डीएनए प्रोफाइल कानून सीधे जनसंख्या के सफाये का इंतजाम

क्योंकि इस वक्त रीढ़ सबसे जरूरी है, जो नहीं है इसीलिए इस मूसलाधार में कयामत और हुकूमत साथ-साथ, चारों तरफ मूसलाधार। घनघोर मूसलाधार। इसीलिए मां बहुत डरी डरी है कि किसी की खैरियत नहीं है। उंगलियों की छाप काफी नहीं हैं, अब वे गुप्तांग का नमूना भी लेंगे और कुछ भी फतवा जारी करके सरेआम …
 | 

क्योंकि इस वक्त रीढ़ सबसे जरूरी है, जो नहीं है
इसीलिए इस मूसलाधार में कयामत और हुकूमत साथ-साथ, चारों तरफ मूसलाधार। घनघोर मूसलाधार।
इसीलिए मां बहुत डरी डरी है कि किसी की खैरियत नहीं है। उंगलियों की छाप काफी नहीं हैं, अब वे गुप्तांग का नमूना भी लेंगे और कुछ भी फतवा जारी करके सरेआम कत्ल कर देंगे। फिर कत्ल और कातिल के खिलाफ जो जुबान खोलेगा, वह सीधे देशद्रोही माना जायेगा। बेमौत मारा जायेगा।
एहतियात कोई काफी नहीं, अब आवाम से आवाम का चेन बनाने से ही मां को चैन आयेगा कि चाक चाक हो रहा मां का जिगर इन दिनों!
क्योंकि इस वक्त रीढ़ सबसे जरूरी है, जो नहीं है।
इसीलिए इस मूसलाधार में कयामत और हुकूमत साथ-साथ, चारों तरफ मूसलाधार।
इसीलिए मां बहुत डरी डरी है कि किसी की खैरियत नहीं है।
उंगलियों की छाप काफी नहीं हैं, अब वे गुप्तांग का नमूना भी लेंगे और कुछ भी फतवा जारी करके सरेाम कत्ल कर देंगे।
एहतियात कोई काफी नहीं, अब आवाम से आवाम का चेन बनाने से ही मां को चैन आयेगा कि चाक चाक हो रहा मां का जिगर इन दिनों!
हमने अपने ब्लागों मे पहले से अंग्रेजी में सविस्तार आगाह किया था डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक के बारे में, जो इसी मानसून सत्र में पास होना है। युवा पत्रकार भाषा सिंह का आभार कि उनने हिंदी में आउटलुक में यह मसला भी उठा दिया है, जिस पर संसद में सिरे से चुप्पी है और जैसे दूसरे कानून पास हो रहे हैं, वैसे ही यह विधेयक गुपचुप कानून बन जाना है। नागरिकता संशोधन विधेयक अभी तक लोग समझ नहीं सके हैं और आधार का एजंडा समझाते समझाते हम थक गये हैं।
इस पूरे मसले पर उषा रमानाथन ने आउटलुक से बातचीत के दौरान बताया कि यह विधेयक बेहद खतरनाक है। यह नागरिकों की निजता का खुलेआम उल्लंघन करते हुए राज्य और जांच एजेंसियों को व्यक्ति के जीवन ही नहीं, बल्कि शरीर पर भी अतिक्रमण करने की अपार छूट देता है। यह तानाशाही को बढ़ावा देने वाला है और कहीं से भी वैज्ञानिक नहीं है। खासतौर से आज के दौर में जब जानकारियां कहीं भी सुरक्षित नहीं रहती, तब व्यक्तियों की निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारियों का क्या इस्तेमाल हो सकता है, इसका किसी को अंदाजा नहीं है। ऐसे में डीएएन डाटा बैंक बनाना कितना खतरनाक हो सकता है, इस बारे में समाज को सोचना चाहिए।
गुप्तांग की सैंपलिंग से लोगों को सेनसेक्स का मजा आ रहा है क्योंकि इस नये कानून के जरिये इसका इस्तेमाल सिर्फ आपराधिक मामलों के निपटारे में ही नहीं बल्कि दीवानी मामलों में किया जाएगा।
और तो और डीएनए प्रोफाइल के जरिए जमा की गई जानकारी का प्रयोग जंनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों में भी किया जाएगा। इसे लेकर पहले अल्पसंख्यक समुदायों, आदिवासियों और दलितों में गहरी आशंकाएं हैं। इस तरह से जुटाई गई जानकारी को इन तमाम तबकों को निशाने पर लेने, उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने और नियंत्रित करने में किया जा सकता है।
पहले ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बता दिया है कि नागरिकों को निजता का कोई अधिकार नहीं है। ……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
मेहनतकशों के सारे हकहकूक श्रम सुधारों के जरिये खत्म है।
नोट छापने का काम भी अब प्राइवेट सेक्टर में होने के आासर है क्योंकि रिजर्व बैंक की अब कोई औकात ही नहीं है। राजन किस बात के राजन हैं और किस बात के गवर्नर हैं, समझ में नहीं आता। वरना इतनी बेइज्जती खराब होने के बाद तो किसी भी रीढ़ वाले शख्स को तुरंत रिजाइन कर देना चाहिए।
जैसे इन दिनों राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, कलाकार, साहित्यकार में रीढ़ कोई होती नहीं है वैसे ही अर्थशास्त्री भी रेंगने वाले लोग है। राजन के हाथ पांव काट दिये गये हैं और वे अभी पद पर बने हुए हैं। हालांकि रिजर्व बैंक का निजीकरण वैसे ही हो गया है जैसे रेलवे का निजीकरण हो गया है।
ट्रस्ट से बंदरगाहों को कारपोरेशन बनाकर डाउ कैमिकल्स के वकील ने उनको बरसों पहले प्राइवेट बना दिया है और एअर इंडिया को विलय के मार्फत तोड़ा जा रहा है तो कोलइंडिया को तोड़कर तोड़ा जा रहा है। सारे सरकारी बैंकों में निजी क्षेत्र का प्रंबंधन है तो बीमा बाजार में है।
संपूर्ण निजीकरण, संपूर्ण एफडीआई, संपूर्ण विनियंत्रण संपूर्ण विनियमन, संपूर्ण महाजनी पूंजी और संपूर्ण अमेरिकी उपनिवेश, संपूर्ण जायनी राजकाज रंगभेदी नस्ली वर्चस्ववादी सामंती साम्राज्यवादी दरअसल शत प्रतिशत हिंदू राष्ट्र का नक्शा यही है।
इसीलिए बेहद तरकीब से मीडिया को केसरिया बनाया गया है सबसे पहले। मीडिया के इस केसरिया बनने के पीछे मसीहा संप्रदाय का सबसे बड़ा हाथ है, जो एक से बढकर एक पाखंडी रहे हैं। बात करेंगे उदारता की और राज होगा फतवाबाजों का जैसा हूबहू संघ परिवार का राजकाज है।
जन्नत का हकीकत यही है।
संघ परिवार पूरे देश का गुप्तांग निकालकर शीमेल क्लोनिंग की जुगत में है। यही डीएनए प्रोफाइल कानून है तो यही हिंदुस्तान को गैरहिंदुओं के सफाये का चाकचौबंद इंतजाम भी। सीधे जनसंख्या के सफाये का इंतजाम है।
माताओं को डरना ही चाहिए और माताएं अगर डर रही हैं और अपने अपने रब से खैरियत की दुआ मांग रही हैं तो समझ लीजिये कि कयामत और हुकूमत साथ-साथ हैं तो कयामत बहार कैसे गुल खिलायेंगी इस अनंत वधस्थल पर वैदिकी हिंसा के दौर में।
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
लोगों को खुशफहमी है कि दुआ करने से इस नर्क से निजात मिलेगी। अब ताजा खबर है कि उनने देशद्रोहियों की पहचान कर ली है और चुन चुनकर मुठभेड़ में कुत्तों की मौत मार देंगे जो अवांछित हैं हिंदू राष्ट्र में और यह वैदिकी हिंसा की उदारता है कि वध कार्यक्रम पारदर्शी है और वध के लिए पूरी न्याय प्रणाली का लोकतंत्र और कानून का राज है।
कश्मीर को ही लें। वह हर मसले को लेकर जनता आंदोलित है। हर कहीं प्रदर्शन हो रहा है और हर कहीं मुठभेड़ भी हो रही है। तो कायनात से भी कहर बरप रहा है।
मणिपुर में आफसा है और कभी भी कहीं भी किसी की तलाशी बिना वारंट करने की, किसी को भी बिना कैफियत गोली मार देने की छूट है। वहां भी अभूतपूर्व मूसलाधार है।
मध्यभारत में सलवा जुड़ुम में जल थल एकाकार है तो राजस्थान गुजरात और महाराष्ट्र का भूगोल कमसकम बारिश ने एक कर दिया तो हिमालय में निरंतर आपदाओं ने सरहद बेमायने बना दिये। तो बंगाल बिहार उड़ीसा जल ही जल है। उथल पुथल है।
पंजाब तो ज्वालामुखी की तरह सुलग रहा है और फटेगा किसी दिन। उसके सारे जख्म अब नासूर हैं और सारे कातिल हुकूमत के सिपाहसालार हैं। कायनात की नाराजगी भी यही और रब है तो वह भी यकीनन नाराज होगा और सारे हिसा किताब बराबर कर देगा।
मां का जिगर दरअसल यह मुल्क है जैसे बसंतीपुर मेरा मुल्क रहा है और मेरी मां के नाम जबसे बसा वह गांव, मेरी मां एक दिन के लिए भी बसंतीपुर से बाहर नहीं निकली और वहीं मधुमेह की वजह से पांव के जख्म से गैंगरीन होने से उनने दम तोड़ा।
मेरे पिता को दुनिया जहां कि फिक्र थी और और उनके पांव तले सरसों की पूरी फसल थी जो उनके पांव बसंतीपुर में टिकते न थे।
मेरी मां ने न मेरे बाप की तरह और न मेरी तरह इस मुल्क के भूगोल को जिया न इतिहास में कहीं रमा था उनका मन। हर सुबह वे घर ङर जाकर सबसे पूछती थीं कि उनका हल कैसा है। हर रसोई में ताक झांक करती थीं कि चूल्हा जला कि नहीं जला।
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बसंतीपुर उनका मुल्क है और मैं बखूब जानता हूं कि मेरा मुल्क अगर मेरे मरहूम बाप का जमीर है तो मेरा मुल्क मेरी मरहूम मां का जिगर है।
मां नहीं है। बाप भी नहीं है। यूं कहिये कि अनाथ हूं लेकिन बसंतीपुर अभी सही सलामत है और हर घर में चूल्हा भी जल रहा है।
फिर भी जल रहा है मेरा मुल्क।
फिर भी टुकड़ा टुकड़ा बिखर रहा है मेरा मुल्क।
कहा जाता है कि दिल में वहम हो तो फौरन इबादत करना चाहिए।
कहा जाता है कि दिल में वहम हो तो फौरन रब से पनाह मांगना चाहिए। पूजा पाठ जो करें सो करें। यज्ञ होम वगैरह वगैरह करें।
खूब नमाज पढ़ें। वक्त बेवक्त कलमा भी पढ़े। दिल से खैरियत के वास्ते दुआ भी खूब मांगें कि मन्नत के भरोसे है मजहब शुरु से।
मैं वैसा कुछ भी नहीं कर सकता।
काफिर हूं कि कोई रब मेरा नहीं है।
इबादत मेरी आदत नहीं है।
मजहब मेरा ईमान नहीं है और सियासत से कोई नाता भी नहीं है। मेरे मां बाप आवाम की सोचते थे, रब के बारे में सोचें न सोचें।
किसी रब से अपने मुल्क की खैरियत की दुआ मैं हरगिज नहीं मांगता। किसी रब या शहंशाह से पनाह भी नहीं मांगता मैं।
मेरा मजहब मेरा मुल्क है।
मेरा ईमान मेरा मुल्क है।
मेरा जमीर मेरा मुल्क है।
मेरा जिगर मेरा मुल्क है।
मेरा महबूब मेरा मुल्क है।
दोस्ती हो चाहे दुश्मनी, मुहब्बत हो या चाहे नफरत लबालब, पानियों का जलजला हो या आग का दरिया हो, मुल्क फिर मुल्क है।
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
मेरा हर रास्ता आवाम तक जाता है।
मेरा हर रास्ता आवाम से निकलता है।
ये तोपें, ये परमाणु बम ये एहतियाती इंतजाम किसी काम नहीं आयेंगे कारोबार और मुनाफा वसूली के सिवाय, मजलूमों पर और और कहर बरसाने के सिवाय।
मुल्क को किसी गैर मुल्क से उतना खतरा नहीं होता जितना बंचे हुए आवाम के आपसी जंग से खतरा होता है।
दिलों से दिलों के तार जुड़े हों तो कही कोई खतरा होताइच नहीं है।
मुहब्बत अगर जबाव पर हो तो नफरत की क्या औकात कि हमें बांट दें, जमीन अगर सोना उगले तो क्या फर्क पड़ता है बाजारों में सोने के बदलते बिगड़ते भावों से। गड़बड़ यह है कि घर का सोना फेंककर हम बाजार के भरोसे हैं जितनी जरूरत है, उससे कहीं ज्यादा।
मेरी मां नहीं हैं।
लेकिन इस मुल्क की हर मां के चेहरे पर दहशत की फिजां देख रहा हूं। मां डरी हुई है.बेहद डरी हुई है कि फिर न जाने किस किसको कुर्बान करना पड़े क्योंकि महाबारत चालू आहे और मुल्क अब कुरुक्षेत्र है और हर मोड़ पर चक्रव्यूह है।
एहतियात कोई काफी नहीं, अब आवाम से आवाम का चेन बनाने से ही मां को चैन आयेगा कि चाक चाक हो रहा मां का जिगर इन दिनों!
हमें देशद्रोही जो समझने लगे हैं देशभक्त उन तमाम लोगों से सविनय निवेदन है कि वंदेमातरम वाली मां आजादी के अड़सठ साल बाद भी कैद हैं और जंजीरों के बोझ से तबाह तबाह है।
लालगोला मुर्शिदाबाद की उस काली के भी किसी दिन भरभराकर ढह जाने का खतरा है जैसे आपदाओं में ढह रहा है हिमालय का चप्पा चप्पा और बाकी देश में मूसलाधार है।
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
हालात उतने भी बुरे नहीं हैं। जो हम खामखां डरे हुए हैं।
बात कहनी हो तो जुबान फिसलनी नहीं चाहिए।
बात निकलती है तो दूर तलक जाती हैं बातें।
मुजरिमों के खिलाफ जुबान भी खोलने की जरुरत कोई दरअसल होती नहीं है कि गुनाहों के खिलाफ इशारा काफी होता है और आवाम की आंखें खुली खुली हो तो जुल्मोसितम कोई काफी नहीं है।
खामोशी का यह मंजर बहरहाल टूटना बेहद जरूरी है। गुफ्तगूं की तरह गपशप भी बहुत जरूरी है कि बंद दरवाजे और बंद खिड़कियों की तस्वीरें सिरे से बदलें।
दस्तक से कोई न खोले तो जान लो गड़बड़ है।
हो न हो किसी की खातिर किसी का खुदकशी का इरादा होगा।
जभी समझो, तभी तोड़ दें दरवाजा और जहां से हो मुमकिन किसी न किसी तरह दिलों में दाखिला चाहिए कि फांसी का हर फंदा तोड़ दिया जाये और जहर की प्याली हर किसी के लबों से छीन ली जाये।
कहना हालांकि बहुत आसान है।
करके करतब दिखा देना उतना आसान भी नहीं है।
नफरत की सुनामी के खिलाफ मोर्चा जाहिर है उतना आसान नहीं है।
बेशक वे पाकिस्तान भेजने की तैयारी कर रहे होंगे तो वीसा के बारे में हरगिज परेशां न हों, जो भेज रहे हैं, भी करते रहें बंदोबस्त कोई। कोई मुल्क नहीं तो इस जहां से बाहर कोई मुल्क खोजना उनका मजहब है, जिनका मुल्क मजहबी है।
नफरत के आलम में मुहब्बतनामा पर दस्तखत आसां बी नहीं है।
नफरत के वे कारोबारी भी जान पर खेल रहे हैं, समझ लो क्योंकि ये जो पब्लिक है, वह खूब समझती है मुनाफावसूली और खूब जानती है हर सुखीलाला को।
कहीं मुहब्बत का कोई फरिश्ता है, किसी महजबीं को मालूम नहीं होता। मुहब्बत हो भी जाये तो अक्सर पता ही नहीं होता। यकीन मानिये कि आवाम कि दिलों में दाखिला हो जाये तो नफरत के खिलाफ जंग उतनी मुश्किल भी नहीं है।
मां बेहद डरी हुई कि कदे कदे शर्म भी किया करो, दोस्तों!
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एहतियात कोई काफी नहीं, अब आवाम से आवाम का चेन बनाने से ही मां को चैन आयेगा कि चाक चाक हो रहा मां का जिगर इन दिनों!
मसलन मेरे ताजा पोस्ट पर आकाश भाई का यह प्रतिक्रिया देख लीजिये। गनीमत समझिये कि गाली गलौजियां अबभी सबकी जुबान नहीं है।

Akash Srivastava

4:16am Aug 1

भारत में आप जैसे स्वयंभू बुद्धिजीवी जब तक हैं तब तक किसी का भला नहीं हो सकता। कृपा करके ये बताएं कि जब आतंकवादी हमलों में बेगुनाह मारे जाते उस समय आपकी संवेदनाएं क्यों मर जाती, आपकी कलम को लकवा क्यों मार जाता और मुहं में दही क्यों जैम जाता है।

 

ये आप जैसे झोला छाप बुद्धिजीवियों के कुकर्मों का ही परिणाम है की इस देश के बहुसंख्यक सहिष्णुता छोड़कर उग्र होते जा रहे हैं।

Original Post

Palash Biswas

2:02am Aug 1

http://www.hastakshep.com/oldintervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2015/07/31/फांसी-का-फंदा-तैयार-हिंदू

हर किसी के लिए अब फांसी का फंदा तैयार, हिंदू राष्ट्र, भारत के ताने-बाने को तबाह कर रहा है

www.hastakshep.com/old

फांसी का फंदा तैयार,- तो आप ही इसका खुलासा कर दें कि जिस न्यायपलिका के कल तक अंग रहे जस्टिस सावंत, ज…

कुछ खुशफहमियां हैं तो कुछ गलतफहमियां हैं दिलों के दरम्यान और मुहब्बत और नफरत के दरम्यान दो इंच का फासला है सिर्फ। बीच में आग का दरिया है सिर्फ और डूबकर जाना है। जाने का इरादा हो मुहब्बत की मंजिल तलक तो बहुत मुश्किल भी नहीं है वह सफर।
जो गाली गलौज भी कर रहे हैं, हमारा दांव उन्हीं पर है। बस, फिलहाल हम उनके दिलों के दरवाजे पर खड़े हैं।
……….जारी…. आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…….

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
दरवाजा वे न खोले तो क्या, हम खिड़कियों और रोसनदान से दाखिल होंगे दिलों के अंदर और ख्वाबों में आना जाना मुश्किल कब हुआ है जमाने में तो जमाने से डरना क्या है।
बहरहाल मौसम बेहद खराब है।
कल दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी। कल भी मूसलाधार हो रही थी बारिश और कल भी डूब रहा था बंगाल, महाराष्ट्र और राजस्थान साथ-साथ।
पहाड़ों में अब भी मूसलाधार हो रहा है तो मध्यभारत भी डूबता रहा है।
यकीन मानिये, अपने यहां सविता बाबू भी किसी फरहा इब्राहीम से कम नहीं हैं और उनका भी एक अदना सा जिगर है।
यकीन मानिये, हम भले काफिर हों तो वह काफिर हरगिज नहीं है।
मां चूंकि बेहद डरी डरी होती है तो औलाद की फिक्र भी बेहद भारी होती है। इबादत और दुआ, पूजा और नमाज उनकी फितरत होती है।
हमसे उनने कहा कि बेलुड़ मठ में जाना है क्योंकि गुरुपूर्णिमा है।
मजा यह कि रामकृष्ण मिशन ने इस बड़े से मुल्क में बड़ी बड़ी हस्तियों को दीक्षा नहीं दी है लेकिन मामूली पत्रकार की पत्नी को वहां से दीक्षा मिल गयी है।
पहले ही हमारी शर्त रही है कि हम वो पति व

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription