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बुआ और बबुआ ने मिलकर कांग्रेस को किया बाहर तो खुश हुए मोदी भैया जी

बुआ और बबुआ ने मिलकर कांग्रेस को किया बाहर तो खुश हुए मोदी भैया जी

जैसे क़यास लगाए जा रहे थे कि लोकसभा चुनाव बसपा-सपा (alliance between SP-BSP) साथ मिलकर लड़ेंगे, उन क़यासों पर अब धीरे-धीरे मोहर लगनी शुरू हो गई है। बुआ (Akhilesh Yadav) और बबुआ (Narendra Modi) की बीते दिनों बुआ के घर पर डेढ़ घंटे से ज़्यादा हुई मुलाक़ात ने यूपी की सियासत में सर्दी में भी पसीना ला दिया, साथ ही एक और गठबंधन की उम्मीदों को पंख लगा दिए, क्योंकि बुआ और बबुआ ने इस गठबंधन से कांग्रेस (Congress) को बाहर रखा है। इस लिए अब एक ओर गठबंधन कांग्रेस के नेतृत्व में बनेगा, जिसमें शिवपाल सिंह यादव (Shivpal Singh Yadav) की प्रसपालो (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया) के शामिल होने की उम्मीदें लगाई जा रही हैं। और भी कई दल हैं जिनके कांग्रेस वाले गठबंधन में शामिल होने चर्चा हो रही है।

बुआ और बबुआ ने गठबंधन किया इन सीटों पर लड़ने की हुई तैयारी

 

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

 

इस गठबंधन के बारे में हमने पहले ही बता दिया था कि सपा-बसपा की महत्वकांक्षा के चलते कांग्रेस ने बी प्लान बनाया है। हमारी वह ख़बर सही साबित होने जा रही है।

सपा-बसपा के बीच सहमति बन जाने की ख़बरें मिल रही हैं, हालाँकि इसकी घोषणा अभी नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि सब कुछ तय हो गया है। बसपा और सपा में से कौन किस सीट से लड़ेगा यह भी लगभग फ़ाइनल सा लग रहा है, फिर भी जब तक घोषणा नहीं हो जाती, कुछ भी हो सकता है, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता।

सूत्र जो बता रहे हैं, अगर हम उसको ही सही मान लें, तो यह गठबंधन मोदी की भाजपा के साथ कुछ ऐसे भी लोगों का भविष्य तय करेगा, जो अपने-अपने क्षेत्रों में खुद को सियासत का क़लंदर समझते हैं। लेकिन वह इस गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, उनकी भी सियासत की बिजली भागने से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि गठबंधन बन जाने के बाद मुसलमान व दलित एकजुट होकर मोदी की भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए वोट करेगा, जिसकी वजह से बहुत लोगों के संसद पहुँचने के अरमान ठंडे होते दिख रहे हैं।

ख़ैर हम बात कर रहे थे सपा और बसपा की कि कौन कहाँ से लड़ेगा। पहले बात करते हैं बसपा की।

गठबंधन में बसपा की दावेदारी इन सीटों पर रही

BSP's claim in the alliance was in these seats

सहारनपुर, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, अकबरपुर, अंबेडकरनगर, बाँदा, बांसगांव, भदोई, चंदौली, देवरिया, धौरहरा, डुमरियागंज , फ़तेहपुर सीकरी, घोसी, हरदोई, हाथरस, जालौन, जौनपुर, खीरी, मछलीशहर, महाराजगंज, मिर्ज़ापुर, मोहनलालगंज, प्रतापगढ़, रॉबर्टसगंज, सलेमपुर, संतकबीरनगर, शहाजहांपुर, सीतापुर व सुल्तानपुर। एक दो सीट बदल सकती हैं।

वहीं सपा के पास जो सीट रहने की संभावना जताई जा रही है उनमें शामिल हैं –

कन्नौज, बदायूँ, मैनपुरी, फ़िरोज़ाबाद, आज़मगढ़, इलाहाबाद, फूलपुर, आँवला, बहराइच, बलिया, बरेली, बिजनौर, एटा, फ़ैज़ाबाद, फ़र्रूख़ाबाद, गौतमबुद्धनगर, ग़ाज़ीपुर, गोंडा, झाँसी, बागपत, कैराना, गोरखपुर, अमरोहा, इटावा, कैसरगंज, बस्ती, मथुरा, कौशाम्बी, लालगंज, मुरादाबाद, नगीना, पीलीभीत, रामपुर, सँभल, श्रावस्ती व उन्नाव सपा के साथ लोकदल की साझेदारी भी शामिल है।

अब बात करते है कांग्रेस के बाहर रहने से क्या कोई फ़र्क़ पड़ेगा ? क्या वोट बँटने की संभावना है ? ऐसे और भी सवाल है जो लोगों के दिमाग़ में व सियासी गलियारों में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

अगर हम 2017 के विधानसभा के चुनाव की बात करें तो कांग्रेस व सपा के बीच गठबंधन हुआ था। मुसलमान पूरा गठबंधन पर उतरा, यह बात अलग है कि यादव इस बार भी मोदी की भाजपा के साथ चला गया, लेकिन मुसलमान में कोई टूट नहीं हुई, वह अपनी उसी भूमिका में खड़ा रहा जैसे एक बँधवा मज़दूर को खड़ा रहना चाहिए। उसने किसी की नहीं सुनी, जबकि उस गठबंधन के कोई मायने नहीं थे मुसलमान के लिए, क्योंकि सपा का भी वोटबैंक मुसलमान और कांग्रेस का भी तो उसका परिणाम तो यही आना था और यह गठबंधन दलित को साथ लेकर बन रहा इसके परिणाम सकारात्मक रहने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता तो जब मुसलमान उस गठबंधन से नहीं भागा जिसके परिणाम अच्छे आने की उम्मीद नहीं थी तो वह इससे क्यों बँटेगा। यह बात तर्कहीन लगती है इस गठबंधन ने मोदी एण्ड शाह कंपनी की नींद हराम कर दी उसे कुछ सूझ नहीं रहा है कि वह क्या करे। लेकिन आम धारणा यह है कि विपक्ष के किसी भी गठबंधन में कांग्रेस को होना चाहिए बिना कांग्रेस गठबंधन अधूरा है। कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने से सपा बसपा को अपना सियासी नुक़सान नज़र आ रहा है, इस लिए वह उससे दूरी बनाए रखना ही बेहतर मान रहे हैं। सियासी दलों को अपनी महत्वकांक्षा ज़्यादा ज़रूरी होती है न कि जनभावना। ख़ैर, कुछ भी कहो गठबंधन के परिणाम मोदी की भाजपा के साथ-साथ संघ को भी दिखाई देने लगे हैं। जिस भाजपा में मोदी के सामने सब बौने नज़र आते थे वहाँ आज गड़करी पैदा हुए, वह सब कुछ कह रहे जो पार्टी की बेहतरी के लिए कहना चाहिए।

सपा-बसपा के बीच हुए सियासी गठबंधन की घोषणा मायावती के जन्मदिन या उसके बाद होने की संभावनाएँ व्यक्त की जा रही हैं।

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