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अटल जी के बारे में झूठ बोलने की ऐतिहासिक गलती न करें, वो खांटी आरएसएस के ही थे

अटल जी के बारे में झूठ बोलने की ऐतिहासिक गलती न करें, वो खांटी आरएसएस के ही थे

स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी : एक समझ

आलोक वाजपेयी

जिन लोगों ने स्वर्गीय अटल जी की प्रशंसा में उनमें उदारवाद, लोकतांत्रिक चेतना आदि-आदि जैसे मूल्यों को प्रचुरता से रेखांकित किया है, वो अतिरंजना का शिकार हुए हैं। यह अतिरंजना या तो उनके ब्राह्मण होने के नाते उन्हें प्राप्त हुई है या फिर अटल जी को उनके देश काल के परिप्रेक्ष्य में समझ न सकने की बौद्धिक सीमा के कारण।

खांटी आरएसएस के थे अटलजी

अटल जी खांटी आरएसएस के थे। आरएसएस की विचारधारा से कभी हटे नहीं। उनमें राजनीतिक कौशल था, जिस कारण से उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को इस लुभावने अंदाज में अपने लंबे राजनीतिक जीवन मे परोसा कि बड़े-बड़े नामदार बुद्धि सम्पन्न लोग भी उन्हें आरएसएस प्रचारक से इतर अन्य बहुत कुछ समझते रहे। जनसंघ और भाजपा को एक सामान्य लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में स्थापित करने में उनका ऐतिहासिक योगदान है। अन्यथा आरएसएस की विचारधारा एक बुरी सोच के रूप में स्थापित ही थी।

अटल जी का व्यक्तित्व (राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों) ऐसा था कि गैर-कांग्रेसवाद की जो पार्टियां थीं, उनमें जनसंघ को अपने सहानुभूतिकार मिलने में बहुत आसानी हुई। वो पल में तोला पल में माशा होने का हुनर रखते थे।

उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से गैर-कांग्रेसवाद की चेतना को हाईजैक किया और ऐसा बिना किसी अन्य राजनीतिक सोच से टकराव से किया। यह आरएसएस के लिहाज से वक्त की मांग थी क्योंकि उसे अपनी वास्तविक सोच को छुपाये भी रखना था और अन्य सोच वालों का राजनीतिक इस्तेमाल अपने विस्तार के लिए करना था।

2004 तक आते आते उनकी राजनीतिक भूमिका चुक चुकी थी। वह जिस काम के लिए उपयुक्त थे वह पूरा हो चुका था। उन्होंने वो ऐतिहासिक काम कर दिया था, जिसमें एक अप्रासंगिक दल अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा हो गया था। आरएसएस की सोच को वास्तविक धरातल पर उतारने लायक आत्मविश्वास पाया जा चुका था। अटल जी की उदारवादी छवि से आगे जाकर अब पार्टी को नव भारत निर्माण में लगना था।

अब भाजपा उसी नवीन लक्ष्य की ओर no holds barred के उत्साह से लगी हुई है।

जिन उदार चेता बौद्धिकों को मोदी जी के नेतृत्व में उस नई उड़ान से दिक्कत हो रही है वो अटल जी के उदारवादी लच्छों को याद करके थोड़ा बहुत इस सरकार को घेर सकते हैं। पर थोड़ा भी चूके तो अटल जी के बारे में झूठ बोलने की ऐतिहासिक गलती भी कर सकते हैं।

लेखक इतिहासकार हैं।

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