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Google Doodle Honours Writer Amrita Pritams 100th Birthday

अमृता प्रीतम : पंजाब रत्न ही नहीं वो भारत रत्न थीं

भारतीय साहित्य जगत की महान विभूति अमृता प्रीतम की 100 वीं जयंती पर गूगल ने डूडल (Google doodles on Amrita Pritam’s 100th birth anniversary) बनाकर याद किया।

पंजाब के गुजरांवाला, पाकिस्तान में 31 अगस्त 1919 को जन्मी अमृता प्रीतम ने बचपन से ही लेखनी में अपनी धार देना शुरु कर दिया था उनको पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है। उनका पहला संग्रह ‘अमृत लहरें’ (Immortal Waves) 1936 में प्रकाशित हुआ, उस वक्त उनकी उम्र मात्र 16 वर्ष की थी।

1936 में ही अमृता प्रीतम का विवाह प्रीतम सिंह के साथ हुआ। भारत और पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी को उन्होंने करीब से देखा था।

1947 के दंगों में लाखों लोगों की जानें चली गयी थीं। इससे उनका  मन काफी व्यथित हुआ। उनका बचपन पाकिस्तान में ही बीता था इसलिए उनको भारत और पाकिस्तान से समान रूप से लगाव रहा।

बचपन में ही अमृता प्रीतम के सिर से माँ का साया उठ गया था। माँ की मृत्यु के उपरांत उनके जीवन में बहुत अकेलापन आ गया और उन्होंने इस अकेलापन को लेखनी में तब्दील कर दिया और वो उपन्यास, कहानी आदि लिखने लगीं।

विभाजन के बाद अमृता प्रीतम का परिवार 1947 में लौहार से दिल्ली आ गया। अमृता प्रीतम द्वारा लिखित पंजाबी उपन्यास’ पिंजर’ पर 2003 में हिंदी फ़िल्म बनी। फिल्म भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय हिन्दू तथा मुसलमानों की समस्याओं पर फिल्माई गयी है। उनकी कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

साहित्य की हर विधा पर अमृता प्रीतम की पकड़ थी। उपन्यास, कहानी, कविता, निबन्ध संग्रह उनकी रचना के प्रमुख स्तम्भ रहे हैं।

कई पुरस्कार और सम्मान से लबालब प्रीतम का आज 100 वां जन्म दिन साहित्य प्रेमी देश भारत भूल गया, जबकि अमरेकी सर्च इंजन गूगल ने उनको डूडल में स्थान देकर उनको  श्रद्धांजलि अर्पित की है जिसके लिए गूगल को धन्यवाद देना चाहिए।

साहित्य श्रंगार की शिरोमणि की साहित्यिक ऊंचाइयों और सम्मान पर एक झलक डालने से पूर्व उनकी ही कृति से उनको श्रद्धासुमन अर्पित करना उचित होगा।

एक मुलाकात—कई बरसों बाद अचानक एक मुलाकात

हम दोनों के प्राण एक नज्म की तरह कांपे–

सामने एक पूरी रात थी

पर आधी नज्म एक कोने में सिमटी रही

और आधी नज्म एक कोने में बैठी रही

फिर सुबह सवेरे

हम कागज के फ़टे हुए टुकड़ों की तरह मिले

मैंने अपने हाथ में उसका हाथ लिया।

उसने अपनी बांह में मेरी बांह डाली

और हम दोनों एक सेंसर की तरह हंसे

और कागज को एक ठंडे मेज पर रखकर

उस सारी नज्म पर लकीर फेर दी।

साहित्य विभूति अमृता प्रीतम की जीवन यात्रा को शब्दों में समेटना  संभव नहीं हो सकता है क्योंकि वो उस दौर में एक ऐसा उगता हुआ सूरज थीं जिसकी लालिमा के आगे हर रंग और हर रोशनी फीकी पड़ जाती थी। कुछ प्रकाश पुंज जो उनके जीवन को अमर कर देती है। इस प्रकार हैं

जन्म—–31 अगस्त 1919 गुजरांवाला,पाकिस्तान

1947 में लाहौर से भारत आई और दिल्ली में बस गए।

प्रथम संग्रह—-अमृत लहरें (Immortal Waves)

विवाह—1936 प्रीतम सिंह

पुरस्कार–1957 साहित्य अकादमी पुरस्कार (इस पुरस्कार को जीतने वाली पहली महिला साहित्यकार)

पद्मश्री–1969

ज्ञानपीठ पुरस्कार–1980-81 में “काजल और कैनवास” संकलन के लिए दिया गया।

पदम् विभूषण–2004

मानद उपाधियां–डी लिट् दिल्ली विश्वविद्यालय(1973)

जबलपुर विश्वविद्यालय (1973) तथा विश्व भारती द्वारा भी सन 1987 में डीलिट् की मानद उपाधि दी गयी।

रचनाएँ—-

उपन्यास– 1-डॉक्टर देव 2-कोरे कागज, उनचास दिन

3-धरती सागर और सीपें 4-रंग का पत्ता 5-दिल्ली की गलियां

6-तेरहवां सूरज 7-यात्री 8-विलावतन 9..पिंजर 10-पक्की हवेली 11-अग दा बूटा 12-अग दी लकीर 13- कच्ची सड़क

14-कोई नहीं जानदा 15-उन्हीं दी कहानी।

कविता संग्रह–लोक पीड़ ,लामियाँ वतन,कस्तूरी सुनहरे(साहित्य पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह  तथा तै कैनवस के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला) कुल 18 कविता संग्रह

गद्य- किरमिची लकीरें,काला गुलाब,अग दियाँ लकिरा,औरत:एक दृष्टकोण, कच्चे अखर, अपने-सोने चार वरे।

आज अमृत लहरें के लेखक की 100वीं जयंती है और ओ हमेशा अमर हो चुकी हैं। आश्चर्य होता है कि क्यों तुलसीदास ने ऐसा लिखा होगा कि- “ढोल गंवार ,शूद्र, पशु और नारी सब ताड़न के अधिकारी”100 पुस्तकें जिन्होंने लिखी और भारत ही नहीं विश्व के अन्य देशों में भी उनकी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय हुई। 1979 में बुल्गारिया ने वत्सराय पुरस्कार से उनको शुशोभित किया। साहित्य के क्षेत्र के साथ-साथ उनको 1986 में राज्य सभा के लिए भी चुना गया। साहित्य लेखन के साथ-साथ आपने दो सन्तानों की भी परवरिश बहुत अच्छे तरीके से की। हालांकि इनका दाम्पत्य जीवन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका। पति से तलाक हो गया मगर आपने लेखन से कभी तलाक नहीं लिया और  अंतिम सांसों तक अपनी कलम को रुकने नही दिया।

साहित्य और संघर्ष का ये सूरज 31 अक्टूबर 2005 को दिल्ली ने  अस्त हो गया। मगर उसकी रोशनी हमेशा याद रहेगी।

आई पी ह्यूमन

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