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आ गए अच्छे दिन : 80 करोड़ की मामूली कीमत पर बिक गया एम्बेसडर कार का ब्रांड

 

पलाश विश्वास

बीबीसी की खबर है और दिलोदिमाग लहूलुहान हैः

One of India's most iconic car brands has been sold by Hindustan Motors to the French manufacturer Peugeot for a nominal $12m (£9.6m), officials say. The Ambassador car used to be one of India's most prestigious vehicles beloved by government ministers.

बीबीसी हिंदी की खबर में इसकी वजह का खुलासा भी हो गया हैः

एक ज़माने में भारत में रुतबे और रसूख का पर्याय मानी जाने वाली एम्बेसडर कार का ब्रांड 80 करोड़ की मामूली कीमत पर बिक गया है। अधिकारियों ने बताया कि हिंदुस्तान मोटर्स ने फ्रांसीसी कंपनी पूजो के साथ ये सौदा किया है। एक वक्त था जब भारत में सरकारी लोगों की ये पसंदीदा कार हुआ करती थी, लेकिन 2014 के बाद से ही इसका उत्पादन बंद कर दिया गया।

खबरों के मुताबिक कभी नेताओं और नामी-गिरामी लोगों की शाही सवारी रही एंबेसडर कार के ब्रांड को हिंदुस्तान मोटर्स ने बेच दिया है। यूरोप की दिग्गज ऑटो कंपनी प्यूजो ने इसे सिर्फ 80 करोड़ रुपये में खरीदा है। तीन साल पहले 2014 में एंबेसडर कार का प्रोडक्शन रोक दिया गया था। पिछले महीने पीसीए समूह ने भारतीय बाजार में प्रवेश करने के लिए सीके बिड़ला ग्रुप के साथ डील की थी, जिसके तहत शुरुआत में करीब 700 करोड़ रुपये का निवेश किया जाना है। इस रकम से तमिलनाडु में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाया जाएगा। इस प्लांट में हर साल 1 लाख वाहन बनाने की क्षमता होगी।

गौर करें, खबर के मुताबिक 2014 से एम्बेसडर कार का उत्पादन बंद हो गया है।

नोटबंदी के बाद यूपी चुनाव से बजट और राम के नाम, राम की सौगंध और राममंदिर के घटाटोप में अर्थव्यवस्था की सेहत समझने के लिए यह आर्थिक वारदात बेहद गौरतलब है।

नोटबंदी की तिमाही में उत्पादन दर और विकास दर में गिरावट हुई है, जिससे झोला छाप बगुला भगत वित्तीय प्रबंधक और पालतू अर्थशास्त्री और मीडिया सिरे से इंकार करते हुए सुनहले दिनों के तिलिस्म में आम लोगों की जिंदगी को जलती हुई कब्रगाह में तब्दील करने का मुक्तबाजारी महोत्सव मना रहे हैं।

 गरीबों की गरीबी दूर करने के बहाने राम के नाम फासिज्म का कोरबार की तर्ज पर गरीबी उन्मूलन और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की भगवा वैदिकी पेशवाराज मार्का नैतिकता की सुनामी की आड़ में देश और आम जनता की मिल्कियत देश के संसाधन बेचने की पूरी प्रक्रिया एम्बेसडर ब्रांड विदेशी हवाले करने से जगजाहिर है और बीबीसी की खबर में देश की नीलामी की जो तस्वीर चस्पां है, उसे अंध राष्ट्रवादी हिंदुत्व के नजरिये से देश पाना उतना आसान भी नहीं है।

बजट पेश करने के बाद सरकार ने जिस तरह से राशन कार्ड के साथ आधार कार्ड को नत्थी कर दिया है और जिस पर राजनीति फिर सिरे से खामोश है, जाहिर है कि पटरी से अर्थव्यवस्था उतर जाने और उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने से किसी की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ा है तो आम जनता को एम्बेसडर जैसे ब्रांड के विदेशी हाथों में जाने से कोई तकलीफ होगी नहीं।

पिछले 26 साल से देश बेचने का कारोबार इस अमेरिकी उपनिवेश में राजकाज है और आर्थिक सुधारों के नाम पर आम जनता का और खास तौर पर बहुजनों का कत्लेमाम है।

आम जनता को अर्थशास्त्र नहीं आता और न अर्थव्यवस्था में उसकी दिलचस्पी है।

कारपोरेट देशी कंपनियों के मालिकान, शेयर होल्डरों और वित्तीय प्रबंधकों को क्या हो गया है कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ चुनिंदा कंपनियों को दुनियाभर में अपना साम्राज्य बनाने के लिए राजकोष खुला है। बैंकों से लाखों करोड़ का कर्ज उनके डूबते कारोबार के लिए हैं और इसके अलावा सालाना लाखों का टैक्स माफ है। बाकी सबकी शामत है इस रामराज्य में।

हाल ये हैं कि तेल, गैस और पेट्रोलियम, संचार, ऊर्जा और विमान, जहाज, बंदरगाह, सड़क परिवहन, रेल और मेट्रो रेल, बैंकिंग और बीमा, निर्माण और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में चुनिंदा कपनियों को लाखों करोड़ की रियायतें, विदेशों में उनके अरबों का निवेश और एम्बेसडर ब्राड का सौदा सिर्फ अस्सी करोड़ में।

विनिवेश और निजीकरण के तहत सरकारी कंपनियां कौड़ियों के मोल बिकते देखने और रेलवे समेत सभी सेक्टरों में थोक पैमाने पर छंटनी का नजारा देखने और क्रांतिकारी ट्रेड यूनियनों के नेताओं की विदेश यात्राएं और पंचायत से लेकर संसद तक जन प्रतिनिधियों के करोड़पति और लखपति बनते देखने को अभ्यस्त आम जनता को अब भी अपने बैंक खातों में नोटवर्षा की तर्ज पर सुनहले दिनों का बेसब्री से इंतजार है और यूपी चुनाव से पहले गरीबी उन्मूलन के नारे के साथ बेइंतहा सरकारी खर्च कागद पर दिखाने के करतब से अर्थव्यवस्था के जोड़ घटाव करने के मूड में आम जनता नहीं है, जाहिर है।

दिवालियापन का आलम यह है कि कारपोरेट कंपनियों को यह नजर नहीं आ रहा है कि एम्बेसडर जैसे बेशकीमती हिंदुस्तानी ब्रांड को खत्म करने का इंतजाम 2014 में बिजनेस फ्रेंडली हिंदुत्व की सरकार ने कर दिया है तो आगे उद्योग और कारोबार का हाल किसानों मजदूरों से भी बुरा होना है।

नोटबंदी के बारे में हम पहले दिन से लिख रहे हैं,चाहे तो हस्तक्षेप पर नोटबंदी में लगे तमाम आलेख नये सिरे से पढ़कर देख लें कि नोटबंदी और डिजिटल कैशलैस इंडिया का मतलब नकदी पर चलने वाला खुदरा कारोबार और हाट बाजार खत्म है, किसानों की दस दिशा तबाही है, बेरोजगारी, भुखमरी और मंदी है तो यह कारपोरेट एकाधिकार का चाकचौबंद इंतजाम है।

बड़ी मछलियां छोटी मछलियां को निगलकर और बड़ी हो जायेंगी। वे और बड़ी हो गयी कंपनियां फासिज्म के राजकाज के सहारे बड़ी कंपनियों को भी बख्शेंगी नहीं।

कारपोरेट लाबिइंग से कारपोरेट कंपनियों को पिछले छब्बीस साल में जो चूना लगता रहा है, उसका हिसाब जोड़ लें।

सरकारी संरक्षण में तेल और गैस में ओएनजीसी जैसे नवरत्न कंपनी और तमाम सरकारी गैरसरकारी तेल कंपनियों का बंटाधार करके जैसे कारपोरेट एकाधिकार कायम हुआ है, वही किस्सा अब बाकी हिंदुस्तानी कारपोरेट कंपननियों का भोगा हुआ यथार्थ बनकर सामने आने वाला है।

एम्बेसडर प्रकरण इस प्रक्रिया की शुरुआत है। वैसे भी कारपोरेट लाबिइंग की वजह से आटो सेक्टर में भारी संकट है। आगे आग दिवालिया बनते जाने की किसकी बारी है, यह सिर्फ नागपुर के मुख्यालय की मर्जी और मिजाज पर निर्भर है।

एम्बेसडर को हम बचपन से जान रहे हैं। जब हम नैनीताल में पढ़ रहे थे। पहाड़ों में रेल तो क्या साईकिलें तक दिखती नहीं थी। पहाड़ों में और तराई में तब साठ और सत्तर के दशक में परिवहन का मतलब केएमओ और जीएमओ की बसों, टाटा के ट्रकों के अलावा चार पहिया वाहनों के मामले में एम्बेसडर कारें और जीप हुआ करती थी। जीप और जोंगा तो सिरे से लापता है, लेकिन एम्बेसडर चल रहा था।

हिंदुस्तान मोटर्स का कोलकाता के नजदीक हिंद मोटर काऱखाना संकट में है और 2014 से एम्बेसडर का उत्पादन बंद है तो ब्रांड को विदेशी हाथों में महज अस्सी करोड़ के एवज में सौंपने से पहले बिजनेस फ्रेंडली सरकार के पास बहुत मौके थे एम्बेसडर बचाने के।

किंगफिशर और विजय माल्या या विदेशों में अरबों डालर और पौंड नोटबंदी के आपातकाल में भी निवेश करने वाली कंपनियों के हितों का ख्याल जितना है इस फासिज्म के राजकाज को,उसका तनिको हिस्सा अगर एम्बेसडर के लिए खर्च होता।

हम जब कुमायूं और गढवाल में पदयात्राएं कर रहे थे तब कारों की सवारी का ख्वाब हम जाहिरा तौर पर नहीं देखते थे। लेकिन पेशेवर पत्रकारिता की वजह से 36 सालों में हमने कारों की सवारी खूब की है। मेरठ के दंगों के दौरान मारुति जिप्सी या झारखंड में ट्रेकर की सवारी भी खूब की है। लेकिन आधी रात के बाद दफ्तर से घर लौटना हो या कोयला कदानों में भूमिगत आग से घिरी धंसकती हुई जमीन पर दौड़ने की नौबत हो, एम्बेसडर कार हमारी पहली पसंद रही है जो जितने ड्राइवरों से हमारा ताल्लुकात हुआ है, उनके मुताबिक भारत की सड़कों पर सबसे बेहतरीन कार है।

बहरहाल अर्थव्यवस्थी की तबाही, बेरोजगारी और छंटनी के शिकार लोगों के लिए सुनहले दिन हाजिर है

न रोजगार सृजन की कोई सोच है और न नौकरी की सुरक्षा की कोई गारंटी है। श्रम मंत्रालय छंटनी से जुड़े कानून में संशोधन करने की तैयारी कर रहा है। जानकारी के मुताबिक श्रम मंत्रालय छंटनी की सूरत में कर्मचारियों को मिलने वाले मुआवजे को बढ़ा कर 3 गुना करने का प्रस्ताव भेजेगा।यह इसलिए है कि उत्पादन प्रमाली तहस नहस होने और एकाधिकार कारपोरेट वर्चस्व की वजह से भारी पैमाने पर छंटनी होनी है।यह नजारा खुदरा कारोबार खतम करने वाली ईटेलिंग कंपनियों के रवैये से जाहिर है तो आईटी सेक्र का नाभिनाल तो ट्रंप के एक्जीक्यूटिव आदेशों से जुड़ा है।

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