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Cane farmers on rail track

आखिर मरता तो किसान ही है न…

 कविता

भारत हर साल दो करोड़ पैंसठ लाख टन अनाज का उत्पादन करता है, फिर भी देश के बहुत से लोगों को भूखे पेट रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर किसान हैं जिन्हें अपने उत्पाद का सही दाम भी नहीं मिल पा रहा है और कर्ज के बोझ तले दबे ये किसान उत्पादों की सही कीमत न मिलने पर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। किसान जब अपने उत्पादों को बाजार में बेचने जा रहा है तो उसे वाजिब कीमत नहीं मिल रही है, लेकिन इस कम कीमत का फायदा भी उपभोक्ता को नहीं मिल पा रहा है।

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब हम अपने गांव गए थे तो वहां हमारे पिताजी टमाटर एक रुपए प्रति किलो खरीद कर लाते थे जब हमने सुना तो हमें बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि बाजारों में खासकर शहरी बाजारों में टमाटर 30 से 40 रुपए प्रति किलो मिल रहा है और तो और ये टमाटर पिताजी सीधे किसी किसान से न लाकर सब्जी मंडी से लाते थे।

सोचने वाली बात ये है कि आखिर जिस टमाटर की कीमत गांव के सब्जी मंडी में 1 रुपये प्रति किलो है वही टमाटर शहर के सब्जी मंडी में आकर 30 से 40 रुपये प्रति किलो कैसे बिक रहा है और सबसे बड़ी बात तो ये है कि जो टमाटर 1 रुपये प्रति किलो बिक रहा है उसके लिए किसानों को क्या मूल्य मिला होगा?

सीधी सी बात है कि किसानों को अपने उपज का उचित मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में किसानों की हालत दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है और किसान या तो आत्महत्या कर रहे हैं या फिर सड़कों पर आंदोलन के लिए उतर रहे हैं। किसानों की इन समस्याओं पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है, तो किसान खुद अपनी समस्याओं और मांगों के साथ आंदोलन करने तक को मजबूर हैं और ये समस्या कितनी विकराल रूप धारण करती जा रही है।

अभी पिछले दिनों तमिलनाडु के किसानों ने लगभग पैंतालीस दिनों तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न प्रकार के धरना प्रदर्शन द्वारा देश के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। तमिलनाडु के किसानों ने आत्महत्या कर चुके अपने किसान साथियों की मुंडमालाएं हाथों में लेकर प्रधानमंत्री के आवास के पास प्रदर्शन किया। कभी महिलाओं की तरह साडिय़ां पहनीं तो कभी चूहों को अपने मुंह से पकड़ कर अपनी नाराजगी और गुस्सा दिखाया, यहां तक कि किसानों ने अपना पेशाब पीकर आक्रोश भी जताया।

किसान की शवयात्रा का दृश्य अभिनीत कर अपनी तकलीफ और दर्द भी दिखाने की कोशिश की। लेकिन किसानों की बातों को केंद्र सरकार ने नहीं सुनी या कहे कि वह सुनना ही नहीं चाहती है। जबकि भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में किसानों को उपज लागत पर 50 फीसदी मुनाफे का वादा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से प्रेरित था लेकिन केंद्र की सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि लागत पर 50 फीसदी मुनाफा दिलाना संभव नहीं है।

केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह चुकी है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को फिलहाल लागू नहीं कराया जा सकता है और तो और केंद्र सरकार ने राज्यों से फसलों पर मिलने वाला बोनस भी बंद करा दिया। लगातार दो साल सूखे की मार झेलने के बाद किसान को कुछ राहत की उम्मीद थी, पर उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

इस साल के शुरुआत में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने किसानों की आत्महत्या से संबंधित अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है और वर्ष 2015 में 12,602 किसानों ने आत्महत्या की औसतन हर 41 मिनट में हमारे देश में कहीं न कहीं एक किसान आत्महत्या करता है। वर्ष 1995 से 2015 के बीच के 21 वर्षों में देश के कुल 3,18,528 किसानों ने कर्ज, फसल बर्बाद होने या गरीबी के चलते आत्महत्या की है। वहीं 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों की खुदकुशी के मामले 42 फीसदी बढ़े हैं।

1 जून से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र के अहमदनगर से शुरू हुए छोटे से किसान आंदोलन ने अब महा-आंदोलन की शक्ल ले ली है। महाराष्ट्र में किसान क्रांति के नाम से आंदोलन की शुरुआत हुई और राज्य भर के करीब 5 लाख से अधिक किसान हड़ताल पर हैं।

महाराष्ट्र के औरंगाबाद, शिरडी, नासिक, पुणे, सतारा और कोल्हापुर के अलावा राज्य के दूसरे हिस्सों में भी किसान आंदोलन कर रहे हैं। ये किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, किसान चाहते हैं कि उनके सभी कर्ज माफ किए जाए, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाए, खेती करने के लिए बिना ब्याज के कर्ज मिले, 60 साल के उम्रवाले किसानों को पेंशन दी जाए, दूध के लिए प्रति लीटर 50 रुपए दिये जाए। अपनी इन्हीं मांगों को लेकर महाराष्ट्र के किसान आज सड़क पर हैं और किसानों ने आंदोलन के दौरान दूध के कंटेनर सड़क पर फेंक दिये, शहरों में जाने वाले अनाज, दूध और फल-सब्जी समेत अन्य उत्पाद की आपूर्ति पर रोक लगा दी।

महाराष्ट्र के किसान अपनी कर्ज मुक्ति की मांग पर अटल हैं। किसान क्रांति के नेता जयाजी शिंदे का कहना है किसान की कर्ज मुक्ति ही उसकी सारी समस्याओं का हल है, ये किसान कर्जमाफी के साथ कृषि उत्पादों के उचित मूल्य भी दिये जाने की मांग कर रहे हैं।

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां आत्महत्या के सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए, वर्ष 2015 में 4,291 किसानों ने आत्महत्या की जबकि 2014 में 4,004 किसानों ने आत्महत्या की थी। लगातार दो वर्षों 2014 एवं 2015 के दौरान देश में हुई कुल किसान आत्महत्या का एक तिहाई महाराष्ट्र में दर्ज किया गया। करीब 87 फीसदी किसानों ने आत्महत्या कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु इन सात राज्यों में की है। जबकि भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने से पहले किसानों से वादा किया था कि सरकार बनने पर भाजपा किसानों कि आय दोगुना कर देगी लेकिन तीन साल के कार्यकाल में ऐसा नहीं हो सका। राज्य की सरकारों ने भी किसानों के कर्ज की समस्या को लेकर कोई राहतकारी कदम नहीं उठाया है।

वहीं मध्यप्रदेश के किसान पिछले 1 जून से कृषि उत्पादों के उचित मूल्य, कर्ज माफी और अपनी आय को दोगुना करने की मांग के साथ अन्य कई मांगों को लेकर सड़क पर बैठे थे कि इसी दौरान मंदसौर में आंदोलन हिंसक हो गया और यहां हुई फायरिंग और पथराव के दौरान पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत हो गई और आठ किसान गंभीर रूप से घायल हो गए, पुलिस फायरिंग में हुई छह किसानों की मौत के विरोध में भारतीय किसान मजदूर संघ ने मध्यप्रदेश के बंद का आह्वान किया। प्रदेश के कई इलाकों में कफ्र्यू लगा दिया गया। उसके बाद एक नई राजनीति शुरू हो गई कि किसान पुलिस के गोली से नहीं मरे।

आखिर क्यों सरकार इन किसानों के दर्द से अनजान रहना चाहती है जबकि किसान खुद अपनी हर व्यथा बताने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है। किसान चाहे खुद आत्महत्या करे या फिर पुलिस की गोली से मरे पर मरता तो किसान ही है न।

अभी ये आंदोलन खत्म नहीं हुआ है, नासिक में किसान आंदोलन की कोर कमेटी बैठक हुई जिसमें तीन बड़े फैसले लिए गए हैं; 12 जून को सभी तहसील और डीएम आफिस पर प्रदर्शन, 13 जून को रेल रोको आंदोलन और किसी मंत्री का कार्यक्रम नहीं होने देना। पूरे देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और फिर किसानों का ये धरना प्रदर्शन जो पिछले करीब तीन महीने से चल रहा है उसके बावजूद सरकार किसानों के मुद्दों को लेकर सुस्ती दिखा रही थी तो दूसरी तरफ नीति आयोग जरूर किसानों की आय पर कर लगाने की सिफारिश कर रही है।

पूरे देश में किसानों द्वारा अलग-अलग जगहों पर अब एक नए तरीके का प्रदर्शन शुरू हुआ है क्योंकि किसानों ने पहले कभी भी इस तरह का हड़ताल नहीं किया है। वैसे इस बार ये आंदोलन बाढ़ या सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा न होकर बम्पर पैदावार की है। आखिर कारपोरेट घरानों के छह लाख करोड़ का कर्जा जब सरकार माफ करने को तैयार है, तो फिर किसानों का कर्ज क्यों नहीं? वहीं रिजर्व बैंक और देश के अन्य बैंक भी किसानों के कर्ज माफ करने के पक्ष में नहीं हैं, उनका कहना है कि कर्जमाफी से गलत संदेश जाएगा, जबकि कंपनियों के प्रति उनका रवैया उदार रहा है। वैसे भी जब सत्ता में आने के लिए एक राज्य का कर्ज माफ किया जा सकता है, तो सूखाग्रस्त प्रदेशों के किसानों की कर्ज माफी पर सरकार को क्यों इतना सोचना पड़ रहा है।

सोचना ही है तो किसानों की स्थिति को कैसे बेहतर किया जा सकता है, इस पर सोचना चाहिए, वरना फिर आए दिन किसी न किसी राज्य के किसान ऐसे ही खेत में नहीं सड़कों पर ही देखने को मिलेंगे। ऐसे में किसानों की दुर्दशा सुधारने के लिए कोई स्थायी हल निकालने की दिशा में प्रयास करना होगा।

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