साँसद ) सभी भाजपा के टिकट वितरण से असंतुष्ट ही हैं। हिन्दुत्व के लिये बलिदान हो गये टाण्डा-अम्बेडकरनगर के स्व. रामबाबू गुप्ता व स्व. राम मोहन गुप्ता के परिजनों, विश्व हिन्दू परिषद्, हिन्दू युवा वाहिनी की अम्बेडकरनगर लोकसभा सीट से श्रीमती संजू देवी पत्नी स्व. रामबाबू गुप्त को प्रत्याशी घोषित करने की वाजिब माँग को भाजपा नेतृत्व ने ठुकराते हुये एक शिक्षा व्यवसायी /पूँजीपति को अपना उम्मीदवार बना दिया। स्व. रामबाबू गुप्ता के परिवार की उपेक्षा की कीमत स्वरूप भारी नुक्सान अगल-बगल की तमाम सीटों पर पड़ने का अंदेशा है।
खलीलाबाद सीट पर योगी आदित्यनाथ की इच्छा को जिस प्रकार से दरकिनार कर शरद् त्रिपाठी पुत्र रमापति त्रिपाठी को पुनः प्रत्याशी बना दिया गया है उससे योगी ही नहीं हिन्दुत्व की राजनीति की, संघर्ष की राजनीति करने वाले प्रत्येक हिन्दू को ठेस पहुँची ही है।
प्रत्याशी चयन में पीछे रह गयी भाजपा वैसे भी हिन्दुत्व, सिद्धांत, संघर्ष की राजनीति का त्याग कर के नमो नमो के जाप में जुटी है। भाजपा की उत्तर-प्रदेश की राजनीति में टाण्डा-अम्बेडकरनगर में हिन्दुत्व की राजनीति के सशक्त हस्ताक्षर रहे बलिदानी स्व. राम बाबू गुप्ता की पत्नी के स्थान पर एक धनवान ब्राह्मण को प्रत्याशी घोषित करके भाजपा ने साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर, यथार्थ में हिन्दुत्व का अर्थ उनके लिये धन व ठाकुर-ब्राह्मण हित ही होता है। भाजपा के उत्साही युवाओं-कार्यकर्ताओं को अब यह तथ्य ध्यान रखना चाहिए कि जब भी किसी हिन्दू योद्धा के बलिदान, त्याग, संघर्ष को भाजपा संगठन अपने तराजू में तौलेगा तो धन व जाति का गठजोड़ हावी रहेगा और हिन्दुत्व के हित के लिये दिया गया बलिदान नेपथ्य में इसी तरह धकेला जायेगा।

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अरविन्द विद्रोही, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं।

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