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मोदी ने जिसे संघियों की लाठी बना दिया था सुप्रीम कोर्ट ने उसे वापस सामाजिक सुरक्षा कार्ड का रूप दे दिया है

मोदी ने जिसे संघियों की लाठी बना दिया था सुप्रीम कोर्ट ने उसे वापस सामाजिक सुरक्षा कार्ड का रूप दे दिया है

-अरुण माहेश्वरी

यूपीए के काल में आधार कार्ड की पूरी परिकल्पना आज के स्मार्ट कार्ड के तकनीकी युग में नागरिकों को तमाम प्रकार की सरकारी सुविधाओं को आसानी से एक ही प्लास्टिक कार्ड के जरिये हासिल करने की सुविधा प्रदान करने के लिये की गई थी। इसे न नागरिकता की पहचान के तौर पर और न  नागरिक पर नजर रखने के किसी औजार के रूप में देखा गया था। यह एक प्रकार से शुद्ध सामाजिक सुरक्षा संख्या प्रदान करने वाला एक स्मार्ट कार्ड था।

लेकिन 2014 में मोदी ने सत्ता में आने के बाद ही इस आधार कार्ड को संघियों के हाथ के दंडे की तरह देखना शुरू कर दिया जिस दंडे का वे शत्रु के खिलाफ तोप की तरह इस्तेमाल करने तक का सपना देखा करते हैं। वे इससे भारत के तमाम नागरिकों को मवेशियों की तरह हांकने में जुट गये। आधार के आईने में मोदी अपनी सूरत को एक सर्वशक्तिमान बेताज का बादशाह की तरह देखने लगे थे। अर्थात आधार के प्रति उनका रुख जनतांत्रिक व्यवस्था के जरिये एक भारत का एक स्वेच्छाचारी तानाशाह बनने की उनकी वासना की सबसे नग्न अभिव्यक्ति था।

मोदी ने ऐसे सारे कदम उठाये जिनसे आधार को नागरिकता की पहचान के कार्ड का रूप दे दिया जाए। मोदी ने ही इसे बैंक खातों के साथ, मोबाइल फोन के साथ, शादी के पंजीकरण, अस्पताल में इलाज और यहां तक कि निजी कंपनियों से भी हर प्रकार के लेन-देन आदि के साथ जोड़ देने का जिद्दी अभियान शुरू किया। आधार को एक प्रकार से नागरिक के जीने के अधिकार का प्रमाणपत्र बना दिया जा रहा था।

कहना न होगा, मोदी का यह अभियान आधार कार्ड को नागरिक के खिलाफ राज्य की दमनकारी शक्ति को चरम राक्षसी रूप देने का अभियान था। उनका लक्ष्य आधार को कुछ ऐसा रूप दे देने का था कि जिससे किसी भी व्यक्ति के एक आधार कार्ड को खारिज करके उसके अस्तित्व को ही खारिज किया जा सके। मोदी आधार कार्ड के जरिये हर नागरिक को कठपुतले की तरह नचाने का एक जादूई बटन अपने पास पाना चाहते थे। आधुनिक तकनीक के प्रयोग से भारत में दुनिया की एक सबसे निकृष्टतम पैशाचिक तानाशाही का शासन तैयार करने का सपना देख रहे थे।

भारत के सारे बैंक, तमाम सरकारी और गैर-सरकारी कंपनियां पिछले दिनों अपने सभी ग्राहकों के आधार कार्ड का पंजीकरण कराने के लिये सभी लोगों पर शिकारी कुत्तों की तरह जिस प्रकार टूट पड़े थे , वह सचमुच खुद में किसी दु:स्वप्न से कम नहीं था। हर आदमी इस सॉंसत में जी रहा था कि कब उसे इसी आधार की बला के चलते मजूरी नहीं मिलेगी या राशन नहीं मिलेगा, या उसका बैंक खाता बंद हो जायेगा या उसकी गैस की आपूर्ति रुक जायेगी। शादी के पंजीकरण से लेकर अस्पताल में भर्ती तक के लिये आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया था। यह भारत के प्रत्येक नागरिक के जीवन की तमाम गतिविधियों का पूरा ब्यौरा उसके एक आधार कार्ड के जरिये तैयार करने का एक उपक्रम था।

मोदी ने जैसे नोटबंदी के जरिये और फिर जीएसटी के जरिये भारत के आम लोगों को बुरी तरह से सताया, बिल्कुल उसी तर्ज पर आधार को भी उन्होंने नागरिकों को दंडित करने के एक हथियार में बदल दिया। इसका जो एक और सबसे बुरा परिणाम निकला वह यह कि देश के सारे बैंकों के पास अपने ग्राहकों के आधार संबंधी डाटा, केवाईसी को जुटाने का फिजूल का अतिरिक्त काम आ गया। इसने प्रकारांतर से पहले से खस्ताहाल बैंकों की आर्थिक दुर्दशा को और ज्यादा बढ़ाने का काम किया जो आज भारतीय अर्थ-व्यवस्था के लिये बहुत घातक साबित हो रहा है।

सारी दुनिया में राज्य अपने स्तर पर परोक्ष रूप से नागरिकों की गतिविधियों पर नाना प्रकार से निगरानी रखने का काम करते रहते है। लेकिन कहीं भी इस प्रकार से नागरिक की सिनाख्त कराने वाले कार्ड का प्राविधान नहीं है जिसमें उसके फिंगर प्रिंट, रेटिना संबंधी बायोमेट्रिक डाटा भी शामिल हो और जो इतना सर्व-व्यापी हो कि उसके माध्यम से नागरिक के जीवन के प्रत्येक पक्ष और उसकी प्रत्येक गतिविधि की विस्तृत जानकारी स्वत: एक स्थान पर दर्ज होती चली जाए। बल्कि, आज तकजहां भी ऐसे किसी कार्ड को बनाने का कोई प्रस्ताव आया भी तो उसे पूरी ताकत से ठुकरा दिया गया है।

अमेरिका में, जहां सन् 1930 के जमाने से सोशल सिक्योरिटी नंबर का प्राविधान किया गया था, उसे आज तक नागरिक की पहचान कराने वाले कार्ड का रूप नहीं दिया गया है। यहां तक कि 2007 में अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी प्रशासन के पास यह प्रस्ताव गया था उनके कार्ड को अधिक सुरक्षित बनाने के लिये ही उसमें कार्ड धारक की तस्वीर और बायोमेट्रिक डाटा को शामिल किया जाए। लेकिन राज्य के द्वारा इस प्रकार के डाटा के दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए ही उस कागज के कार्ड पर उसके धारक की तस्वीर तक को शामिल करने से इंकार कर दिया गया। इसी प्रकार ब्रिटेन में भी इस प्रकार के पहचान पत्र को तैयार करने के विचार को ठुकरा दिया गया है।

ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट के कल 26 सितंबर के ऐतिहासिक फैसले ने हमारे यहां भी आधार कार्ड मोदी जैसे संघी नेता के हाथ की लाठी के बजाय उसे फिर से शुद्ध रूप में एक सोशल सिक्योरिटी कार्ड का रूप दे दिया है, जैसा कि इस योजना के प्रारंभ में मनमोहन सिंह की सरकार ने चाहा था। इसे नागरिक की पहचान के सवाल से साफ तौर पर अलग कर दिया गया है। पिछले चार साल से मोदी सरकार देश के सारे बैंकों और सरकारी विभागों से आधार के जरिये केवाईसी आदि का जो काम करा रही थी, सुप्रीम कोर्ट ने उन सब कामों पर रोक लगा दी है। सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सरकारी स्कीमों के लाभ उठाने के लिये इस्तेमाल करने के अलावा नागरिकों के लिये इसकी अब कोई और उपयोगिता नहीं रह गई है। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने मोदी के तानाशाही मंसूबों पर एक कड़ा प्रहार किया है।

मजे की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर भी मोदी के लोग नाच रहे हैं। मोदी के प्रवक्तागण इस पर जिस प्रकार अपनी खुशी जाहिर कर रहे हैं, उससे यही लगता है कि ये सब एक खास प्रकार के जंतु है जिन्हें हर बात पर सिर्फ और सिर्फ नाचना आता है। इनमें यह सोचने और समझने की भी सलाहियत नहीं है कि कोई चीज कितनी उनकी नीतियों के पक्ष में है और कितनी विरुद्ध। मोदी को सुप्रीम कोर्ट की इस करारी चपत पर भी उनका खिलखिलाते हुए नाचना उनके पागलपन की निशानी के अलावा कुछ नहीं है। पूरी तरह से बिगड़ चुकी और उनके नियंत्रण के बाहर जा चुकी परिस्थितियों  में अब उनके पास तालियां बजाते हुए नाच नाच कर बचे हुए दिनों को गुजारने के अतिरिक्त दूसरा कोई चारा नहीं रहा है।

अभी भी हैं कुछ असंगतियां आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले में अभी भी कुछ असंगतियां हैं। मसलन् इस कार्ड को पैन कार्ड के साथ जोड़ने की जो बात इसमें कही गई है, वह सिद्धांतत: बेकार है। ऐसी चंद खामियों और आधार विधेयक की संवैधानिक स्थिति के बारे में आगे निश्चित तौर पर किसी न किसी समीक्षा याचना के जरिये विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुमत का फैसला है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस फैसले से मतभेद रखते हुए आधार विधेयक की संवैधानिकता को ही अस्वीकार किया है। इस विधेयक को एक धन बिल के रूप में पारित कराने के मोदी सरकार के कदम को जस्टिस चंद्रचूड़ ने संविधान के साथ एक खुली धोखाधड़ी बताया है। इसीलिये सुप्रीम कोर्ट के आज के निर्णय को ऐतिहासिक मानते हुए भी हम इसे कोई अंतिम फैसला नहीं कह सकते हैं। अभी इसके बचे हुए बेहूदा पक्षों का भी अंत होगा। इसके बारे में आगे भी चर्चा और विवाद बने रहेंगे और इसकी आगे फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट में ही समी़क्षा होगी। इसके बावजूद, अभी के फैसले ने ही आधार से काफी हद तक नागरिक के जीवन पर प्रहार करने की शक्ति को छीन लिया है। यह हमारे जनतंत्र के लिये बहुत स्वागतयोग्य है।

समाज के जो तत्व हमेशा तानाशाही शासन की कामना करते रहते हैं, उनके लिये निश्चय ही यह एक निराशाजनक फैसला है।

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