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फ़ोन पर लड़की, चैनल पर नमो-नमो

पतली गली से कटने का कष्ट या तो मंटो ने झेला या अपन ने…. कहाँ तो ससुरे ग़ुलाम कश्मीर के मुजफ्फराबाद तक से फ़ोन आते थे, सर जी हमें अपना स्टिंगर ही बना लीजिये…… सुना है आपके साथ काम करने में बहुत मज़ा आता है…… एकाध एके चाहेंगे तो भिजवा देंगे…… और अब…….
दिन में 18 घंटे फ़ोन से लगे रहने वाले कान अब सुनने को तो मोहताज़ हो ही गए, मैसेज भी कैसे-कैसे….. हम फलानी जगह घास खोदने जा रहे हैं आपकी उपस्थिति से हम महकने लगेंगे …. ये आप वाले होते हैं … आज दोपहर क्रिकेट मैच देखते मैसेज आया और जो अक्सर आता है…… मैं अकेली हूँ आप क्या कर रहे हैं….. चलिए मीठी मीठी बातें करें…… अब उस नेकबख्त को क्या समझाऊँ कि मैं उसी को कोस रहा हूँ…..
सोचा न्यूज़ चैनल को…. टटोला जाए ….. हालाँकि दोपहर का वो समय ऐसा होता है कि लगभग सभी चॅनेल सास भी कभी बहु थी या किस्मत कनेक्शन या निर्मल दरबार की चिप्पी लगा कर बैल की तरह औंघाते मिल जाएंगे…. लेकिन आज की दोपहर या तो फ़ोन पर माया, शीला या कैंडी नाम की लड़की हमसे कुछ कहने पर तुली थी या चैनल हमें नमो-नमो सुनवाने पर तुले थे।
जिस चैनल पर जाओ भागलपुर गए प्रधानमंत्री का दमकता चेहरा था …. उनका शरीर पूरी लय में हाथ पाँव फेंक रहा था …. गले में पड़ा दुपट्टा अपनी पूरी शान में था….. मैं अपने रिमोट को दबाता-दबाता थक गया, पर मोदी नहीं थमे….. छत पर बन्दर बहुत आते हैं….. लेकिन वहां भी उन्हीं की आहट….. छोटी सी कनि चिल्लाई तो लगा नीतीश-नीतीश चिल्ला रही है….. कबीर बोले तो लगे बिहार-बिहार…. आखिर सर पीटता हुआ बहुत दिन से छोड़ा पान खाने निकल आया…..
यह बिलकुल समझ से परे है कि प्रधानमंत्री बोले तो हमें उन्हें बोलते जबरन क्यों दिखाया जाना चाहिए…. दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा होता है क्या … क्या किसी देश का मीडिया इस कदर गुलाम है क्या…. एक चुनावी प्रचार के लिए गए प्रधानमंत्री के बोल सुनना पूरे देश के लिए ज़रूरी क्यों है क्या कोई आपात स्थिति है या देश पर ऐसी कौन सी आफत आ पडी है कि हम नमो नमो सुनें….. मीडिया को पी एम ओ को आदेश जारी हो जाता है कि बंद कर ये सब ऊल-जुलूल दिखाना…. बिहार संवरने जा रहा है …. उसको दिखा … और सभी चैनल अपनी कमर को कुछ इस अंदाज़ में झुकाते हैं कि अगले को बैठा हुआ लगे ( इस पर एक लड़का लड़की का विज्ञापन भी है …. किसी मित्र को याद पड़े तो ज़रा बता दे 2014
से पहले चैनल इस तरह एक लाइन में कुदक्क्ड़ी मारे दिखते थे…. हाँ राज्यसभा की शोभा बढ़ा रहे चैनल मालिकों की बात और है
असली बात तो ये है कि आज़ाद भारत के एकमात्र जन नेता जवाहर लाल नेहरू ही थे….. बाक़ी तो सब भीड़तंत्र से जुड़े मैनेजमेंट गुरु हैं…… वो व्यक्ति चाहे जब बोले जनता सुनने को तैयार रहती थी, लेकिन उसके लिए उनके और उनकी जनता के बीच न तो पीएमओ नाम का भारी भरकम प्रतिष्ठान हुआ करता था न इतने सारे न्यूज़ चैनलों के ताम झाम……
ये पीएमओ जैसा सत्ता का पिछवाड़ा अटल जी की देन है…. इंदिरा जी चौकड़ी से काम चलाती थीं और राजीव दोस्ती यारी से
अब सवाल ये है कि प्रधानमंत्री हमसे अलग हैं या हममें से ही कोई….. किस लोकतांत्रिक देश में किसी सत्ताधारी के सड़क पर निकलने पर ट्रैफिक रोक दिया जाता है … इस देश में तो पूरे चलते-फिरते समाज को कुंद बनाया जा रहा है ….. और दिक्कत ये है कि हम कुंद हो रहे हैं
राजीव मित्तल

About the author

जबलपुर में ‘नई दुनिया’ के स्थानीय संपादक, और मेरठ में ‘हिंदुस्तान’ के स्थानीय संपादक रहे राजीव मित्तल वरिष्ठ पत्रकार हैं। ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक हिंदुस्तान’ होते हुए अब आगरा से छपने वाले ‘पुष्प सवेरा’ में सम्पादक रहे मित्तल जी नव भारत टाइम्स एवं ‘जनसत्ता’ (चंडीगढ़) में मुख्य उप सम्पादक भी रहे हैं।

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