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15 अगस्त 1947 : जब देशवासी आज़ादी का जश्न मन रहे थे, आरएसएस मातम में जुटा था !

15 अगस्त 1947 : जब देशवासी आज़ादी का जश्न मन रहे थे, आरएसएस मातम में जुटा था !

15 August 1947: When the countrymen were celebrating independence, RSS was busy in mourning!

शम्सुल इस्लाम

जब अगस्त 15, 1947 को सारा देश आज़ादी की खुशियां मना रहा था तब आरएसएस और उस के प्यादे थे जो मातम मना रहे थे। आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गेनाइजर’ ने अगस्त 14, 1947 के अंक में देश की आज़ादी, क़ुर्बानियों  और अखंडता के प्रतीक, तिरंगे झंडे को ज़लील करते हुए लिखा:

“वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता तक पहुंचे हैं वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें, लेकिन हिंदुओं द्वारा न इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा न अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झण्डा जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुक़सानदेय होगा।“

इसी शर्मनाक अंक में एक प्रजातान्त्रिक-धर्म निरपेक्ष भारत के जनम का विरोध करते हुए घोषणा की:

“राष्ट्रत्व की छद्म धारणाओं से गुमराह होने से हमें बचना चाहिए। बहुत सारे दिमाग़ी भ्रम और वर्तमान एवं भविष्य की परेशानियों को दूर किया जा सकता है अगर हम इस आसान तथ्य को स्वीकारें कि हिंदुस्थान में सिर्फ हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्र का ढांचा उसी सुरक्षित और उपयुक्त बुनियाद पर खड़ा किया जाना चाहिए…स्वयं राष्ट्र को हिंदुओं द्वारा हिंदू परम्पराओं, संस्कृति, विचारों और आकांक्षाओं के आधार पर ही गठित किया जाना चाहिए।“

इस का  साफ़ मतलब था कि मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी भारतीय राष्ट्र का हिस्सा नहीं हो सकते थे। 

इसी तरह की शर्मनाक हरकत आरएसएस ने उस समय भी की थी जब डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में देश का प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान बनकर तैयार हुआ था। भारत की संविधान सभा ने भारत के संविधान को नवम्बर 26, 1949 को अनुमोदित किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने ‘आर्गेनाइजर’ के जनवरी 30, 1949, के अंक में इसे रद्द करते हुवे ‘मनुस्मृति’ को भारत का संविधान घोषित नहीं किये जाने पर ज़ोरदार आपत्ति व्यक्त की। एक लम्बे सम्पादकीय में लिखा गया:

हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’में उल्लिखित है, विश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम-पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।

याद रहे कि अगर ‘मनुस्मृति’ देश का संविधान बनती है तो शूद्रों और महिलाओं की स्तिथि पशुओं से भी ख़राब हो जायेगी।  

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