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नर्मदा बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ दैवी सत्ता का आवाहन, हिटलर की आर्य विशुद्धता का सिद्धांत और नरहसंहार कार्यक्रम

रवींद्र का दलित विमर्श-27

ताशेर देश : मनुस्मृति व्यवस्था के फासीवाद पर तीखा प्रहार

पलाश विश्वास

नर्मदा बांध के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के आंदोलन का दमन का सिलसिला जारी रखते हुए आज इसे देश के नाम समर्पित करते हुए दावा किया गया कि इसके निर्माण में विदेशी कर्ज की जगह मंदिरों के धन का इस्तेमाल किया गया है। यह दावा किसान आदिवासी विरोधी नर्मदा घाटी की पूरी आबादी को डूब में शामिल करने वाले इस विध्वंसक निर्माण कार्य को धर्म और धर्म स्थल से जोड़ने का विशुद्ध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का आवाहन है जिसके तहत प्रकृति और मनुष्यविरोधी इस बड़े बांध के निर्माण का विरोध करने वालों को जनमानस में राष्ट्रद्रोही बनाया जा सके।

हमने रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या और उनके मानवाधिकार हनन को समर्थन करने के पश्चिमी धर्मयुद्ध से जनमे राष्ट्रवाद की चर्चा करते हुए राजसत्ता के दैवीसत्ता में बदल जाने की चर्चा की है। नर्मदा बांध में इसी दैवी सत्ता का आवाहन किया जा रहा है।

रवींद्र नाथ के तासेर घर की फंतासी को रवींद्र के अंध राष्ट्रवाद के विरोध के मद्देनजर फासीवाद के विरोध के रुप में देखा जाता है। विचारधारा के तहत मनुष्यों को अनुशासित सैन्यदल या ताश के पत्तों में बदल देने की फासिस्ट राष्ट्रवाद के खिलाफ यह प्रतिरोध है।

हम मजहबी राजनीति में इस तरह जनसमुदायों को वोटबैंक राजनीति के तहत कार्ड और ट्रंप कार्ड में तब्दील होते देख रहे हैं। इस सिलसिले में हम ओबीसी ट्रंप कार्ड की चर्चा करते रहे हैं तो दलित और मुसलमान ट्रंप कार्डों का चलन शुरू से हो रहा है।

आज भी हम मजहबी सियासत और फासिज्म के राजकाज में मनुष्यों को पैदल सेनाओं में तब्दील होते हुए देख रहे हैं और कार्ड बनते जाने की नियति आज आधार कार्ड से लेकर आटोमेशन,आर्टिफिशियल टैलेंट और रोबोटिक्स का डिजिटल इंडिया का घनघोर वास्तव है जहां नागरिक और मानवाधिकार,मनुष्यता,सभ्यता और नागरिकता निषिद्ध है तो कुलीनों के सिवाय बाकी जनता वध्य है और पूरा देश एक अनंत वधस्थल है। लेकिन ताश के घर में जिस द्वीप राष्ट्र की बात की जा रही है,वहीं की रेजीमेंटेड जनगण की तरह इस नरसंहार संस्कृति के विरुद्ध सन्नाटा है और जीवन यापन उसी विशुद्धता के मनुस्मृति विधान को सख्ती से मानकर चलना है।

फिर भी इसमें वर्णव्यवस्था के नस्ली राष्ट्रवाद और मनुस्मृति व्यवस्था का जो खुल्ला विरोध रवींद्र नाथ ने किया है, उस पर कहीं चर्चा उसी तरह नहीं होती जैसे कि चंडालिका और रक्तकरबी में अस्पृश्यता के खिलाफ मनुष्यता के मुक्तिसंग्राम के बारे में कोई विमर्श नहीं है। चंडालिका में बौद्ध दर्शन की चर्चा होती है तो रक्तकरबी में स्वतंत्रत्रा संघर्ष की चर्चा होती है,लस्ली वर्चस्व की सामाजिक विषमत और इसके विरुद्ध न्याय और समानता के लिए रवींद्र नाथ की रचनाधर्मिता की नहीं।

1933 में इस नृत्यनाटिका का प्रकाशन हुआ और 1933 में ही हिटलर का जर्मनी के शासक के रुप में अभ्युत्थान हुआ लेकिन यहूदियों और कम्युनिस्टों के सफाये के घोषित लक्ष्य को लेकर हिटलर ने नाजी पार्टी की स्थापना 1923 में ही कर दी थी। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार के लिए हिटलर ने यहूदियों को उसीतरह जिम्मेदार ठहराया,जिस तरह भारत में ब्रिटिश हुकूमत का साथ देनेवाले हिंदुत्ववादियों की भूमिका को सिरे से नजरअंदाज करके भारत विभाजन के लिए भारत में संस्थागत फासिस्ट रंगभेदी नस्ली राजनीति मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराती है।

जिस तरह अच्छे दिन के वायदे और नये खुशहाल बारत के निर्माण के वायदे से भारत में फासिज्म की सत्ता मनुस्मृति व्यवस्था नये सिरे से चलाने में कामयाब हो रही है,ठीक उसीतरह पश्चिम के धर्मयुद्ध मार्फत दैवीसत्ता बहाल करने के नाजी फासी विशुद्धता की विचारधारा के तहत हिटलर ने जर्मनी को आर्थिक संकट से उबारकर उसका कायाकल्प के तहत युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद के तहत जर्मन जनता का समर्थन लूटकर नाजी राजकाज चलाने में कामयाब हो गये।

गौरतलब है कि हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साई संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार 1922 ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति हो गए। उन्होंने स्वस्तिक को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओं का शुभ चिह्र है। वे अपने को विशुद्ध आर्य बताते रहे और इसीलिए भारत में फासिज्म की धर्मोन्मादी विचारधारा के झंडेवरदार शुरु से हिटलर का खुलकर समर्थन करते रहे।

यह फासिज्म हिटलर की विचारधारा के अलावा आर्य सभ्यता और विशुद्धता की उस हिंदुत्व विचारधारा का मिश्रण है, जिसका एजंडा नस्ली रंगभेद के तहत भारत में मनुस्मृति विधान और जाति व्यवस्था के तहत यहूदियों की तरह अछूतों, शूद्रों, किसानों, मेहनतकशों, आदिवासियों, अनार्यों, द्रविड़ों और गैरहिंदू नस्लों के सफाये से हिंदू साम्राज्य स्थापना करने का है।

हिटलर ने मीन कैम्फ ("मेरा संघर्ष") नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उन्होंने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए।

गौरतलब है कि हिटलर का मीन कैम्प भारत के फासिस्ट नस्ली राष्ट्रवादियों का धर्मग्रंथ है।

फासिज्म के खिलाफ निर्मम प्रहार रवींद्रनाथ शुरु से कर रहे थे और तासेर घर की पंतासी में इसी कुलीन तंत्र के वर्चस्ववाद पर उन्होने तीखा प्रहार करते हुए वर्णों की उत्पत्ति के सिद्धांत पर खुला प्रहार किया है।

हमने चंडालिका में अस्पृश्यता के खिलाफ समानता और न्याय के लिए अस्पृश्य चंडाल कन्या चंडालिका के विद्रोह और चंडाल आंदोलन की चर्चा पहले ही की है। बाउल फकीर किसान आदिवासी विद्रोह और भक्ति आंदोलन की बहुजन विरासत की भी हमने सिलसिलेवार चर्चा की है।

मनुष्यता के धर्म, राष्ट्रवाद और सभ्यता के संकट के बारे में चर्चा करते हुए नस्ली वर्चस्व की वजह से भारत में सामाजिक विषमता पर रवींद्रे के दलित विमर्श पर भी हम लगातार फोकस बनाये हुए हैं।

गौरतलब है कि 1930-32 में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद् में नाजी दल के सदस्यों की संख्या 230 हो गई। 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति की। 1933 में चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद् को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा। हिटलर ने डॉ॰ जोज़ेफ गोयबल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। 1934 में उन्होंने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैठे। नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली। हिटलर ने 1933 में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया और भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। प्राय: सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया।

इस पूरी अवधि के दौरान भारत के नस्ली राष्ट्रवादियों का हिटलर और जर्मनी के साथ नाभिनाल का संबंध रहा है।

रक्त करबी और चंडालिका में जहां किसानों और मेहनतकशों के अस्पृश्य, वंचित, अपमानित,उत्पीड़त वर्ण वर्ग की मनुष्यता की मुक्ति का महासंग्राम है,वही रवींद्रनाथ की नृत्यनाटिका ताशेर घर में सत्ता वर्ग की संरचना और सामाजिक विषमता का तानाबाना है जो मुकम्मल मनुस्मृति व्यवस्था है,उसका सामाजिक यथार्थ पर तीखे प्रहार है।

रवींद्र नाथ ने अपनी कहानी एकटि आषाढ़े गल्प को नृत्यनाटिका का रुप दिया और 1933 में इसे प्रकाशित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र के नाम उत्सर्गित कियाः

তাসের দেশ. উৎসর্গ কল্যাণীয় শ্রীমান সুভাষচন্দ্র, স্বদেশের চিত্তে নূতন প্রাণ সঞ্চার করবার পুণ্যব্রত তুমি গ্রহণ করেছ, সেই কথা স্মরণ ক'রে তোমার নামে 'তাসের দেশ' নাটিকা উৎসর্গ করলুম। শান্তিনিকেতন রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

गौरतलब है कि रवींद्र के अवसान के बाद आजादी के लिए भारत छोड़ने से पहले तक नेताजी सुभाषचंद्र बंगाल में हिंदुत्ववादियों के फासीवादी राष्ट्रवाद को सबसे बड़ा खतरा मानते हुए उसका लगातार प्रतिरोध करते रहे हैं।

इसका कथानक रवींद्र ने एकटि आषाढ़े गल्प में लिखा है,जिसकी शुरुआत में भारतीय समाज की प्रगतिविरोधी आदिम बर्बर संरचना का खुलासा उन्होंने इस प्रकार किया है जिसमें ब्रह्मा के मुख से विशुद्ध कुलीन तंत्र का जन्म बताया जाता हैः

भारत का प्राचीन नाम जम्बू द्वीप है और ताशों का यह देश भी समुद्र से घिरा एक द्वीप है जहां कुलीन वर्ण वर्ग की सत्ता है। साहब बीवी गुलाम और इक्का का सत्तावर्ग और कुलीन तंत्र है और अश्पृश्य अंत्यजों का व्रात्य बहुजन समाज नहला दहला वगैरह वगैरह है। जहां मनुस्मृति विधान के कठोर अनुशासन में जीवन बंधा है। वहां विचारों,सपनों,आशा,आकांक्षा या अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता नहीं है। जीवन में अचलावस्था है और समामाजिक परिवर्तन की कोई स्थिति नहीं है।

आज ही नर्मदा बांध देश को समर्पित कर दिया गया है। जल जंगल जमीन आजीविका नागरिक और मानवाधिकार से किसानों और मेहनतकशों की अनंत बेदखली में यह देश डिजिटल इंडिया वही ताशों का देश है,जहां राजनीति मुखर है और सामाजिक शक्तियां मौन है और आम जनता का सफाया का अटूट मनुस्मृति तंत्र वर्ण वर्ग वर्चस्व का सैन्य राष्ट्र है।

आज हम सिलसिलेवार इस पर चर्चा करेंगे। इससे पहले ताशेर देश नृत्यनाटिका का मूल पाठ हमने अपने फेसबुक पेज पर शेयर कर दिया है। बाकी संदर्भ सामग्री भी वहीं शेयर कर रहे हैं। तकनीकी कारणों से हम इसे समूहों में शेयर नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि रवींद्र दलित विमर्श सत्ता वर्ग के लिए निषिद्ध विषय है। 

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