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हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है

पलाश विश्वास

बौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है, इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है। रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है।

14 मई के बाद हमारी दुनिया सिरे से बदल गयी है और इससे पहले भारत में नस्ली अंध राष्ट्रवाद जैसा कुछ नहीं था या सत्ता समीकरण के सोशल इंजीनियरिंग से मनुस्मृति शासन का अंत हो जायेगा और समता और न्याय का भारततीर्थ का पुनर्जन्म होगा, ऐसा मानकर जो लोग नस्ली विषमता, घृणा,  हिंसा और नरसंहार संस्कृति की मौजूदा व्यवस्था बदलने का ख्वाब देखते हैं, उनके लिए निवेदन है कि किसी भी तरह का कैंसर अचानक मृत्यु का कारण नहीं होता और बीज से वटवृक्ष बनने की एक पूरी प्रक्रिया होती है।

1980 के दशक से या फिर 1970 के दशक नक्सल समय के दौरान दक्षिण पंथी ताकतों के ध्रुवीकरण से सिर्फ सत्ता समीकरण बदला है, कोई नई शुरुआत नहीं हुई है।

बेहतर हो कि बंगालियों के साहित्य सम्राट ऋषि बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंदमठ को एकबार फिर नये सिरे से पढ़ लें, कम से कम उसका अंतिम अध्याय पढ़ लें, जिसमें दैववाणी होती है कि म्लेच्छों के शासन के अंत के बाद जबतक हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी का राज जारी रहना चाहिए।

बंकिम ने 1857 की क्रांति के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म होने के बाद महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के तहत भारत के सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश बन जाने के बाद बंगाल के बाउल फकीर संन्यासी आदिवासी किसान विद्रोह को सन्यासी विद्रोह में समेटते हुए इस उपन्यास का प्रकाशन 1882 में किया था।

भारतीय नस्ली वर्चस्व के मनुस्मृति राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र के भौतिकी और रसायनशास्त्र को ठीक से समझने के लिए बंकिम के आनंदमठ का पाठ अनिवार्य है।

वंदेमातरम राष्ट्रवाद मार्फत भारतमाता की परिकल्पना में बंकिम ने 1882 में ही हिंदू राष्ट्र की स्थापना कर दी थी और इस वंदे मातरम राष्ट्रवाद का अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना और मनुस्मृति विधान की बहाली है।

रवींद्र नाथ मनुष्यता के धर्म, सभ्यता के संकट जैसे निबंधों, रूस की चिट्ठियों,  चंडालिका, रक्त करबी और ताशेर घर जैसी नृत्य नाटिकाओं, राजर्षि जैसे उपन्यास और बाउल फकीर प्रभावित अपने तमाम गीतों और गीतांजलि के माध्यम से हिंदुत्व के इसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध की जमीन बहुजन, आदिवासी, किसान आंदोलन की साझा विरासत के तहत बनाने की निरंतर कोशिशें की है।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही आदिवासियों का है, जितना गैर आदिवासियों का।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण पठान मुगल सभ्यताओं का है जितना कि वैदिकी और आर्य सभ्यता का।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही मुसलमानों, बौद्धों, ईसाइयों, सिखों, जैनियों और दूसरे गैर हिंदुओं का है जितना कि बहुसंख्य हिंदुओं का।

नव जागरण क दौरानसती प्रथा के अंत और विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा के लक्ष्य में सबसे ज्यादा सक्रिय ईश्वर चंद्र विद्यासागर पर बार बार कट्टर हिंदुत्ववादियों के हमले होते रहे। बंगाल का कट्टर कुलीन ब्राह्मण सवर्ण समाज उनके खिलाफ संगठित था लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज में वे विद्यासागर के वध में उसतरह कामयाब नहीं हुए जैसे कि स्वतंत्र भारत में हिंदू राष्ट्र के झंडेवरदारों ने गांधी की हत्या कर दी और अब जैसे दाभोलकर, पानसारे, कुलबर्गी, रोहित वेमुला और गौरी लंकेश की हत्याओं के साथ सात गोरक्षा तांडव में देश भर में आम बेगुनाह नागरिकों की हत्याएं हो रही हैं। वध का इस विशुद्ध कार्यक्रमयह सिलसिला चैतन्य महाप्रभू और संत तुकाराम,  गुरु गोविंद सिंह की हत्याओं के बाद कभी थमा ही नहीं है। संत कबीर पर भी हमले होते रहे और उस हमले में हिंदुत्व और इस्लाम के कटट्रपंथी साथ साथ थे।  जैसे रवींद्र के खिलाप, लालन फकीर के खिलाफ हिंदुत्व और इस्लाम के  कट्टरपंथी मोर्चांबद हैं।

इसी तरह मेघनाथ वध लिखकर राम को खलनायक बनाने वाले माइकेल मधुसूदन दत्त और ब्रह्मसमाज आंदोलन के संस्थापक राजा राममोहन राय के खिलाफ कट्टर हिंदुत्ववादी हमेशा सक्रिय रहे हैं।

जिस तरह आज अंध विश्वास और कुसंस्कारों को वैदिकी सभ्यता और विशुद्धता के जरिये वैज्ञानिक बताकर कारपोरेट कारोबार का एकाधिकार कायम करने का सिलसिला तकनीकी डिजिटल इंडिया का सच है, उसी तरह उनीसवीं सदी के आठवें दशक में युवा रवींद्रनाथ के समय विज्ञानविरोधी अवैज्ञानिक प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व का महिमामंडन अभियान तेज होने लगा था।

हिंदी पत्रकारिता के मसीहा के नेतृत्व में सतीप्रथा से लेकर श्राद्धकर्म और विविध वैदिकी संस्कारों के महिमामंडन के अस्सी के दशक में हिंदी के एक राष्ट्रीय अखबार के विज्ञानविरोधी हिंदुत्व अभियान को याद कर लें तो उनीसवीं सदी के उस सच को महसूस सकते हैं।

हिंदू समाज की तमाम कुप्रथाओं और उसकी पितृसत्तात्मक नस्ली वर्चस्व के खिलाफ एक तरफ नवजागरण और ब्रह्मसमाज आंदोलन तो दूसरी तरफ आदिवासियों और किसानों के जल जंगल जमीन के हकहकूक को लेकर जमींदारों, ईस्ट इंडिया कंपनी और सवर्ण भद्रलोक समाज के खिलाफ एक के बाद एक जनविद्रोह और उसके समांतर पीरफकीर बाउल वैष्णव बौद्ध विरासत के तहत बहुजनों का एकताबद्ध आंदोलन – बौद्धमय भारत के अवसान के बाद मनुस्मृति व्यवस्था की पितृसत्ता और नस्ली वर्चस्व को इससे कठिन चुनौती फिर कभी नहीं मिली है।

इसी की प्रतिक्रिया में वैदिकी धर्म कर्म संस्कार विधि विधान की वैज्ञानिक व्याख्याएं प्रस्तुत करने का सिलसिला शुरु हुआ और वैदिकी साहित्य का पश्चिमी देशों में पश्चिमी भाषाओं में महिमामंडन का कार्यक्रम भी शुरु हुआ।

वैज्ञानिक हिंदू धर्म के नाम से हिंदुत्व के पुनरूत्थान के इस आंदोलन में तबके पढ़े लिखे लोग भी उसीतरह प्रभावित हो रहे थे, जैसे आज पढ़े लिखे तकनीक समृद्ध शहरी कस्बाई लोगों के अलावा मोबाइल टीवी क्रांति से संक्रमित भारत के व्यापक ग्रामीऩ शूद्र, दलित, आदिवासी समाज, स्त्रियां, किसान और मेहनतकश नरसंहारी संस्कृति के संस्थागत फासीवादी नाजी सेना में शामिल हैं।

शशधर तर्कचूड़ामणि, कृष्ण प्रसन्न सेन और चंद्रनाथ बसु जैसे प्रकांड विद्वान लोग इस अवैज्ञानिक विज्ञान विरोधी मनुस्मृति विधान के महिमामंडन का वैज्ञानिक हिंदू धर्म अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।

गोमूत्र से लेकर गोबर तक के वैज्ञानिक महिमामंडन के मौजूदा अभियान की तरह तब भी हिंदुओं के चुटिया और तिलक की वैज्ञानिक व्याख्याएं जारी थीं।

तब भी अत्याधुनिक वैज्ञानिक खोजों, नई चिकित्सा पद्धति और नई तकनीक को वैदिकी सभ्यता के आविस्कार बताने की होड़ मची थी। तभी विमान आविस्कार को रामायण के पुष्पक विमान के मिथक से खारिज करते हुए उसे भारतीय वैदिकी सभ्यता की देन बताया जाने लगा था। आज भी विज्ञानविरोधी बाबा बाबियों की बहार है।

वैज्ञानिकों के मुकाबले त्रिकालदर्शी सर्वशक्तिमान मुनि ऋषियों के हिंदुत्व क हथियार से सामाजिक बदलाव के विरुद्ध नवजागरविरोधी बहुजन विरोधी वैज्ञानिक हिंदूधर्म वैसा ही आंदोलन बन गया था जैसे कि मंडल के खिलाफ कमंडल आंदोलन सा सामाजिक न्याय और समानता के बहुजन आंदोलन का हिंदुत्वकरण अस्सी के दशक से आज खिलखलिता हुआ कमल है।

इस अवैज्ञानिक हिंदुत्ववादी नस्ली विमर्श के खिलाफ सभी विधाओं और सभी माध्यमों से रवींद्रनाथ तह वैज्ञानिक दृष्टि के साथ अकेले लड़ रहे थे।

तभी उन्होंने लिखाः

টিকিটি যে রাখা আছে তাহে ঢাকা

ম্যাগনেটিজম্ শক্তি৷

তিলকরেখায় বিদু্যত্ ধায়

তায় জেগে ওঠে ভক্তি

उनकी जो चुटिया है, उसमें छुपी है

चुंबकीय शक्ति

तिलकरेखा में विद्युत बहे

इसी में जागे भक्ति

वेद में लिखा सबकुछ सच है और वैदिकी साहित्य ही सच और विज्ञान की कसौटी है, वैदिकी साहित्य और उपनिषदों के स्रोंतों का इस्तेमाल करते हुए रवींद्रनाथ ने अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदुत्व के इस पुनरूत्थान का प्रतिरोध किया और गैर वैदिकी स्रोंतों से प्रतिरोध का साहित्य रचा। उनके गीत, उनकी नृत्यनाटिकाएं वैज्ञानिक हिंदू धर्म के नस्ली वर्चस्व और मनुस्मृति विधान के खिलाफ अचूक हथियार बनते रहे।

जाहिर है कि यह अचानक नहीं है कि महज सोलह साल की उम्र में रवींद्रनाथ ने छद्मनाम भानुसिंह के साथ भानुसिंहेर पदावली लिखकर उत्तर भारत के संत आंदोलन से अपने को जोड़ लिया। अपने बचपन और कैशोर्य में वे नवजागरण और ब्रह्मसमाज के खिलाफ कट्टर हिंदुत्वादियों की मोर्चाबंदी को ब्रह्समाज आंदोलन के केंद्र बने अपने घर जोड़ासांकु से बहुत नजदीक से देख रहे थे रवींद्रनाथ।

मृत्यु से पहले तक रवींद्रनाथ इन्हीं तत्वों के हमलों का निशाना बनना पड़ा और मरने के बाद आज तक वे उन्हीं के निशाने पर हैं।  

संघ परिवार ने बंकिम के वंदेमातरम राष्ट्रवाद को संस्थागत संगठन और सांस्कृतिक राजनीति के माध्यम स्वतंत्र भारत का सत्ता समीकरण बना दिया है और इसी वंदेमातरम राष्ट्रवाद के तहत संघ परिवार ने हिटलर का खुल्ला समर्थन किया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम से हिंदुत्ववादियों को अलग रखा है।

हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है।

इस कार्यक्रम को अंजाम देने में मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं और अब उन्ही ताकतों के किसी गटबंधन से रंगभेद के इस स्थाई बंदोबस्त का अंत नहीं हो सकता।

सत्ता वर्ण वर्ग के प्रतिरोध की यह फर्जी कवायद संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे से कम खतरनाक नहीं है।

हिंदुत्व का पुनरूत्थान के साथ हिंदू राष्ट्र का एजंडा का आरंभ राममंदिर आंदोलन से नहीं हुआ है, आदिवासी किसान बहुजन आंदोलनों के खिलाफ भारत के वर्ग वर्ण सत्तावर्ग के वंदेमातरम गठबंधन का इतिहास यही बताता है।

चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन, नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाप हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है। फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अब डिजिटल इंडिया में हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों का राज है।

आज हम औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के पुनरूत्थान और इसके खिलाफ रवींद्रनाथ के प्रतिरोध के बारे में सिलसिलेवार चर्चा करेंगे।  नये सिरे से संदर्भ समाग्री शेयर करने में बाधाएं हैं, इसलिए फिलहाल मेरे फेसबुक पेज पर अब तक जारी संदर्ब सामग्री से ही काम चला लें। 

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