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विशुद्ध प्रतिशोध की फिल्‍म है Anaarkali of Aarah

अभिषेक श्रीवास्तव

देख आए Anaarkali of Aarah। फिल्‍म देखने के बाद से स्‍तब्‍ध हूं। वजह उसका आखिरी शॉट है। बहुत भारी है। तकरीबन उस तिरछी मुस्‍कान के जैसा, जो 'गैंग्‍स ऑफ वासेपुर' में रामाधीर सिंह की देह में ताबड़तोड़ गोलियां उतारने के बाद फ़ैजल खान के चेहरे पर तैर जाती है। अहा…! वह संतोष बदला लेने का, प्रतिशोध का, वह भीतरी हुमक! इसे वही समझ सकता है जिसने किसी से बदला चुकाया हो। इसमें अनारकली गोली नहीं मारती, भरी महफि़ल में गोला गिरा देती है। यह गोला धक् से जाकर‍ लगता है। अकेले धर्मेंद्र चौहान के सीने पर नहीं, हमारे सामूहिक मेल ईगो पर। मेरी समझदारी कहती है कि इसमें कहानीकार की काबिलियत अनारकली की गढ़न नहीं है। चौहान की गढ़न में है। ऐसे खलनायक अब दुर्लभ हैं।

दरअसल, यह फिल्‍म अस्‍सी के दशक की सेंसिटिविटी से निकली है। वासेपुर भी साठ-सत्‍तर के दौर की कहानी थी। उस दौर में खलनायक सब कुछ करता था, लेकिन उसे अपनी सामाजिक शर्मिंदगी से बहुत डर लगता था। आज वाली निपट बेहयाई उसमें नहीं थी। जिस तरीके से चौहान मफलरवा से रात की घटना का विवरण पूछने को बेचैन दिखता है, यह बताता है कि उसे अपनी इज्‍जत की चिंता है। अनारकली इसी इज्‍जत को तार-तार करती है। इज्‍जत का बदला इज्‍जत से- कानून से नहीं, जान से नहीं। हिसाब बराबर। इसीलिए मैं कहूंगा कि इस फिल्‍म को महिला सशक्‍तीकरण आदि के मुहावरे में नहीं बांधना चाहिए। यह विशुद्ध प्रतिशोध की फिल्‍म है, बावजूद इसके कि अंत में इसका केंद्रीय भाव 'पिंक' के आइडिया से जाकर एकमेक जाता है।

बाकी, फिल्‍म में इस्‍तेमाल मुहावरों और द्विअर्थी संवादों को वही समझेगा जो उस ज़मीन से आता है। लाल किले का जटिल बिंब पकड़ना या कढ़ाई, तेल और पूड़ी-हलवा का संबंध समझना दिल्‍लीवालों के बस की बात नहीं है। Pankaj Tripathi हमेशा की तरह फिट हैं। Sanjay mishra के लिए यह फिल्‍म पुनर्जन्‍म जैसी है। मंडी हाउस पर घूमते हुए अकसर मिल जाने वाले Dilip Gupta को पहली बार इतना काम मिला है कि वे पहचान में आ गए हैं। यह अच्‍छी बात है।

रही Swara Bhaskar की बात, तो उनके बगैर इस फिल्‍म की परिकल्‍पना नामुमकिन-सी लगती है। बचे Avinash Das, तो उनके बारे में क्‍या ही कहा जाए। इतनी परफेक्‍ट फिल्‍म में एक ब्‍लंडर तो बनता ही था जो उन्‍होंने देश के लिए कर दिया। याद करिए युनिवर्सिटी के प्रोग्राम में नाच से पहले की गई घोषणा- उसमें संस्‍थान का नाम बोला गया है 'वीर कुंवर सिंह विश्‍वविद्यालय' जबकि नाम कुंवर नहीं 'कुबेर' था। वीर कुंवर सिंह की धरती पर इसी बहाने उन्‍हें याद तो कर लिया गया!

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