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Modi in UNGA

प्रधान मंत्री नहीं, बल्कि हिंदू हृदय सम्राट, विकास पुरुष, नवयुग शलाका नरेंद्र मोदी के नाम एक संक्षिप्त खुला पत्र

प्रधान मंत्री नहीं, बल्कि हिंदू हृदय सम्राट, विकास पुरुष, नवयुग शलाका नरेंद्र मोदी के नाम एक संक्षिप्त खुला पत्र।

परम माननीय व आदरणीय मोदीजी,

जिस पद पर आप आसीन हैं, उसका ख़्याल रखते हुए यह संबोधन मुझे आवश्यक लगता है। सबसे पहले मैं अपना परिचय देना चाहूँगा : मैं एक मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी हूँ, संभवतः सवर्ण हिंदू हूँ, अगर नहीं भी हूँ तो उस मानसिकता को आत्मसात् कर चुका हूँ। इस नाते आपसे मेरी एक स्वाभाविक आत्मीयता बनती है, हालाँकि अतीत की कुछ घटनाओं की वजह से इस आत्मीयता को व्यक्त करने में मुझे थोड़ा संकोच होता है। मैंने उन घटनाओं का ज़िक्र करना छोड़ दिया है। लेकिन मेरा इशारा आप समझ रहे होंगे।

और मैं अवसरवादी हूँ। जिस सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक ज़मीन पर मैं पला, जिस पर मैं जी रहा हूँ, अगर अवसर से उसे न सींचा जाय तो मेरी प्रतिभा का पौधा मुरछा जाएगा।

ऐसा नहीं होना चाहिये, क्योंकि मेरे जैसे लोग देश के भविष्य हैं। उन घटनाओं के बाद आपने हमेशा हमारा ख़्याल रखा है, रखते रहेंगे। इसके लिये मैं आपका आभारी हूँ। मैंने उन घटनाओं का ज़िक्र करना छोड़ दिया है। लेकिन मेरा इशारा आप समझ रहे होंगे।

आप समझ रहे होंगे कि अवसर का फ़ायदा उठाना कितना आवश्यक, कितना उपयोगी होता है। आप स्वयं ऐसा करते रहे हैं। मुझे वह हमेशा भाता रहा है या नहीं, यह प्रश्न अनावश्यक है। लेकिन आपकी इस मध्यवर्गीय प्रतिभा का मैं कायल हो चुका हूँ। इसलिये मैं आपको एक समयोपयोगी परामर्श देना चाहता हूँ : मुझे मालूम है कि जिनके कंधे पर सवार होकर आप वहाँ पहुँचे हैं जहाँ आप आज हैं, उनके बीच आपको कुछ बाँटना भी पड़ेगा। लेकिन मेरा आपसे सविनय अनुरोध है कि आप मेरे जैसे लोगों के लिये भी कुछ करें, अपनी वदान्यता से हमें वंचित न करें।

मैं, और मेरे जैसे लोग बिकने के लिये तैयार बैठे हैं। इतने बड़े बाज़ार में सिर्फ़ एक ख़रीदार हैं – वह आप हैं।

आप जिनके कंधों पर सवार होकर आये हैं, कभी-कभी उनकी उपयोगिता रहेगी। लेकिन वे नहीं, बल्कि मैं और मेरे जैसे लोग आपकी महानता में मोरपंख लगाने में समर्थ हैं। उन घटनाओं के कारण आपके सुंदर वस्त्रों के साथ-साथ मोरपंख भी आवश्यक हैं। मैंने उन घटनाओं का ज़िक्र करना छोड़ दिया है। लेकिन मेरा इशारा आप समझ रहे होंगे।

अगर आप अवसर प्रदान करते हुए नहीं सींचते हैं, मेरी प्रतिभा मुरझा जाएगी। यह आपके लिये अप्रिय हो सकता है, क्योंकि मुरझाये पौधों से कंटीली झाड़ियाँ उग सकती हैं, जो आपके रास्ते में होंगी। यह न आपके, न मेरे हित में होगा। मेरा इशारा आप समझ रहे होंगे।

भवदीय

आपका विनम्र (भूतपूर्व)उदारवादी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी सेवक

About the author

उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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