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11 दिसंबर के बाद अर्थव्यवस्था का चेहरा भी बदलेगा – पुण्य प्रसून वाजपेयी

11 दिसंबर के बाद अर्थव्यवस्था का चेहरा भी बदलेगा – पुण्य प्रसून वाजपेयी

After 11 December, the face of the economy will change – Punya Prasoon Bajpai

नई दिल्ली, 10 दिसंबर। चर्चित एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद देश की राजनीति ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था भी बदलेगी और यह पहली बार है कि किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आए।

आइए पढ़ते हैं पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ब्लॉग पर क्या लिखा –

ये पहली बार होगा कि तीन राज्यों के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकोनॉमिक मॉडल पर भी असर डालेगें। खास तौर से जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आए और ग्रामीण भारत के मुद्दों को अभी तक वोट के लिए इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानों के मुद्दों को जोड़ा वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग होगी, इसके लिए अब किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं है।

ध्यान दें तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जिन मुद्दों को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरूरत भी। क्योंकि मोदी सत्ता ने जिस तरह कारपोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कारपोरेट मित्रों के मुनाफे के लिए रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। और 1991 में आर्थिक सुधार के रास्ते कारपोरेट के जरिए कांग्रेस ने ही बनाये, ये भी किसी से छुपा नहीं है। लेकिन ढाई दशक के आर्थिक सुधार के बाद देश की हथेली पर भूख-गरीबी और असमानता जिस तरह बढ़ी और उसमें राजनीतिक सत्ता का ही जितना योगदान रहा उसमें अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते हैं तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खिंचे। और शायद ये लकीर खींचना उनकी जरूरत भी है जो भारतीय इकोनॉमिक मॉडल के चेहरे को खुद-ब-खुद बदल देगी। इसके लिए कांग्रेस को अर्थशास्त्री नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिए, क्योंकि चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनों में किसानों की कर्ज माफी होगी। न्यूतम समर्थन मूल्य किसानों को मिलेगा। मनरेगा मजदूरों को काम-दाम दोनों मिलेगा। छोटे-मंझोले उद्योगों को राहत भी मिलेगी और उनके लिए इन्फ्रास्ट्क्चर भी खड़ा होगा।

अब सवाल है जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा, तब कौन सा रुपया किस मद से निकलेगा। जाहिर है कारपोरेट को मिलने वाली राहत राज्यों के बजट से बाहर होगी। और उसी मद का रुपया ग्रामीण इकोनॉमी को संभालेगा। क्योंकि किसान मजदूर या छोटे-मंझोले उद्योगों के हालात में सुधार का एक मतलब ये भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढ़ोत्तरी होगी। यानी कारपोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढ़ी उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पाई। फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवी सबसे बडी इकोनॉमी हो चुकी है तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बडी इकोनॉमी है तो फिर भारतीय कारपोरेट अपने पैरों पर क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है। और उसे सरकार से राहत क्यों चाहिए। फिर एनपीए की सूची बतलाती है कि कैसे दस लाख करोड़ से ज्यादा की रकम कारपोरेट ही डकार गए और उनसे वसूली की जगह मोदी सत्ता ने खेप में राहत देनी शुरु कर दी। और इसी कतार में आम जनता का बैकों में जमा रुपया भी कारपोरेट सत्ता से करीबी दिखा कर फरार हो गया। जिन्हें भगोड़ा कहकर वापस भारत लाने का शिगूफा राजनीतिक तौर पर मोदी सत्ता ने बार बार कही। लेकिन सवाल ये नहीं है कि जो भगोड़े हैं, उन्हें सत्ता वापस कब लायेगी बल्कि बडा सवाल ये है कि क्या वाकई मोदी सत्ता के पास कारपोरेट से इतर कोई आर्थिक ढांचा ही नहीं है। जाहिर है यहीं से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरुप को समझा जा सकता है। क्योंकि जनवरी में मोदी सरकार आर्थिक समीक्षा पेश करेगी और अपने पांच बरस की सत्ता के आखरी बरस में चुनाव से चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश करेगी। और दूसरी तरफ कांग्रेस अपने जीते हुए राज्यों में कारपोरेट से इतर ग्रामीण इकोनॉमी पर ध्यान देगी। यानी राज्य बनाम केन्द्र या कहे कांग्रेस बनाम बीजेपी का आर्थिक मॉडल टकराते हुए नजर आएगा। और अगर ऐसा होता है तो फिर पहली नजर में कोई भी कहेगा कि जिस आर्थिक मॉडल का जिक्र स्वदेशी के जरिए संघ करता रहा और एक वक्त बीजेपी भी आर्थिक सुधार को बाजार की हवा बताकर कहती रही उसमें बीजेपी सत्ता की कहीं ज्यादा कारपोरेट प्रेमी हो गई और कांग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुए बदल गई।

दरअसल पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने हैं कि कांग्रेस के लिए कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और बीजेपी समेत किसी भी क्षत्रप के लिए मुश्किल है। क्योंकि राहुल गांधी के कंधे पर पुराना कोई बोझ नहीं है। कांग्रेस को अपनी पुरानी जमीन को पकडने की चुनौती भी है और मोदी के कारपोरेटीकरण के सामानांतर नई राजनीति और वैकल्पिक इकोनॉमी खड़ा करना मजबूरी है। मोदी सत्ता इस दिशा में बढ नहीं सकती क्योंकि बीते चार बरस में उसने जो खुद के लिए जो जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोड़ना उसके लिए संभव नहीं है। हालाँकि तीन राज्यों के जनादेश का इंतजार करती बीजेपी ये कहने से नहीं चूक रही है कि मोदी वहां से सत्ता हो जहां से कांग्रेस या विपक्ष की सोच खत्म हो जाती है। तो ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि चुनाव के जो आंकड़े उभर रहे हैं, उसमें बीजेपी से दस फीसदी तक एससी-एसटी वोट खिसके हैं। किसान-मजदूरों के वोट कम हुए हैं। बेरोजगार युवा और पहली बार वोट डालने वालों ने भी बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को करीब दस फीसदी तक ज्यादा वोट दिए हैं। और अगर अगले दो तीन महीनों में मोदी उन्हें दोबारा अपने साथ लाने के लिए आर्थिक राहत देते हैं, तो तीन सवाल तुरत उठेंगे। पहला, राज्यों के जनादेश में हार की वजह से ये कदम उठाया गया। दूसरा, कांग्रेस की नकल की जा रही है। तीसरा, चुनाव नजदीक आ गए तो राहत देने के कदम उठाए जा रहे हैं। फिर असल सच तो यह भी है सरकारी खजाना खाली हो चला है तभी रिजर्व बैंक से एक लाख करोड़ रुपया बाजार में लाने के लिए रिजर्व बैक के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स पर दवाब बनाया जा रहा है। फिर चुनाव जब चंद फर्लाग की दूरी पर हो तो कारपोरेट मित्रों से पूंजी की जरूरत मोदी सत्ता को पडेगी ही। और कारपोरेट मित्रों को अगर ये एहसास होता है कि मोदी सत्ता जा रही है तो वह ज्यादा दांव मोदी पर ही लगायेंगे। क्योंकि कांग्रेस तब मोदी के कारपोरेट मित्रों की पूंजी से बचना चाहेगी।

फिर एक सच ये भी है कि पहली बार कांग्रेस ने राजनीतिक तौर पर मोदी के कारपोरेट मित्रों का नाम खुले तौर पर अपने चुनावी प्रचार में ना सिर्फ लिया बल्कि भ्रष्ट्रचार के मुद्दों को उठाते हुए क्रोनी कैपटलिज्म का कच्चा-चिट्टा भी खोला।

तो चुनावी दांव के बदलते हालात में आखरी सवाल ये भी होगा कि तीन राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस महज महागठबंधन में एक साझीदार के दौर पर दिखाई नहीं देगी बल्कि कांग्रेस के ही इर्द -गिर्द समूचे विपक्ष की एकजुटता दिखाई देगी। और इसका बड़ा असर यूपी में नजर आएगा जहा कांग्रेस अकेले चुनाव लडने की दिशा में बढ़ेगी। क्योंकि कांग्रेस अब इस हकीकत को समझ रही है कि जब मायावती को तीन राज्यों के दलितों ने कांग्रेस की तुलना में कम वोट दिया तो यूपी में उसे गंठबंधन के साथ जाने पर कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहे हैं बल्कि दलित, आदिवासी, ओबीसी और ब्राहमण भी यूपी में साथ रहे हैं। इसीलिए कांग्रेस के लिए दिल्ली की सत्ता हमेशा यूपी के रास्ते निकली है। तो जिस परिवर्तन की राह पर कांग्रेस खड़ी है उसमें तीन राज्यों के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर तरीके भी बदल रहे हैं और देश का इकोनॉमिक मॉडल भी।

 

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