Home » 2014 के चुनाव को दिलचस्प बना देगी प्रियंका की एंट्री

2014 के चुनाव को दिलचस्प बना देगी प्रियंका की एंट्री

प्रियंका गांधी की बड़ी ज़िम्मेदारी राजनीतिक माहौल को एक नए पिच पर ले जायेगी
शेष नारायण सिंह
प्रियंका गांधी को कांग्रेस में बड़े रोल देने की कांग्रेस की योजना पर चौतरफा चर्चा शुरू हो गयी है। खबर है कि प्रियंका गांधी ने कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के निजी सहायकों को बुलाकर उन्होंने सलाह मशविरा किया। खबर है कि सोनिया गांधी के जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल को राहुल गांधी के आवास पर तलब किया गया। राहुल गांधी की टीम के मधुसूदन मिस्त्री, जयराम रमेश और अजय माकन भी बुलाये गए थे। पिछले विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उसके बाद कांग्रेसी हलकों में हडकंप है। विधानसभा चुनावों में हुई भारी हार के बाद कांग्रेस को लोक सभा में अपना सूपड़ा साफ़ होते साफ़ नज़र आ रहा है। अगर आज चुनाव हो जाएँ तो कांग्रेस को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा जैसे राज्यों में बहुत कम सीटें मिलने वाली हैं। असम, कर्णाटक और एकाध और छोटे राज्यों के सहारे दिल्ली में केंद्रीय सरकार बना पाना असंभव है। यह बात विधानसभा चुनावों के बाद बिलकुल साफ़ हो गयी है।
2013 के विधान सभा चुनावों ने यह भी साफ़ कर दिया कि देश की राजनीति में जीतने के लिए अब चक्रवर्ती सम्राट की तरह आचरण करने का विकल्प नहीं रह गया है। राहुल गांधी की उस राजनीति को भी नकारा जा चुका है जिसमें वे किसी से मिलते ही नहीं। अगर मिलते है तो टी वी कैमरों के ज़रिये पूरी दुनिया को दिखाते हैं। अब जनता रियल लोगों से सीधी बातचीत करना चाहती है। इन चुनावों ने यह भी साफ़ कर दिया कि अगर तीसरा विकल्प मिल जाए तो जनता दोनों ही बड़ी पार्टियों को किनारे कर सकती है। पिछले चुनावों में सबकी समझ में आ गया कि किस तरह से कांग्रेस का चुनाव अभियान कुप्रबंधन का शिकार था। राजस्थान में जिस दिन सी पी जोशी एक वोट से हारने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से बाहर हुए थे, उसी दिन से उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलौत को औकात बताने के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू का दिया था। तुर्रा यह कि दिल्ली में उनके आका, राहुल गांधी को कभी पता नहीं लगा कि जोशी जी राजस्थान में कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं। उनके बारे में राहुल गांधी को आखिर तक यह भरोसा रहा कि जोशी जी सब कुछ संभाल लेंगे। इसीलिये विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनको राजस्थान का कर्ता धर्ता बनाकर फिर भेज दिया। जोशी जी ने भी अशोक गहलौत को कभी माफ़ नहीं किया। पूरे चुनाव अभियान के दौरान उनकी हार की माला जपते रहे और परमात्मा की असीम अनुकम्पा से सी पी जोशी कामयाब हुए। यह अलग बात है कि अशोक गहलौत के साथ ही कांग्रेस हार गयी। अशोक गहलौत को हराने के काम में स्व. सीसराम ओला, गिरिजा व्यास और सचिन पायलट भी लगे हुए थे। सबको सफलता मिली और कांग्रेस वहां तबाह हो गयी।
दिल्ली में शीला दीक्षित ने अच्छा काम किया था लेकिन यहाँ भी अजय माकन और जयप्रकाश अग्रवाल लगातार उनके खिलाफ काम करते रहे। अजय माकन तो राहुल गांधी की कृपा से अपना काम चलाते रहे और आखिर में सफल हुए और दिल्ली में कांग्रेस उसी पोजीशन पर पहुंच गयी जिस पर 1957 के चुनावों में जनसंघ हुआ करती थी।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत थी लेकिन वहां भी अजीत जोगी को पूरा मौक़ा दिया गया कि वे अपने मित्र और मददगार रमन सिंह की ताजपोशी फिर से करवा सकें। बताते हैं कि रमन सिंह की मदद करने के चक्कर में जोगी जी ने कांग्रेस को राज्य में धूल चटाने में भारी योगदान किया। उनके सतनामी सम्प्रदाय के लोगों ने तय कर लिया था कि किसी भी सूरत में रमन सिंह को वोट नहीं देना है। ज़ाहिर है यह सारे वोट कांग्रेस को मिलते। रायपुर में चर्चा है कि अजीत जोगी के दिमाग का ही कमाल था कि सतनामी सेना बन गयी और उसके आध्यात्मिक गुरु ने हेलीकाप्टर पर सवार होकर सतनामी सम्प्रदाय के सारे वोट ले लिए। इस तरह से जो वोट कांग्रेस को मिलने थे वे कांग्रेस के खिलाफ पड़ गए और हर उस सीट पार जहां सतनामियों की मदद से कान्ग्रेस को जीतना था, वहां बीजेपी जीत गयी।
मध्य प्रदेश में भी 2008 में जब तत्कालीन कांग्रेस के आला नेता सुरेश पचौरी ने टिकटों की कथित हेराफेरी करके शिवराज सिंह की जीत के लिए माहौल बनाया था तो उनको दरकिनार कर दिया गया था और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को आगे किया गया था। हर जिले में उन्होंने कुछ लोगों को तैयार किया था लेकिन चुनाव के ठीक पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे कर दिया गया। नतीजा सामने है। ज्योतिरादित्य को शिवराज सिंह के आगे खड़ा कर दिया गया। वह शिवराज सिंह, जो दिन रात मध्यप्रदेश की राजनीति में डूबे रहते हैं, उनके सामने ऐसे सिंधिया जी खड़े थे जिनकी जेब में दिल्ली वापस लौटने का बोर्डिंग कार्ड नज़र आता रहता था। आम धारणा यह बन गयी कि सिंधिया जी वहां बस तफरीह के लिए आये हैं, असल ठिकाना तो उनका दिल्ली ही है। मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस की दुर्दशा हो गयी।
यह तो विधान सभा चुनाव वाले राज्यों का हाल है। अन्य महत्वपूर्ण राज्यों में भी कांग्रेस ने जिस तरह से राजनीतिक प्रबंधन किया है वह तर्क पद्धति से समझ में नहीं आता। उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया जा सकता है। सबसे ज़्यादा सांसद लोकसभा में भेजने वाले राज्य में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन का ज़िम्मा मधुसूदन मिस्त्री नाम के एक व्यक्ति को दे दिया गया है। राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री बना दिए गए थे जिनका अपने जिले में कोई प्रभाव नहीं है राज्य की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है। 1980 से विधान सभा का हर चुनाव जीत रहे राज्य कांग्रेस के बड़े नेता और एक वर्ग के पत्रकारों के चहेते प्रमोद तिवारी को कोई भूमिका नहीं दी गयी तो उन्होंने मुलायम सिंह यादव की टीम की तरफ क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया। आज वे मुलायम सिंह यादव की कृपा से राज्य सभा के सदस्य हैं। नतीजा यह  है कि आज उत्तर प्रदेश में जो कांग्रेसी बच गए हैं वे भारी कन्फ्यूज़न के शिकार हैं। सबसे बड़ा कन्फ्यूज़न तो राज्य में कांग्रेस के इंचार्ज महासचिव मधुसूदन मिस्त्री को लेकर ही है। उनके बारे में तरह-तरह की बातें सुनने में आती हैं। बताया जाता है कि वे एनजीओ सर्किट से आते हैं,  राहुल जी की टीम में जो हारवर्ड विश्वाविद्यालय से आये हुए लोग हैं, उनके ख़ास बन्दे हैं। दूसरी चर्चा यह है कि वे नरेंद्र मोदी के पुराने साथी हैं, उनके साथ गुजरात में काम कर चुके हैं और नरेंद्र मोदी के ख़ास कृपापात्र हैं। एक अफवाह यह भी है की मिस्त्री जी ने ही नरेंद्र मोदी की शुरुआती राजनीति को सम्भाला था और आज मोदी कहाँ से कहाँ पहुंच गए। उनसे राहुल जी को उम्मीद है की वे उत्तर प्रदेश में भी वही कर दिखायेंगे जो उन्होंने मोदी जी के लिये गुजरात में किया था। इस बात की पूरी संभावना है कि इन बातों में कोई भी बात सच न हो लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी सर्किल में इस तरह की बातें चल रही हैं तो यह कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
कांग्रेस की इस दुर्दशा के बीच में अब प्रियंका गांधी को प्रचार की ज़िम्मेदारी देने की योजना बनायी जा रही है। इस बात में दो राय नहीं है कि प्रियंका गांधी जवाहरलाल नेहरू की मौजूदा पीढ़ी की सबसे करिश्माई नेता हैं। उनके भाई राहुल गांधी की राजनीतिक प्रबंधन की योग्यता का नतीजा दुनिया के सामने है, उनके चचेरे भाई वरुण गांधी की ख्याति भी एक ऐसे व्यक्ति की बन गयी है जो कई बार ऐसे बयान दे देते हैं जिसके कारण उनको जेल की हवा खानी पड़ती है। कुछ लोगों के हाथ काटने की धमकी और साम्प्रदायिक विद्वेष फ़ैलाने के मुक़दमों का तजुर्बा उनको है। इंदिरा गांधी की तीसरी पीढ़ी के तीनों ही लोगों में प्रियंका गांधी का व्यक्तित्व सबसे ज़्यादा स्वीकार्य माना जाता है लेकिन जब वे खुले आम चुनाव मैदान में आयेंगीं, बीजेपी और आम आदमी पार्टी की जीत के आड़े आ रही होंगीं तो उनको खासी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। सामान्य राजनातिक समझ का तकाज़ा है कि आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास और ही बीजेपी की मीनाक्षी लेखी उनके परिवार की सारी कारस्तानियों का वर्णन करेंगे। उनके पति राबर्ट वाड्रा की राजस्थान में खरीदी गयी  ज़मीनों का विषद विवेचन होगा और बीजेपी की मौजूदा सरकार उस प्रकरण में हो रही जांच को या तो सार्वजनिक रूप से और या अखबारों में लीक करके राजनीति के अखाड़े में डालेगी। ज़ाहिर है कि  यह प्रियंका गांधी के लिए बहुत ही उपयोगी नहीं होगा। इसलिए कामनसेंस का तकाजा  है कि प्रियंका गांधी की पूरे देश में सक्रियता से कांग्रेस को कोई बहुत फायदा नहीं होने वाला है। हाँ यह पक्के तौर  पर कहा जा सकता है कि अब से मई तक राजनीतिक परिदृश्य बहुत ही दिलचस्प बना रहेगा क्योंकि आम आदमी वाले दिल्ली सरकार के ज़रिये कांग्रेस और बीजेपी के भ्रष्टाचार की कहानियाँ पब्लिक डोमेन में डालते रहेगें, स्नूपगेट की केंद्र सरकार की जांच की प्रगति से वे बातें पब्लिक डोमेन में लीक होती रहेंगीं जिनसे कांग्रेस की सरकार यह साबित कर सके कि नरेंद्र मोदी के ख़ास सिपहसलार, अमित शाह के साहेब किस तरह के इंसान हैं और किसी लड़की का पीछा किस हद तक करवा सकते हैं।
कुल मिलाकर प्रियंका गांधी के बड़े पैमाने पर राजनीति में सक्रिय होने से राजनीतिक माहौल बिलकुल एक नयी पिच पर पंहुच जाएगा और उम्मीद की जानी चाहिये कि 2014 का चुनाव बहुत ही दिलचस्प होगा।

About the author

शेष नारायण सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: