1947 स्वतंत्रता की असलियत

opinion, debate

जानें, कैसे भारत छोड़ने को मजबूर हुए अंग्रेज

अंग्रेज़ों का भारत छोड़ने में सबसे बड़ा कारण क्या था?

अंग्रेजों ने भारत को आजाद क्यों किया?

प्रस्तावना —-

1947 की स्वतंत्रता के सन्दर्भ में देश की आम जनता मुख्यत: यही बात जानती है कि 15 अगस्त को देश ब्रिटिश आधिपत्य से पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया और यह स्वतंत्रता किसी रक्तपात के बिना ही मिल गयी। गांधी जी के नेतृत्व में सत्य-अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए शांतिपूर्ण आंदोलनों प्रदर्शनों आदि के जरिये मिली। इस पाठ-प्रचार को ज्यों-का-त्यों मान लेने का कारण भी प्रत्यक्ष था।

15 अगस्त 1947 को अंग्रेज शासकों के हाथ से सत्ता – सरकार एवं शासन – प्रशासन की बागडोर देश के प्रतिनिधियों शासकों  के हाथों में आ गयी। अंग्रेज शासक – प्रशासक देश छोड़कर चले गये। देश के शासन व समाज व्यवस्था के हर प्रमुख क्षेत्र में देशवासियों का नियंत्रण व संचालन स्थापित हो गया।

क्या अंग्रेज का भारत छोड़ने का निर्णय स्वैच्छिक था?

मुख्यत: गांधी जी एवं कांग्रेस की शांतिपूर्ण एवं अहिसात्मक पद्धतियों से मिली आजादी के पाठों – प्रचारों के विपरीत ब्रिटिश राजनेताओं तथा नीति निर्माताओं ने यह प्रचार किया कि अंग्रेज का भारत छोड़ने का निर्णय स्वैच्छिक था। ब्रिटेन की औपनिवेशिक सत्ता द्वारा समय – समय पर दिए गए संवैधानिक सुधारों अधिकारों के जरिये भारत को स्वराज्य के लिए तैयार किया गया था। इस सन्दर्भ में ब्रिटेन की उस समय की सत्ताधारी लेबर पार्टी के प्रधानमन्त्री का बयान काबिले गौर है।

उन्होंने ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई 1947 को हिन्दुस्तान को स्वतंत्रत करने वाला विधेयक प्रस्तुत करते हुए कहा कि ”इतिहास  में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब शासकों को तलवारों की शक्ति से अन्य लोगों के हाथों में शासन – सत्ता देने के लिए बाध्य होना पड़ा है। बिरले ही ऐसा हुआ है कि वे लोग, जो दूसरों पर राज्य करते रहे हों, अधीनस्थ लोगों को स्वेच्छा से शक्ति का हस्तान्तरण कर दें।”

इस संसदीय घोषणा से एक साल पहले मई 1946 में ही सत्ताधारी लेबर पार्टी के नेता लास्की ने यह भी घोषणा किया था कि आधुनिक इतिहास में अहिंसक रूप में सत्ता शक्ति का यह हस्तातरण ऐसा सबसे बड़ा हस्तातरण है, जिसे किसी साम्राज्यी शक्ति ने किन्हीं लोगों को किया है।

मैं यह आशा करता हूँ कि भारतीय राष्ट्रीय नेता सोने की थाली में प्रस्तुत इस भेंट का ( सत्ता – शक्ति  के हस्तांतरण की भेंट का ) सम्मान करेंगे।”

जुलाई 1947 में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक प्रस्तुत करते हुए ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने यह भी कहा कि सत्ता के हस्तांतरण की यह घटना एक लम्बी श्रृंखला का चरम बिंदु है। मारले – मिन्टो तथा मान्टेग्यु – चेम्सफोर्ड सुधार, साइमन कमीशन की रिपोर्ट  गोलमेज कांफ्रेंस, कैबिनेट मिशन आदि द्वारा किये गये प्रयास इस चरम बिंदु तक पहुंचने के रास्ते में मील के पत्थर हैं। अब इस रास्ते का अनंत भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने की मंजिल के रूप में हो रहा है”।

ब्रिटिश प्रधानमन्त्री के उपरोक्त बयानों के साथ ब्रिटिश संसद 4 जुलाई को पेश किया गया प्रस्ताव 18 जुलाई को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कर दिया गया। 18 जुलाई को ब्रिटिश साम्राज्ञी द्वारा स्वीकृत किये जाने के बाद यह इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के रूप में प्रभावी हो गया। इस कानून ने इससे पहले ब्रिटिश संसद द्वारा पास किये एवं लागू किये गये गवर्मेन्ट आफ इंडिया एक्ट 1935 की जगह ले लिया।

(Indian Independence Act 1947) भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ की मुख्य धाराएं यूं थीं

1 — 15 अगस्त 1947 से यह देश दो स्वतंत्र अधिराज्यों ( डोमिनियनें ) में भारत – पाकिस्तान के रूप में बंट जाएगा।

2 — पाकिस्तान में सिंध, ब्रिटिश-बलूचिस्तान, उत्तरी पश्चिमी सीमान्त प्रदेश, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल शामिल रहेंगे। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण का काम, सीमा निर्धारण कमीशन करेगा।

3— ब्रिटेन द्वारा दोनों देशों के लिए अलग-अलग गवर्नर जनरल की नियुक्ति की जायेगी जो ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधि के रूप में दोनों देशों की सरकारों के लिए काम करेंगे।

4— दोनों देशों की विधायिका अपने देशों के लिए कानून बनाने के लिए पूरी तरह से अधिकृत रहेगी। 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटिश संसद द्वारा पास किया गया कानून या राजाज्ञा दोनों अधिराज्यों पर लागू नहीं होगा।

5 — 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटेन की सरकार भारत में रहे ब्रिटिश राज के प्रति उत्तरदायी नहीं रह जायेगी और ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने राज्य के दौरान रियासतों तथा किन्हीं आदिवासी क्षेत्रों के साथ की गयी संधि या समझौता को 15 अगस्त 1947 से रद्द माना  जाएगा।

6 —   दोनों देशों की संविधान सभाओं को ही केन्द्रीय विधायिका का दर्जा प्राप्त होगा। ब्रिटिश राज द्वारा पहले से स्थापित केन्द्रीय विधान असेम्बली और काउंसिलिंग आफ स्टेट अपने आप समाप्त हो जायेंगे।

7 — नियुक्त गवर्नर जनरल को इन्डियन इंडिपेडेंस एक्ट को सफलता पूर्वक लागू करने के लिए अधिकृत किया गया है।

8 — भारत में अभी भी मौजूद ब्रिटिश अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए बनाये गये प्राविधान अभी भी लागू रहेंगे। लेकिन अब ब्रिटेन भारत में कोई अधिकारी नियुक्त नहीं कर सकेगा।

9 – बंटवारे से पूर्व की भारतीय सेनाओं को दोनों राज्यों में विभक्त कर दिया जाएगा। लेकिन इन देशों में मौजूद ब्रिटिश (गोरे ) सैनिक गवर्नर जनरल की अधीनता में ही कार्य करेंगे।

10 — समूचा प्रशासन जो अभी तक ब्रिटिश राज के अंतर्गत काम करता था 15 अगस्त 1947 से भारत सरकार के अंतर्गत कार्य करेगा।

इन्डियन इंडिपेंडेंस एक्ट की इन धाराओं पर आगे चर्चा करेंगे।

देश की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा पास किये गये उपरोक्त कानून में और वहां  के प्रधानमन्त्री की घोषणा में इस स्वतंत्रता को अंग्रेज हुक्मरानों द्वारा लिया गया स्वैच्छिक निर्णय बताया व प्रचारित किया गया। जबकि कांग्रेस पार्टी इसे मुख्यत: गांधी जी द्वारा शान्ति अहिंसा के जरिये चलाए गये स्वतंत्रता आन्दोलन से ब्रिटिश हुकूमत को स्वतंत्रता देने के लिए बाध्य कर देने के महान प्रयासों से मिली स्वतंत्रता बताती रही है।

जहां तक ब्रिटिश सरकार द्वारा इस देश को स्वेच्छा से आजाद किये जाने के वक्तव्यों प्रयासों का मामला है तो इस पर सीधा प्रश्न यह बनता है कि अपने दो ढाई सौ सालों के शासन काल में अंग्रेज शासकों के अन्दर यह सदिच्छा पहले क्यों नहीं आई ? जबकि हिन्दुस्तान के लोग इसकी मांग खासकर 1905 के बाद से लगातार करते रहे ? क्या पहले के अंग्रेज शासक सत्ता लोभी थे ? और 1947 में सत्ता सौंपने वाले अंग्रेज शासक सत्ता त्यागी थे ? क्या उन्होंने यह त्याग इसलिए कर दिया कि 1947 में इंग्लैण्ड की पहले की सत्ताधारी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी की जगह अब वह पर शासन सत्ता की बागडोर लेबर पार्टी के हाथ में थी ? अथवा सच्चाई यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध 1939 – 44 के बाद की परिस्थितियों ने उन्हें सत्ता सौपने के लिए मजबूर कर दिया था ? अन्यथा खतरा केवल ब्रिटिश सत्ता के लिए ही नहीं बल्कि समूचे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए खड़ा था।

खतरा ब्रिटिश कम्पनियों एवं ब्रिटिश साम्राज्यी पूँजी के जरिये इस देश में बने लूटपाट के सम्बन्धों के लिए भी खड़ा था। इस खतरे पर 1947 के स्वतंत्रता के समझौते के सन्दर्भ में चर्चा जरूर होनी चाहिए। आगे हम इसपे चर्चा जरूर करेंगे।

इसी तरह जहां तक शांतिपूर्ण तरीके से स्वतंत्रता प्राप्ति (achieve independence peacefully) का प्रश्न है तो यह बात सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता केवल भारत को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान को भी मिली है। पाकिस्तान बनाने के पक्षधर लोग इसे कांग्रेस और गांधी जी के प्रयासों का परिणाम नहीं मानते। इसके अलावा देश के गैर कांग्रेसी राजनीतिक एवं बौद्धिक हिस्से भी इस स्वतंत्रता को केवल या मुख्यत: कांग्रेस के आंदोलनों का परिणाम नहीं मानते। उसे कांग्रेस के आन्दोलनों के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए चलते रहे क्रांतिकारी संघर्षों का भी परिणाम मानते हैं।

आजादी के बाद देश की सत्ता की बागडोर कांग्रेस के ही हाथ में क्यों आई ?

यह बातें गलत भी नहीं है। एकदम सच है। इसके वावजूद यह तथ्यगत सच्चाई तो सामने है कि स्वतंत्रता के इस शान्तिपूर्ण समझौते के जरिये इस देश की सत्ता की बागडोर कांग्रेस के ही हाथ में आई। देश की किसी अन्य पार्टी या संगठन को उसके योग्य नहीं माना गया। लेकिन क्यों ? क्या इसलिए कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी ? देश की बहुसख्यक जनता उसके समर्थन में थी ? 1937 में हुए प्रांतीय विधान सभा चुनावों में उसे सबसे ज्यादा वोट व समर्थन मिला था ? या इसका प्रमुख कारण कांग्रेस द्वारा देश की आजादी के सवाल को मुख्यत: सत्ता प्राप्ति तक ही सीमित रखना था ? उसके लिए ब्रिटिश हुकूमत से बारम्बार होते समझौते के जरिये सत्ता-सिंहासन पर अपनी पहुंच बनाना व बढ़ाना था ? सत्ता प्राप्ति को ही देश की पूर्ण आजादी प्राप्त करना बताकर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ पहले से बने आर्थिक सम्बन्धों को – महाजनी व औद्योगिक व्यापारिक लूट के सम्बन्धों को जारी रखना था। विदेशी शोषण लूट के आर्थिक सम्बन्धों से इस राष्ट्र की मुक्ति के सवाल को उपेक्षित करना और उस पर पर्दा डालना था ?

इस सन्दर्भ में इस बात को रखा जाना एकदम आवश्यक है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना राज इस देश के व्यापारिक लूट के लिए स्थापित किया था। मुख्यत: उसी के लिए कम्पनी राज, शासन प्रशासन को निर्मित व विकसित किया था। इसलिए देश की स्वतंत्रता को मुख्यत: या महज सता हस्तान्तरण या सता प्राप्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन विडम्बना यह है कि देश की पूर्ण स्वतंत्रता अर्थात राजनीतिक आर्थिक सांस्कृतिक एवं सैन्य स्वतंत्रता से जुड़े बुनियादी सवालों को 1947 के दौर में और उसके बाद भी चर्चा का विषय नहीं बनने दिया गया।

1947 से पहले भी यह सवाल प्रमुखता से नहीं उठ पाया कि ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक राजनीतिक, शैक्षणिक सांस्कृतिक एवं सैन्य गुलामी में जी रहे इस राष्ट्र की स्वतंत्रता का क्या मतलब है और क्या होना  चाहिए ?

क्या इस देश को गुलाम बनाने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा स्थापित ब्रिटिश राज तथा उसके शासन – प्रशासन से अंग्रेजों के हटने और वहां  हिन्दुस्तानियों के बैठ जाने से या देश में राज्य द्वारा समय – समय पर लागू किये जाने वाले संवैधानिक सुधारों से देश को औपनिवेशिक गुलामी के लिए बने और बनाये गये आर्थिक, कूटनीतिक शैक्षणिक सांस्कृतिक एवं सैन्य सम्बन्धों से मुक्ति मिल पाएगी ?

क्रमश : भाग एक

सुनील दत्ता

लेखक स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक हैं।