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क्या हम सच में आज़ाद हैं : चौरी चौरा कांड से कुछ अलग नहीं मंदसौर में किसानों पर गोली

मोहम्मद ज़फ़र

क्या हम सच में आज़ाद हैं? यह एक बहुत बड़ा सवाल है जो बार बार हमें याद दिलाता है कि भले ही कहने को हम आज़ादी का जश्न हर साल मनाते हों, लाल किले पर खड़े होकर नेताओं द्वारा बड़े बड़े भाषण दिए जाते हों मगर सच यह है कि हम अभी भी मानसिक रूप से गुलाम हैं। हमारे तंत्र अभी भी उसी औपनिवेशिक मानसिकता के गुलाम हैं और पुलिस से लेकर फ़ौज, नेतागीरी से लेकर नौकरशाही सब उसी तरह से चल रहे हैं जैसे पहले चल रहे थे। लोकतंत्र आने से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा गरीब, आदिवासी, मजदूर किसानों का शोषण तब भी होता था अब भी हो रहा है। हिन्दू मुसलमान के नाम पर दंगे तब भी थे अब भी हैं। थोड़े बहुत फर्क को छोड़ दें तो इंसान द्वारा इंसान का शोषण अभी भी व्यापक रूप में देश में फैला है। इस शोषण को रोकना ही आज़ादी का असली मकसद था

हम जानते हैं कि गांधीजी हों, भगत सिंह या फिर अम्बेडकर, इन सभी विचारकों के दिमाग में असली आज़ादी का विचार यही था जब पिछड़े तबकों को सम्मान मिले, शोषण व अत्याचार ना हो और सबको बराबर मौके मिलें व सबको उनका हक़ मिले। मगर आज़ादी के बाद से अब तक हम चाहे शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मुद्दे उठाकर देख लें। लोगों में संविधान के प्रति आस्था व वैज्ञानिक चिंतन व दृष्टिकोण विकसित करने के नेहरू के विचार की हालत देख लें या फिर महिला, पिछड़े तबकों या मज़दूर, किसानों का हाल देखें तो स्थिति कमोबेश वैसी ही दिखती है और जो सुधार हुआ भी है उसमें उन तबकों के खुद के सक्षम होकर हक़ मांगने से ही बात बनी है चाहे वह महिलाओं की राजनैतिक सामाजिक भागीदारी हो या दलितों व पिछड़ों के एक राजनैतिक ताकत के रूप में उभरने की।

 अब यह बात अलग है कि उसके अंदर भी हमें कई परतें मिलेंगी जिनमें अति पिछड़ों पर पिछड़ों का शोषण या कौन सी महिलाओं की भागीदारी राजनैतिक स्तर पर बढ़ी है? उनकी पृष्ठभूमी क्या रही है? क्या भागीदारी की ये बयार शहर गाँव सभी जगह एक सी है? आदि, ये कुछ और पहलू हैं जिन पर काफी सोचने की ज़रूरत है।

इसी तरह क्या आदिवासियों के सम्मान और सुरक्षा को लेकर सरकार ने कुछ मज़बूत कदम उठाए हैं? या फिर साठ-सत्तर के दशक की गलतियाँ अभी भी दोहराई जा रहीं हैं जो कि सरकार और लोकतंत्र से अधिक नक्सलवाद या माओवाद की तरफ शोषित आदिवासियों को धकेलती हैं।

महादेवी वर्मा की रचनाएँ ऐसी कई कहानियां कहती हैं जिनमें हमारे समाज की असली सूरत और आदिवासियों का दर्द सामने आता है। और इस सच्चाई से हम सब अनजान नहीं हैं कि शोषित तबकों का भरोसा खोने में हम खुद ज़िम्मेदार हैं चाहे प्रशासन हो, पुलिस या सरकार।

अभी मंदसौर में किसानों पर गोली चलाने की घटना इसी कड़ी में एक कदम है जो सरकार के औपनिवेशिक रवैये की पोल खोलती है। भले ही इसमें कितने ही और पक्ष बताए जा रहे हों। किसानों पर गोली चलाने की यह घटना चौरी चौरा कांड से कुछ अलग नहीं लगती है। ऐसा लगता है जैसे आज के समय का चौरी चौरा काण्ड हमारे सामने है और हम मूक दर्शक बने तमाशा देख रहे हैं।

किसान और मजदूर अपने हक़ की बात करते हैं तो उन्हें मिलती हैं लाठियाँ और गोलियां। यही कानून विजय माल्या का कुछ नहीं कर पाता और इसी प्रशासन की नाक के नीचे से वारेन एंडरसन भोपाल गैस काण्ड के बाद आसानी से फ़रार हो जाता है। मगर किसानों और मजदूरों के आंदोलनों को रोकने और झुग्गी बस्तियों को तोड़ने के लिए कानून सदा सेवा में तत्पर दिखता है।

किसानों की आत्महत्या और जीवन यापन के लिए उनका संघर्ष कहीं मीडिया में सुर्ख़ियों में शायद ही दिखे मगर एक मंत्री, नेता की रैली के लिए, उनके मंदिर दर्शन के लिए चैनल्स के दरवाज़े आपको खुले मिलेंगे। यही नहीं अंग्रेज़ी शासन के मुखपत्रों की तरह अखबार व टी. वी. चैनल जनता की आवाज़ उठाने की जगह सरकार के पिछलग्गू और वाहवाही करने वाले बने हुए हैं। जबकि तार्किक विचार और समाज के लिए प्रश्न उठाना मीडिया का मुख्य काम होना चाहिए। मगर लगता है कि मीडिया के कोर्स की विषयवस्तु सतही हो गई है।

औपनिवेशिक काल में जैसे अँगरेज़ फूट डालो शासन करो की नीति में लगे थे लगभग वैसे ही राजनैतिक दल जाति, धर्म के नाम पर अभी भी लोगों को भड़का कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और सत्ता मिलने के बाद हमारा ही शोषण कर रहे हैं। और हम आपस में ही एक दूसरे पर दोषारोपण कर के उनका काम आसान करने में लगे हैं।

अंग्रेज़ी शासन में उच्च वर्ग के लिए तमाम तरह की शिक्षा के दरवाजे खुले थे तो उसी तरह आज भी मध्य व उच्च वर्ग के पास तमाम सुविधाएँ हैं और दूसरी तरफ असमता की खाई इतनी बढ़ती जा रही है कि गरीब के पास कोई विकल्प नहीं बचता और जो सरकारी सुविधाओं के रूप में बचता है वह अभी भी सुधार की धीमी प्रक्रिया में ही दिखता है।

अगर सरकारों की नीयत साफ़ होती तो इतने बरसों पहले आई कोठारी आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों पर शिक्षा में किया जाने वाला खर्च बढ़ाया जाता, स्कूलों की हालत ठीक की जाती। सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति को बखूबी सुधारा जाता ना कि लोगों को प्राइवेट अस्पतालों की लूट पर छोड़ा जाता।

सरकारी अधिकारियों की बात करें तो भ्रष्ट व अकड़ में डूबा प्रशासन जिसे सलामी लेने की औपनिवेशिक आदत पड़ी हो, जो झूठी हाईरैरकी में जकड़ा हो वह कितना भला करेगा किसान व गरीब का। पुलिस व फ़ौज में भी हाईरैर्की का दीमक काफी हद तक घुसा हुआ है। उनके अपने अधिकार राष्ट्रवाद के नाम पर छीन लिए जाते हैं जैसा अभी एक जवान के सोशल मीडिया पर वीडियो डालने के बाद सोशल मीडिया के इस्तेमाल के सन्दर्भ में हुआ था।

पूर्वोत्तर राज्यों में आफ्सपा जैसे कानून अंग्रेज़ी समय के लगते हैं वहीं दूसरी तरफ जे. एन. यू. के छात्रों या कुछ वर्ष पहले बिनायक सेन पर सेडिशन के चार्ज लगने जैसी बातों पर भी औपनिवेशिक काल की छाप दिखती है जहाँ तब छात्रों को खुलकर बोलने की आजादी भी नहीं होती थी तो वहीं आज भी आलोचना से सरकारें बचती हैं।

छत्तीसगढ़ में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाए गए विभिन्न मामले और चार्ज जैसे कि नंदिनी सुन्दर पर लगाया मर्डर का चार्ज और जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के वकीलों पर दबाव बनाना पूरी तरह अंग्रेज़ी हुकूमत की विरासत को समेटे हुए हैं। जैसे अंग्रेज़ी शासन की आलोचना करने वाला सीधे अंग्रेज़ी हुकूमत की नज़र में आ जाता था उसी तरह आज सरकार की आलोचना करने पर आप उस खुद को बेवकूफ बनाते मध्यम वर्ग की आलोचनाओं से घिर जाओगे जो सीधे आपको राष्ट्रद्रोही और विकास विरोधी बता देगा। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम उदाहरण हमें मिल जाएँगे जहाँ लोग खुद एक दूसरे से भिड़े जा रहे हैं और सरकारें उन्हें मज़े से बेवकूफ बना रही हैं। हम सोशल मीडिया पर मोदी जी और प्रभु के वकील बने अपनी ही तरह के आम आदमी से लड़ भिड़ रहे हैं और दूसरी ओर ट्रेन के टिकट महंगे हुए जा रहे हैं।

हम एक दूसरे को गरियाने में लगे हैं और दूसरी ओर उद्योगपति मज़े से सरकारों से साथ गाँठ किए शिक्षा के नाम पे कमाई के कारखाने खोले जा रहे हैं। हम इस बात से बिलकुल बेपरवाह हैं कि जिस नोटबंदी से हमने बड़ी आस लगाई उससे कितना काला धन कम हुआ? कितने बड़े उद्योगपतियों की पोल खुली?

कुल मिलाकार हमें खुद को बेवकूफ बनाने की बीमारी को छोड़कर सरकारों के वकील बनने की जगह आम आदमी के साथ खड़ा होना होगा। मज़दूर, किसान, बेरोज़गार, पिछड़े, शोषित, महिला, आदिवासी, दलित सबको अपने हक़, काम, रोटी कपड़ा, स्वास्थ्य व अच्छी शिक्षा के लिए खड़ा होना पड़ेगा। लड़ना पड़ेगा और बेवकूफ बनाती सरकारों से मिलजुलकर हक़ मांगना पड़ेगा। वरना अंग्रेज़ी गुलामी से छूटने के बाद भी हमारी मानसिक जकड़ राजनेताओं के हाथ में होगी और हम उनके बड़े बड़े लच्छेदार भाषणों से प्रभावित होकर आपस में लड़ते पिटते रहेंगे। और वे यूँ ही हमें मुख्य मुद्दों से भटकाते रहेंगे। यह वक्त फिर से आज़ादी की लड़ाई शुरू करने का है। यह वक्त सोशल मीडिया पर एक दूसरे को कोसने का नहीं बल्कि साथ मिलजुलकर देश के हर तबके के विकास की और बढ़ने का है जो शायद असली देशभक्ति का एक उदाहरण है।

मोहम्मद ज़फ़र

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