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राजनाथ सिंह जी, हम बताते हैं – कौन महान है

देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पीड़ा है कि महाराणा प्रताप का मूल्यांकन जिस तरह से इतिहासकारों को करना चाहिए था, वैसा नहीं किया गया। वे पूछते हैं कि अगर अकबर को महान कहा गया तो महाराणा प्रताप को क्यों नहीं?

कुछ ऐसे ही विचार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी व्यक्त किए हैं।

वे फरमाते हैं कि जो जाति या कौम अपने इतिहास को ना संजोये वह भूगोल को सुरक्षित नहीं रख सकता। अकबर, औरंगजेब और बाबर की पहचान जब भी होगी केवल एक विदेशी आक्रांता के तौर पर होगी। जिस दिन हम इसे स्वीकार कर लेंगे, समस्या का हल हो जाएगा। भारत का नौजवान महाराणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह बन जाए तो हमें आईएस से डरने की जरूरत नहीं।

कितनी आसानी से आदित्यनाथ ने आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या का समाधान सुझा दिया।

काश, कि आईएस की समस्या इतनी सरल होती कि इतिहास के गौरवबोध से दूर की जा सकती।

राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ के विचारों में यह साम्य कोई संयोग नहीं है, बल्कि जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है इतिहास के कई पन्नों की इबारतें बदलने की चाह अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है।

कुछ समय पहले जयपुर से भाजपा विधायक मोहनलाल गुप्ता का सुझाव आया था कि यूनिवर्सिटी की किताबों में फेरबदल कर ‘हल्दी घाटी के संग्राम’ में अकबर की जगह महाराणा प्रताप को विजेता दिखाया जाए। उनका कहना है कि कई सारे इतिहासकारों ने इस घटना को गलत तरीके से लिखा है। 1576 में हुई इस प्रसिद्ध लड़ाई में जीत महाराणा प्रताप की हुई थी। उनके मुताबिक कोर्स की किताबों में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पढ़ाया जा रहा है। अब समय आ गया है इसमें बदलाव किया जाए और इस पीढ़ी के साथ आने वाली पीढ़ियों को भी सही इतिहास पढ़ाया जाए।

सवाल यह है कि सही इतिहास की परिभाषा क्या है?

गांधीजी की हत्या हुई, यह एक तथ्य है। और देश अब तक उनके कातिल के रूप में नाथूराम गोडसे का नाम जानता है। लेकिन इसी देश में ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है कि गोडसे ने जो किया वह सही था और अगर वे इतिहास लिखेंगे तो क्या गांधी हत्या को उसी तरह लिखेंगे, जैसी घटना घटी या फिर उसमें नाथूराम गोडसे के पक्ष को महिमामंडित कर यह बताने की कोशिश करेंगे कि जो हुआ वह परिस्थितियों के वश हुआ और राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रहित के लिए हुआ।

एक घटना को जिन शब्दों में वर्णित किया जाता है, सही और गलत का निर्धारण भी उसी से होता है, लेकिन इसमें इतिहास के साथ जिस तरह का खिलवाड़ होता है, एक उदार और चिंतनशील देश में चिंता का विषय यही होना चाहिए।

इस देश ने अकबर को महान कहा तो महाराणा प्रताप या शिवाजी या गुरु गोविंद सिंह का कभी अनादर नहीं किया, उन्हें भी इतिहास में महान नायकों का दर्जा दिया गया है। लेकिन इतिहास को तथ्यों की जगह धर्म के चश्मे से देखने वालों के नजरिए में ऐसा इतिहास लेखन गलत ही होगा। उन्हें हिंदू राजाओं को महान और अन्य शासकों को आक्रमणकारी बताने में ही अपनी राजनीति की सार्थकता दिखती है।

बाबर भारत आए और उसके बाद मुगल शासक यहीं के होकर रह गए। अकबर ने तो इस देश को हमेशा एकसूत्र में बांधने की कोशिश की। दीन ए इलाही धर्म चलाया। बादशाह की उपाधि धारण की, ताकि खलीफा के प्रभाव से मुक्त हो सके। मौलवियों के दबाव को नामंजूर किया, भले उनकी नाराजगी झेलनी पड़े। दिल्ली के सुल्तानों के समय से चले आ रहे जीतल नाम के सिक्के को खत्म कर दिया था और भारत की प्राचीन मुद्रा ‘रुपया’ के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया।

अकबर अगर विदेशी आक्रांता होते तो भारत को लूट कर चले जाते, लेकिन यहीं रहकर अपने साम्राज्य का विस्तार करने की कोशिश और हिंदू-मुस्लिम प्रजा की भलाई के लिए फैसले लेना, यही बताता है कि वे विदेशी लुटेरे या आक्रमणकारी नहीं थे। उनके उत्तराधिकारियों ने भी अपनी क्षमताओं और सीमाओं के अनुसार शासन चलाया। आज भी मुगल शासन की ऐतिहासिक निशानियां देश में जगह-जगह बिखरी हैं, क्या इन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है?

रहा सवाल इसका कि अकबर को महान कहना चाहिए या फिर महाराणा प्रताप को? तो यह सवाल सैकड़ों सालों से लोगों को त्रस्त करता आ रहा है। दोनों अपनी जगह महान थे। अगर भारत को एक सूत्र में बांधने का काम महान है तो अकबर ने इसके लिए काफी कोशिश की और अगर आप वीरता से आक्रमणकारी को पीछे धकेलने को महान काम मानते हैं तो प्रताप का कोई सानी न था।

दरअसल इतिहास की जिस घटना पर आज अकबर और महाराणा प्रताप को आमने-सामने खड़ा किया जा रहा है, उसे उस वक्त की परिस्थितियों के मुताबिक समझने की कोशिश होनी चाहिए। तब भारत किसी देश का नाम नहीं था, अलग-अलग रियासतों में बंटा विशाल भूखंड था, जिसमें साम्राज्यविस्तार के लिए राजाओं में संधियां और लड़ाइयां होती थीं, धर्म और जाति के परे भी। अकबर ने अपना साम्राज्य विस्तार काफी कर लिया था, लेकिन मेवाड़ के राणा प्रताप सिंह को अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं थी।

प्रताप के पहले भी कभी भी मेवाड़ के किसी शासक ने किसी का आधिपत्य नहीं माना था। असल में मेवाड़ खेती के हिसाब से बहुत उपजाऊ था, सिंध से मालवा और गुजरात से अजमेर-आगरा जाने वाले कारवाँ मेवाड़ से ही गुजरते थे। उनकी सुरक्षा का इंतजाम मेवाड़ का शासक और उसके ठिकानेदार करते। जितने ज्यादा व्यापारी यहां आते, उतना राज्य को फायदा होता। अकबर मेवाड़ पर आधिपत्य चाहते थे क्योंकि वह अजमेर से गुजरात के रास्ते पर पड़ता था। अकबर ने कई बार दूत भेजकर मेवाड़ को अपने खेमे में मिलाने की नाकाम कोशिश की।

अंतत: अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में फौज भेजकर मेवाड़ पर कब्जा  करने की ठानी। अकबर के हिंदू राजा मानसिंह थे तो महाराणा प्रताप के तोपखाने के इंचार्ज थे हाकिम खां सूरी, जिन्होंने उनकी सेना को कई तरह के युद्ध कौशल सिखाए थे। अब तक इतिहास में यही बताया गया है कि चार घंटे लड़ाई चलती रही, राणा प्रताप ने मानसिंह पर स्वयं हमला किया, लेकिन हमले में प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया और उन्हें मैदान से हटना पड़ा। उस समय की परिपाटी के मुताबिक, सेना प्रमुख के हटते ही लड़ाई ख़त्म हो गई। मुगल सेना की जीत हुई। घायल चेतक राणा प्रताप को हल्दीघाटी के पार सुरक्षित स्थान पर ले गया।

यहाँ प्रताप ने भीलों की मदद से फिर फौज खड़ी की और आने वाले वर्षों में मेवाड़ के काफी हिस्से पर फिर से अपना शासन स्थापित कर लिया।

इधर अकबर ने भी यही ठीक समझा कि बेकार में मेवाड़ से झगड़ा मोल लेने से बेहतर है कि बंगाल और दक्कन की तरफ रुख किया जाए।

जाहिर है हल्दी घाटी का युद्ध साम्राज्य विस्तार के लिए किया गया था, जिससे धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन अब इस इतिहास पर भी राजनीति की जा रही है।

अंत में इस ओर ध्यान दिया जाए कि मेवाड़ के शासक को राणा नहीं महाराणा प्रताप कहा गया है, यानी उन्हें महान पहले से बताया जा रहा है, फिर भाजपा के मंत्री, नेता इस पर भ्रम क्यों फैला रहे हैं?

देशबन्धु का संपादकीय

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May 12,2017 12:39

 

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