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NDTV पर हमले के इशारे : जनतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरे की घंटी

राजेंद्र शर्मा

NDTV और उसके प्रमोटरों के परिसरों पर सीबीआई की छापेमारी की टाइमिंग बहुत अर्थपूर्ण है। इसी महीने के आखिर में आपातकाल के बयालीस साल हो जाएंगे। उसकी पूर्व-संध्या में मोदी सरकार के देश के सबसे पुराने तथा सचमुच स्वतंत्र समाचार चैनल पर, सीबीआई के माध्यम खुला हमला बोलने के संकेत स्पष्ट हैं।

मीडिया में और खासतौर पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया में, स्वतंत्र तथा इसलिए सरकार के लिए एक हद तक असुविधाजनक आवाजें मौजूदा शासकों को बर्दाश्त नहीं हैं। याद रहे कि यह तब है जबकि यह सिर्फ कुछ आवाजों का मामला है। वर्ना आम तौर पर तो मीडिया और उसमें भी ज्यादा प्रभावी इलैक्ट्रोनिक मीडिया तो खासतौर पर, मौजूदा शासन तथा शासकों के सामने बिछा ही पड़ा है। यह दूसरी बात है कि अब इस बिछे पड़े मीडिया से भी, जिसके लिए वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने ‘‘गोदी मीडिया’’ का बहुत ही उपयुक्त नाम दिया है, मौजूदा सत्ता ने अपनी मांगें बढ़ा दी हैं। अब उसके लिए शासकों की गोदी में बैठना और जब-तब उनका मुंह चाटना ही पर्याप्त नहीं है। अब उसका मौजूदा सत्ता के विरोधियों पर भोंकना और जब भी मुमकिन हो उन्हें ‘‘काटना’’ भी जरूरी है। यह आम तौर पर मीडिया का सत्ताधारी भाजपा तथा संघ परिवार के आक्रामक प्रवक्ताओं में ही तब्दील हो जाना है।

याद रहे कि इस आम प्रवृत्ति के सामने, NDTV जैसी स्वतंत्र आवाजें कम से कम आज इतनी ताकतवर नहीं हैं कि आज के भारतीय मीडिया के इस नये ‘नार्मल’ को ही बदल सकें। इसके बावजूद, कई बार ‘सत्ता के सामने सच’ बोल देने वाली इन धीमी आवाजों को भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है, बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनमें सबसे सघन आवाज को कुचलकर, बाकी हिचकिचाने वालों को भी औकात में रहने का संदेश दिया जाना भी तो जरूरी है। आखिर, सच की आवाज कमजोर ही सही कभी भी सत्ता के खड़े किए लक्षागृह में आग लगा सकती है। वैसे भी विरुद गायन के अंधेरे में, आलोचना की कमजोर सी आवाज भी, शासकों को और भी डरावनी लगती है।

बेशक, मीडिया की ऐसी स्वतंत्र आवाजों को दबाने की यह कोशिश कोई पहली बार नहीं हो रही है। वैसे तो हरेक शासन में और हमेशा ही, अपने लिए असुविधाजनक आवाजों पर अंकुश लगाने की प्रवृत्ति रहती है, फिर भी बयालीस साल पहले देश पर थोपी गयी आपातकाल इसका सबसे चर्चित उदाहरण है, जिसकी दुहाई देते मौजूदा सत्ताधारी भी नहीं थकते हैं।

सभी जानते हैं कि इंदिरा गांधी की आपातकाल में जितना हमला विपक्ष के खिलाफ था, उतना ही हमला मीडिया के खिलाफ भी था, जो तब मुख्यत: पत्र-पत्रिकाओं के रूप में ही सामने था।

फिर भी आपातकाल और मौजूदा हमले में एक अंतर जरूर है। आज यह हमला जिस तरह मीडिया के बड़े हिस्से को ‘‘गोदी मीडिया’’ बना लेने के बाद, बची-खुची स्वतंत्र आवाजों के मिटाकर, मीडिया पर शासन का नियंत्रण मुकम्मल कर लेने की कोशिश के रूप में सामने आ रहा है, आपातकाल में वैसा कुछ नहीं था। वहां तो सीधे-सीधे समूचे मीडिया को विरोधी बनाकर उसकी आवाज दबाने की कोशिश थी, जिसका नाकाम होना तय था और वह नाकाम हुई। 1977 में आपातकाल राज का धमाकेदार अंत इसका सबूत है। इसीलिए, कम से कम मीडिया के पहलू से एक और आपातकाल थोपने की मौजूदा मुहिम का खतरा, मूल आपातकाल के मुकाबले बहुत ज्यादा बड़ा और दूर तक जाने वाला है।

इस हमले के संदर्भ में याद आने वाला एक और उदाहरण, एनडीए के ही पिछले राज में ‘‘तहलका’’ समाचार पोर्टल पर हुए हमले का है। याद रहे कि जिस तरह वाजपेयी सरकार ने अपनी सभी एजेंसियों को तहलका को खत्म ही कर देने के लिए झोंक दिया था, कुछ ऐसा ही इरादा मौजूदा शासन का NDTV के मामले में लगता है। आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय आदि पहले ही कार्रवाई के लिए बहानों की खोज में जुटे रहे हैं। अब बची-खुची कसर पूरी करने के लिए सीबीआई को भी उतार दिया गया है। लेकिन, खुद एनडीए के राज का ही उदाहरण होने के बावजूद, ‘‘तहलका’’ पर वाजपेयी राज के हमले और NDTV पर मौजूदा हमले के संदर्भों में दो महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं। पहली तो यही कि मौजूदा मामले के विपरीत, ‘‘तहलका’’ पर हमले के जरिए वाजपेयी सरकार, मीडिया के अनुकूलन की आम कोशिश से भिन्न, मीडिया पर अपना नियंत्रण मुकम्मल कर लेने जैसी कोई कोशिश तो नहीं ही कर रही थी। दूसरी ओर, ‘‘तहलका’’ मामले में आमतौर पर मीडिया के प्रति रुख से अलग, खासतौर पर उससे ही सरकार के खुंदक खाने की जैसी स्पष्ट वजह थी, वैसी कोई खास वजह NDTV के मामले में नजर नहीं आती है।

इस हमले को NDTV ने अपनी किसी करनी से शायद ही न्यौता हो। यह तो आमतौर पर स्वतंत्र मीडिया के प्रतीक के रूप में, NDTV को उदाहरण बनाकर ही पीटे जाने का ही मामला ज्यादा है। इसी में इस हमले का असली अर्थ है।

मोदी राज का अपने तीन साल में और कोई वास्तविक खतरा सामने नजर न आने के बावजूद इस मुकाम पर पहुंचा है। यह उसकी अंतर्निहित तानाशाही की प्रवृत्ति को ही दिखाता है, जो विरोध या असहमति की जरा सी भी आवाज को बर्दाश्त नहीं कर सकती है, भले ही उससे तत्काल कोई वास्तविक खतरा नहीं हो।

तानाशाही की अंतर्निहित प्रवृत्ति वैसे तो मोदी राज की शुरूआत से ही अपना रंग दिखाती रही है, अवार्ड वापसी विरोध के नाम पर बुद्घिजीवी विरोधी मुहिम से लेकर, जेएनयूविरोधी मुहिम तक जिसके चर्चित उदाहरण हैं। मीडिया से भी बढ़कर सोशल मीडिया, पहले ही उसके इस युद्घ का मैदान बना रहा है। भाजपा के राज के तीन वर्षों में तानाशाही की इस बढ़ती प्रवृत्ति ने तमाम अकादमिक, शोध तथा सांस्कृतिक संस्थाओं का बाकायदा भगवाकरण ही नहीं किया है, तमाम संसदीय व अन्य संस्थाओं को भी कमजोर किया है। न्यायपालिका पर अपना वर्चस्व कायम करने की उसकी लगातार जारी लड़ाई और सिर्फ असुविधाजनक होने की वजह से राज्यसभा तथा उसकी भूमिका को कमजोर करने की उसकी मुहिम, इसी के उदाहरण हैं।

सच तो यह है कि अपने चौथे वर्ष में मोदी राज बहुत हद तक अघोषित आपातकाल जैसा बल्कि कई मामलों में तो उससे भी बदतर लगने लगा है।

दुर्भाग्य से इस खतरे को विपक्ष तो फिर भी पहचान रहा है, लेकिन आम तौर पर मीडिया बहुत ही कम पहचान रहा है

सरासर बदले की कार्रवाई करते हुए, देश के सबसे पुराने तथा अपनी स्वतंत्रता के लिए जाने जाने वाले समाचार चैनल पर इस खुले हमले पर, मीडिया जगत से जैसी कमजोर आवाज उठी है, खतरे को और बढ़ाने वाली है। बेशक, एडीटर्स गिल्ड ने सीबीआई के छापों पर चिंता जतायी है, मीडिया का मुंह बंद करने की हर कोशिश की निंदा की है और मीडिया के स्वतंत्र काम-काज में दखलंदाजी न किए जाने की मांग की है, लेकिन यही काफी नहीं है। उसका बोलना ही काफी नहीं है।

एक निजी शिकायत पर, एक निजी बैंक को नुकसान पहुंचाए जाने के आरोप में, संबंधित बैंक के खुद ऐसी कोई शिकायत न करने के बावजूद, सीबीआई ने यह कार्रवाई की है, जबकि सरकारी बैंकों का हजारों करोड़ रु0 डकारे बैठा विजय माल्या इस कार्रवाई की पहली शाम को लंदन में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मुकाबले का आनंद ले रहा था और सार्वजनिक बैंकों का करीब दस लाख करोड़ रु0 इसी तरह डूबा हुआ है। इसके अलावा पठानकोट की आतंकवादी घटना के कवरेज के बहाने से, इससे पहले पिछले ही साल यही सरकार ‘‘NDTV हिंदी’’ पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने की विफल कोशिश कर चुकी थी। इस सबके बावजूद, अगर मीडिया के बड़े हिस्से को इसे मीडिया पर हमला कहने में दुविधा है, तो यह जनतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। जो दूसरों पर तानाशाह सत्ता के हमलों को दूसरों पर ही हमला मानते रहेंगे, खुद उसी तानाशाह सत्ता के सामने अकेले रह जाएंगे। दुर्भाग्य से यह सिर्फ उनकी ही नहीं सभी की त्रासदी होगी।

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