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एससी/एसटी एक्ट : संभव है, प्रतिगामी संशोधन को सरकार और न्यायालय वापस ले ले, पर क्या दलितों पर अत्याचार बंद हो जाएगा?

एससी/एसटी एक्ट में प्रतिगामी संशोधन : अभी और जनविरोधी कानूनों के लिए तैयार रहना होगा

एससी/एसटी एक्ट में प्रतिगामी संशोधन और उसके खिलाफ संघर्ष में सही क्रांतिकारी दिशा का सवाल

Gp Capt KK Singh

इस सवाल का, देश के वर्तमान हालत और इस सन्दर्भ में एक सफल भारत बंद का आयोजन (10 अप्रैल को), पर खड़ा होना स्वाभाविक है. कई राजनीतिक दल, जिसमें केवल दलितवादी दल ही नहीं, बल्कि वाम दल भी हैं, इस आन्दोलन को सफल मानते हैं और आत्म मुग्ध हैं. यह भी सही है की वर्तमान सत्ताधारी दल त्रस्त है और आन्दोलन के बाद दलितों पर बढ़े अत्याचार और दमन इसका प्रमाण है!

संभव है, इस एक्ट के सुधार को सरकार और न्यायालय वापस ले ले. पर क्या दलितों पर अत्याचार बंद हो जाएगा? क्या पूर्ण रोजगार गारंटी कानून पास हो जाए तो, क्या भारत से बेरोजगारी ख़त्म हो जाएगी, पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में?



नीचे आलेख इस प्रश्न पर द्वंद्वात्मक तरीके से विश्लेषण करता है, और आन्दोलन को सुधारवाद से मुक्त कर क्रान्तिकारी दिशा देने की बात करता है. पढ़ें:

एससी/एसटी एक्ट अनुसूचित जाति व जनजाति के ऊपर होने वाले अत्याचारों से उनकी 'सुरक्षा' के लिए इस व्यवस्था की (तब की) सबसे बड़ी रहनुमा सरकार यानि कांग्रेस सरकार ने एक कानून बनाया था। इसकी पृष्ठभूमि देखी जाए, तो यह वह दौर था (यह कानून 1989 में बना है) जब देश के अनेकों हिस्सों में दलितों पर अत्याचार काफी बढ़ा हुआ था। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि यह वह दौर था जब बिहार और कई अन्य क्षेत्रों व राज्यों में गरीब दलितों और आदिवासियों का इसके खिलाफ प्रतिरोध था, जो गांवों से पलायन के दौर में थे, लेकिन साथ ही क्रांतिकारी कम्युनिस्टों (तथाकथित "नक्सलाइट") के नेतृत्व में उनका प्रतिरोध भी अत्यधिक उभार पर था। बिहार में तो दोनों ओर "सेनाएँ" खड़ी थीं। यानी संगठित दमन और उसके प्रतिरोध में संगठित प्रतिरोधवाहिनी भी काफी मजबूती से मौजूद थी। यह recorded सच्चाई है कि लाख दमन और अत्याचार (जिसमें दर्जनों नरसंहार शामिल थे) के बावजूद यह लड़ाई मजबूत हुई और विजयी हुई। छोटे-बड़े और नये-पुराने कई संघर्षकामी ग्रुप काम कर रहे थे। खुले, अद्र्धखुले और पूरी तरह गुप्त संगठनों के द्वारा अलग-अलग और कभी-कभी संयुक्त रूप से भी प्रतिरोध जारी रहा, चाहे परिस्थितियाँ जितनी भी कठिन रही हों। बिहार में खासकर मध्य बिहार की धरती लाल हो चुकी थी। इस लड़ाई के सबसे अग्रिम मोर्चे पर निस्संदेह दलित और पिछडों के गरीब-गुरबों, खेत मज़दूरों, गरीब किसानों और मँझोले किसानों की विशाल फौज थी। जब लड़ाई आगे बढ़ी तथा और जीतें हासिल होती गईं तो इसमें अन्य दूसरे तबके और संस्तर आते और जुड़ते गए। यहाँ तक कि अगड़ी जाति के भी मध्यम और गरीब हिस्से "नक्सलाइट" बनने लगे। रणवीर सेना जमींदारों की अंतिम गुंडवाहिनी सेना साबित हुई, जिसे प्रतिरोध से तो हराया ही गया, साथ में जिस तेजी से देहातों में सदी के अंत में पूँजी का प्रवेश हुआ और उससे जमीनी स्तर पर जो नयी स्थिति पैदा हुई और जिसका असर तेजी से पहले भी महसूस किया जा रहा था, उनके कुल निचोड़ प्रभाव ने भी इन आतताई सेना में आम तौर पर भर्ती किए गए गरीब और मध्यम वर्ग के नौजवानों के समक्ष इस लड़ाई की निस्सारता को सामने ला दिया था और वे धीरे-धीरे इस तरह की खुली और नृशंस अत्याचारी सेनावाहिनी से विमुख होते गए।



यहाँ यह भी याद रखना चाहिए, कि जो लोग इसे पुराने सामंतवाद के खिलाफ लड़ाई मानते हैं, वे भारी गलतफहमी में हैं। यह लड़ाई मुख्य रूप से पुराने जमींदारों, जो पूंजीवादी खेती करने की शुरुआत कर चुके थे यानी पूंजीवादी फार्मर बन चुके थे या उसकी प्रक्रिया में खींच ले आए गए थे, और दूसरी तरफ लगभग कानूनी और सामाजिक तौर पर 'मुक्त' हो चुके देहाती कृषि गुलामों, गरीब किसानों आदि के बीच की लड़ाई थी। लड़ाई के केंद्र में यह बात मुख्य रूप से मौजूद थी कि कालांतर में न तो पुराने तरीके की सामंती खेती बची थी, न तो पुराने बंधुआ या दास किसान रह गए थे। वे बहुधा 'मुक्त' हो गए थे और बाज़ार की क्रूर शक्तियों के हवाले कर दिये जा चुके थे। लेकिन चूंकि यह सब हुआ राज्य प्रायोजित सुधारों के जरिये जिसका मुख्य ध्येय पुराने सामंतों को ही कृषि का मुख्य एजेंट बनाना था, न कि वास्तविक किसानों को, इसलिए पुराने शासकों का आर्थिक और सामाजिक और यहाँ तक कि सांस्कृतिक दबदबा भी बना रहा और स्वयं राज्य इस दबदबे को कायम रखना चाहता था और इसके लिए हर तरह की मदद उसने इन वर्गों को दी, जो इसके वर्ग चरित्र के अनुरूप था।

इस तरह जो मध्य या दक्षिण बिहार में जो लड़ाई चली, वह लड़ाई मुख्य रूप से राज्य प्रायोजित सुधारों के द्वारा 'मुक्त' किए जा चुके खेत मजदूरों की जमीनी स्तर पर 'मुक्ति की लड़ाई' थी, जो, जाहिर है, नवोदित पूंजीवादी भूस्वामी बिल्कुल नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि नए बने या लगातार बन रहे सामाजिक सम्बन्धों के तहत वे तो नए किस्म के पूंजीवादी भूस्वामी बन जाएँ, लेकिन वे यह कतई नहीं चाहते थे कि कल तक उनके इशारों पर उठने-बैठने वाले दलित गरीब-गुरबा भी नए वर्ग बनने का सुख भोग सकें और इस नए वर्ग के निर्माण से मिली 'आज़ादी' का वे खुली हवा में अहसास करें या कर सकें। वे खूनी भेड़िये इसीलिए इनकी हर आवाज़, मुक्ति की हर चाहत को दबाने के लिए इन पर टूट पड़े। प्रत्युत्तर में गरीब-गुरबों के प्रतिरोध का एक ऐसा सिलसिला चल निकला जो कालान्तर में इनके पूरे पुराने वर्चस्व को एक दो दशकों के लिए लगभग मिटा कर रख दिया। खासकर बिहार इसका उदाहरण बना।

साथियों, हम कोई उस दौर का मूल्यांकन नहीं पेश कर रहे हैं, इस लेख में मेरे सामने यह टास्क नहीं है, बल्कि यह चर्चा हम इसलिए लाना चाहते थे ताकि "एससी/एसटी एक्ट" को बनाने के पीछे राज्य की क्या मंशा थी, उसके बारे में स्पष्टता के साथ बात की जा सके।

हम पाते हैं कि यह नक्सलाइट आंदोलन राज्य के लिए सरदर्द बन चुका था और गद्दीनशी भूस्वामी-बुर्जुआ राज्य landlord-bourgeoisie state यह नहीं समझ पा रहा था और यह उसके वश में भी नहीं रहा कि वह नए भूस्वामी में परिणत हो चुके पुराने जोंकों को कैसे मदद करे। लेकिन इससे भी ज्यादा वह (राज्य) इस बात से चिंतित था कि नए देहाती सर्वहारा वर्ग में परिणत हो चुके कल के भूमिहीन किसानों, जो दलित थे, को क्रांतिकारी चेतना से लैस होने से कैसे रोका जाए।

हम जानते हैं कि अगर नीचे से खुद ये नए सर्वहारा अपनी पार्टी में संगठित हो इनका मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं, जो कि वे दे रहे थे, तो इससे वे क्रांतिकारी चेतना से लैस होंगे और कल हो के वे इस राज्य सत्ता को भी पलट दे सकते हैं। राज्य को यह पता था कि अगर नीचे से ये नए सर्वहारा इन खूंखार भेड़ियों से निपट लेंगे, तो यह उनके लिए खतरे की घंटी साबित होगा।

राज्य के लिए यह जरूरी था कि वह एक तरफ नीचे से इन सर्वहाराओं की हरेक दावेदारी को कुचल दे और उनके संघर्ष को उनके ही खून से रंग दे, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें यह बताया जाए कि यह राज्य खुद दलितों की सुरक्षा के लिए कानून बना रहा है। इसीलिए हम पाते हैं कि जमींदारों ने उस समय इन क़ानूनों का जबर्दस्त विरोध किया था। तब राज्य ने इन खूंखार भेड़ियों को यह समझाया था (इसे हम समझ सकते हैं कि यह 'समझाना' किस तरह हुआ होगा) कि कानून बनने से थोड़ी बहुत दिक्कत होगी, लेकिन आखिर इसे लागू करने का काम तो उनके जरखरीद राज्य मशीनरी को ही तो है! उसके सामने जमींदारी कानून को किस तरह जमींदारों के पक्ष में लागू किया और किस तरह वास्तविक किसानों को जमीन से बेदखल करवाया गया, इसका अनुभव और उदाहरण मौजूद था।

यानी राज्य ने, देखा जाए तो, उन दिनों जो प्रतिरोध की ज्वाला भड़की थी, उसे शांत करने के लिए और समग्रता में पूरे क्रांतिकारी आंदोलन को राज्य प्रायोजित सुधारों के vortex में खींच ले आने के लिए राज्य संपूर्णता में जो कार्यक्रम चला रहा था, जिसमें 'जमींदारी उन्मूलन' कार्यक्रम में उसे अपार सफलता भी मिली थी, यह एससी/एसटी एक्ट भी उसी बड़े और समेकित सुधारवादी कार्यक्रम का एक छोटा लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण कलपुर्जा था और व्यवहार में ठीक यही साबित हुआ।

याद कीजिए, यह वह दौर भी है, जब देश में "सामाजिक न्याय" के आंदोलन का श्रीगणेश होता है और बिहार में लालू प्रसाद और पूरे देश में इन्हीं जैसे नेताओं की एक बड़ी फौज राजनीति में प्रवेश करती है और कराई जाती है।

आज जब क्रांतिकारी आंदोलन पीछे हटा है और "सामाजिक न्याय" का आंदोलन क्रांतिकारी आंदोलन ही नहीं संशोधनवादी आंदोलन को भी निगल चुका है, जब सोवियत यूनियन के ढहने के बाद एक विपर्यय काल चल रहा है, तो आज राज्य खुलकर नग्न रूप में सामने आ रहा है। यह तमाम विगत सुधारों के एक-एक कर छीने जाने का काल है। यह तमाम 'जनपक्षीय' क़ानूनों को एक-एक कर रौंदे जाने का काल है। यह न्याय की किसी भी अवधारणा को राज्य द्वारा खुले तौर पर तिलांजलि दिये जाने के काल है।

संक्षेप मे, यह पूँजी की खुली, नंगी और आतंकी तानाशाही यानी फासीवाद का काल है, दौर है। एससी/एसटी एक्ट पर यह हमला इसी की एक कड़ी में एक और मिशाल है। और चूंकि यह हमला उस पूरे दौर की उपलब्धियों पर पानी फेरता है, हमारी उस लड़ाई के इतिहास को नकारता है, सबसे बढ़कर उन दिनों पैदा हुई हमारी आज़ादी की ऐतिहासिक भावना और सोच व विचारधारा को चुनौती देता है, इसलिए और मुख्यतः ठीक इसीलिए इसका जोरदार प्रतिकार जरूरी है। लेकिन निस्संदेह यह प्रतिकार क्रांतिकारी तरीके से होना चाहिए, नहीं तो हम स्वयं अपने उस क्रांतिकारी इतिहास को, जिसके दौरान हम बिना कानून के ही उन आततायियों की बर्बरता का उसी की भाषा में जवाब दिया था, नकार देने का काम करेंगे।

इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि एससी/एसटी एक्ट में जो प्रतिगामी संशोधन किए गए हैं, उनका विरोध जरूर किया जाना चाहिए, बल्कि यहाँ तक कि इस लड़ाई को हमें जीतना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि यह आगे और बड़े फासिस्ट हमले का यह संकेत है। यह उसकी पूर्व पीठिका है। हम यह पहले ही कह चुके हैं कि आगे हमे कम्युनिस्ट विरोधी कानून के लिए भी तैयार रहना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का इस फैसले ने हमे यह एहसास करा दिया है कि वह दिन अब दूर नहीं है। यह अलग बात है कि ठीक तब से ही इनके भी अंत का दिन और करीब आ जाएगा। खैर, अभी उस पर नहीं।

लेकिन यह सच है कि हमें साथ में यह भी समझ लेना चाहिए कि महज़ कानून के जरिये ही पूंजीवादी व्यवस्था में गरीबों, दलितों और उत्पीड़ितों की रक्षा की गारंटी करने की बात सोचना गलत होगा। स्वयं इस कानून के बनने का इतिहास इसके विरुद्ध है। फिर जितने दिनों तक यह कानून बना रहा, और आज भी है, इसका अनुभव भी हमें बताता है कि यह सोचना निरी मूर्खता होगा कि इस बेजान कानून (एससी/एसटी एक्ट) की, जब इसे लगभग खत्म किया जा रहा है, तो किसी तरह से पूजा अर्चना की जाए और इसके होने से सुरक्षा का भ्रम किसी भी तरह से निर्मित किया जाए। यह निश्चय ही प्रतिक्रियावादी होगा, जैसा कि साथी एम.के. आज़ाद ने कहा है।

अगर एससी/एसटी एक्ट में किए गए संशोधन के खिलाफ हमारी लड़ाई के तौर-तरीके से यानी हमारे किसी प्रयास से ऐसा होता है कि हम कानून पर उनके भरोसे का पर्दाफाश करने के बदले उसे बनाए रखने में मदद पहुँचाते हैं, या मदद पहुँच जाता है या उस भरोसे को घटाने के बदले उसे बढ़ाने में हम सहायक हो जाते हैं, तो यह गलत कार्यनीति होगी इसमें कोई संदेह नहीं रहना चाहिए। हमे एससी/एसटी एक्ट में किए गए जन-विरोधी संशोधन का विरोध करते हुए हमे यह बात खुलकर रखनी चाहिए कि न तो अब तक किसी कानून से गरीब और मेहनतकश दलितों की रक्षा हुई है और न आगे होगी।

साथी एम.के. आज़ाद का यह कहना बिल्कुल सही है कि "1989 में बने एससी/एसटी एक्ट आने के बाद भी यह खत्म नहीं हुई है और न हो सकती है क्योकि सामाजिक विषमता का मुख्य आधार निजी सम्पति जनित विषमता आज भी हमारे समाज में बनी हुई है।..सामाजिक विषमता का मुख्य आधार निजी सम्पति जनित विषमता को दूर किये बिना सिर्फ क़ानून बना कर इस व्यवस्था के दायरे में दलित उत्पीड़न दूर करने की बात करना, या ऐसा सोचना न सिर्फ कोरी कल्पना के सिवा कुछ नहीं है बल्कि यह घोर प्रतिक्रियावादी भी है और विशाल सर्वहारा बहुजन दलितों के हित के खिलाफ भी है।"

पूंजीवाद में आखिर किस कानून का दुरुपयोग नहीं होता

ठीक इसी बात को ध्यान में रखते हुए सर्वहारा जन मोर्चे के द्वारा जारी पर्चे में यह लिखा गया है कि – "सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पीछे यह तर्क नजर आता है कि इस कानून का दुरुपयोग हुआ है। लेकिन यह तर्क गलत है। पूंजीवाद में आखिर किस कानून का दुरुपयोग नहीं होता है? तो क्या उन सभी कानूनों को भी खत्म किया जा सकता है? सबसे ज्यादा दुरुपयोग 'संपत्ति रखने के अधिकार' का हुआ है, और इस कानून का उपयोग करके बड़ा पूँजीपति वर्ग ने अमीरी-गरीबी की एक ऐसी खाई बना दी है कि यह समाज ही रहने लायक नहीं रह गया है। इससे बड़ा और कोई दूसरा अपराध आज नहीं है। इसी खाई के कारण पूरी मानवता कराह रही है। तो क्या सुप्रीम कोर्ट हमारी इस मांग को मानेगी कि 'संपत्ति रखने के कानून' को रद्द कर दिया जाए? हम मानते हैं कि आज तक सबसे ज्यादा आपराधिक दुरुपयोग अगर किसी कानून का हुआ है, तो इसी कानून का हुआ है। इसका दुरुपयोग करते हुए पूँजीपति वर्ग ने शोषण का ऐसा मानवद्रोही जाल बिछाया है जिससे निकलना आज असंभव हो गया है।

अगर सुप्रीम कोर्ट को इस बात का बड़ा फिक्र है कि कानूनों के दुरुपयोग को रोका जाए तो उसे सबसे पहले पूँजीपतियों के पक्ष में खड़े 'संपत्ति रखने के कानून' मे बदलाव करे या इसे खत्म ही कर दे या कम से कम इस पर सीलिंग लगा दे।"



पर्चे के अन्य हिस्सों में यह ज़ोर देकर कहा गया है कि जब तक पूंजीवादी व्यवस्था रहेगी तब तक दलितों पर अत्याचार कभी खत्म नहीं होगा। पर्चे में लिखा गया है कि "ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम इनका डटकर मुक़ाबला करें। और इसके लिए जरूरी है कि हम इनके धार्मिक और झूठे झांसे में ना आयें और अपने असली दुश्मन को पहचानें। हमारा असली दुश्मन यह पूंजीवादी व्यवस्था है जो लोगों के बीच फूट पैदा करती है, जो हमें रोजगार नहीं दे सकती, जिसकी न्याय व्यवस्था सिर्फ अमीर और ताकतवर लोगों के लिए है, जिस व्यवस्था में अनाज होते हुए भी लोग भूख और कुपोषण से मरते हैं, जहाँ स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव में लोगों की जिंदगियां नर्क बन गयी हैं, जहाँ औरतें घरों में भी सुरक

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