Home » समाचार » सहारनपुर पर मायावती ने मौका गंवा दिया

सहारनपुर पर मायावती ने मौका गंवा दिया

शाहनवाज आलम

सहारनपुर की जातिगत हिंसा से चर्चा में आए भीम आर्मी को लेकर भाजपा और बसपा के बीच चले बयानों का विश्लेषण मौजूदा राजनीतिक माहौल के यथास्थितिवादी पहलू को समझने के लिए अहम है।

गौरतलब है कि भाजपा ने भीम आर्मी जिसने दलितों पर राजपूत संगठनों के हमलों के खिलाफ प्रदर्शन किया था, पर बसपा और मायावती से सम्बंध होने का आरोप लगाया था। इसके साक्ष्य के बतौर खुफिया एजेंसियों की एक गोपनीय रिपोर्ट को आधार बताया गया जिसमें भीम आर्मी और मायावती के भाई आनंद कुमार के बीच सम्बंध और पैसों की फंडिंग का जिक्र किया गया।

इस खबर के आने के दौरान सहारनपुर गईं मायावती ने भाजपा के इस आरोप का खंडन करते हुए कहा कि उनका और उनके भाई का या किसी भी बसपा नेता का भीम आर्मी से कोई सम्बंध नहीं है और भीम आर्मी को खुद भाजपा संचालित कर रही है।

हालांकि यहां यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में खुफिया विभाग के एक बड़े अधिकारी ने ऐसी किसी भी खुफिया जांच रिपोर्ट के वजूद को ही बकवास बता दिया। यानी यह पूरी कवायद सिर्फ बसपा पर दबाव बनाने के लिए की गई थी, जिसमें मायावती फंस भी गईं।

भीम आर्मी को लेकर भाजपा और बसपा के वाकयुद्ध और इसे एक दूसरे का समर्थित संगठन बताने से दो अहम राजनीतिक संदेष प्रेषित होते हैं। पहला, ये दोनों ही पार्टियां किसी भी नए दलित आंदोलन को उसकी स्वयत्तता के साथ स्वीकार नहीं करना चाहतीं। दूसरे, ऐसा करके बसपा यह साबित भी करना चाहती है इस राजपूत या सवर्ण विरोधी संगठन से उसका कोई सम्बंध नहीं है और दलितों पर हमले का बदला लेने वाली भीम आर्मी को खुद भाजपा चला रही है।

यानी भले ही मायावती सहारनपुर में पीड़ित दलितों से मिलने पहुंची हों लेकिन बसपा यहां भाजपा से दलितों पर हमलावर राजपूत संगठन के साथ खड़े होने की होड़ में हैं।

Bhim Army

इस तरह ये दोनों ही संदेश जहां राजनीतिक यथास्थितिवाद के पक्ष में खड़े होते हैं वहीं भाजपा की केंद्र और राज्य दोनों ही जगह सरकार बनने से सवर्णों के पक्ष में झुके सामाजिक संतुलन को ही मजबूत भी करते हैं। यहां बसपा किसी भी कीमत पर अपने को सवर्ण विरोधी या जिसे वो सर्वजन कहती है, के खिलाफ नहीं दिखना चाहती। यह एक तरह से मौजूदा समय में हिंदुत्व की वर्चस्वशाली राजनीतिक डिस्कोर्स पर किसी भी तरह से संदेह न व्यक्त करने की बसपा की कोशिश को दिखाता है।

योगीराज की कृपा : जंतर-मंतर पर दलितों ने लगाए आजादी के नारे

इस तरह इस पूरी बहस में बसपा, अपने अतीत के आईने में और दलितों की बहुत स्वाभाविक पार्टी होने के बावजूद भी ‘धारणा’ (परसेप्शन) के युद्ध में भाजपा से हार ही नहीं गई है बल्कि उसने अपनी इस सीमा को भी उजागर कर दिया है कि विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार, जिसका मुख्य कारण दलितों के एक बड़े हिस्से का भाजपा की तरफ चला जाना था, के बावजूद वो अपने समाज के सामंती यथास्थितिवाद को चुनौती देने की आंकाक्षा की राजनीतिक वाहक बनने को नहीं तैयार है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि दलितों के आक्रोश के कारण अनुकूल माहौल के बावजूद बसपा ने सहारनपुर के जरिए मिले मौके को गंवा दिया है। अगर वह भीम सेना के पक्ष में एक बयान भी दे देतीं या कम से कम उसकी आलोचना नहीं करतीं तो स्थितियां उनके पक्ष में होतीं।

BhimArmy

बहनजी बोलीं- 'भीम आर्मी' भाजपा के संरक्षण में पलने वाला संगठन

दरअसल, इस घटनाक्रम में हमें यह भी याद रखना होगा कि हिंदुत्ववादी वैचारिकी को चुनौती देने वाली भीम आर्मी से किनारा कसने से ठीक पहले बसपा ने अपने सबसे पुराने नेताओं में से एक और पार्टी के मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को भी पार्टी से निकाल दिया था। बसपा कैडरों में इसे इस आधार पर उचित बताया गया कि नसीमुद्दीन के कहने पर ही मायावती ने लगभग 100 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे जिससे पार्टी की छवि मुस्लिम परस्त की बन गई थी। हालांकि बाहरी तौर पर इसे भ्रष्टाचार का जामा पहनाने की कोशिश की गई, लेकिन बसपा में भ्रष्टाचार भी कोई मुद्दा है यह शायद ही कोई माने।

जातिगत अत्याचारों से बचने के लिए दलित अपना रहे हैं बौद्ध धर्म और इस्लाम

अगर हम नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर बसपा को मुस्लिम परस्त पार्टी बनाने के आरोप और हिंदुत्व को चुनौती देने वाली भीम आर्मी पर बसपा के स्टैंड को एक कड़ी में जोड़ कर देखें तो इससे बसपा की मौजूदा वैचारिक दिशा और स्पष्ट हो जाती है। बसपा किसी भी तरह अपने को हिंदुत्व के वृहत दायरे से अलग नहीं दिखाना चाहती है। उसे डर है कि अगर वह कहीं से भी सवर्ण-सामंती गठजोड़ की विरोधी और मुसलमानों की हितैषी दिखेगी तो वह अप्रासंगिक हो जाएगी। पहली स्थिति में जहां उसे सवर्ण हिंदुओं का वोट नहीं मिलेगा जिसे उसने 2007 में सम्भव बना लिया था तो वहीं दूसरी स्थिति में उसे मुस्लिम विरोधी मानसिकता से ग्रस्त दलितों का ही वोट नहीं मिलेगा।

दरअसल बसपा अभी भी नहीं समझ पायी है कि रोहित वेमुला से लेकर उना आंदोलन के बाद दलितों में भाजपा के खिलाफ पैदा हुए राष्ट्रव्यापी आक्रोश के बावजूद अगर दलितों ने उसे यूपी में वोट नहीं दिया तो उसकी एक बड़ी वजह ऐसी घटनाओं पर उसका ढुलमुल रवैया रहा है। उसने दलितों के सामने हिंदुत्व के वैचारिक विकल्प के बतौर अपने को पेश करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं दिखाई।

सहारनपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ, वो तो अगले पांच हज़ार साल और होना है..क्योंकि

सपा भी बसपा के हिंदुत्ववादी सिंड्रोम से ग्रस्त

Bhim armyवहीं अगर दूसरे विपक्षी दल सपा के स्टैंड को देखें तो उसने भी सिर्फ सहारनपुर मामले को प्रशासनिक विफलता के बतौर ही दर्ज कराया। किसी जमाने में 85 बनाम 15 की बहस से खड़ी हुई पार्टी ने इसे दलितों पर हिंदुत्ववादी हमला कहने की हिम्मत नहीं की। जाहिर है यहां सपा भी बसपा के हिंदुत्ववादी सिंड्रोम से ग्रस्त है। यही वजह है कि दलितों और वंचित समुदायों में योगी सरकार से जबरदस्त नाराजगी के बावजूद भाजपा को सहारनपुर जैसी घटनाओं से कोई तात्कालिक राजनीतिक नुकसान नहीं दिख रहा है।

सहारनपुर के हवाले से जाति के विनाश की पहल की जा सकती है

भाजपा की बी और सी टीमें ही हैं सपा और बसपा

सपा और बसपा में अपने जातिगत जनाधारों पर हिंदुत्ववादी हमले के बावजूद हिंदुत्व को चुनौती दे पाने में झिझक के कारण इन दोनों पार्टियों के प्रति उनके सबसे बड़े वोट बैंक मुसलमानों में भी इनके प्रति चुनाव पूर्व से चला आ रहा संदेह और पुख्ता हुआ है कि ये भाजपा की बी और सी टीमें ही हैं।

इस तरह भाजपा के खिलाफ हिंदुओं के वंचित समुदायों और मुसलमानों के बीच रणनीतिक एकता की पर्याप्त सम्भावना के बावजूद कोई विकल्प बनता नहीं दिख रहा है।

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: