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Baba Saheb Ambedkar The biggest hero of the social revolution in India बाबा साहेब अंबेडकर : भारत में सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े नायक

क्या डॉ आंबेडकर आदिवासी विरोधी थे? क्या उन्होंने दलित अधिकारों की कीमत पर आदिवासी अधिकारों की अवहेलना की?

बाबासाहेब डॉ आंबेडकर और आदिवासी प्रश्न

डॉ. रत्नेश कातुलकर

क्या डॉ आंबेडकर आदिवासी विरोधी थे (Was Dr. Ambedkar anti tribal)? क्या उन्होंने दलित अधिकारों की कीमत पर आदिवासी अधिकारों की अवहेलना की? ये सवाल अभी हाल ही कुछ वर्षों मे कुछ लेखकों ने उठाए हैं।

हालांकि बाबसाहब पर इस तरह के इल्ज़ाम कोई नए नहीं हैं। वैसे यह सच है कि बाबा साहेब डॉ आंबेडकर तो हमेशा ही आलोचना और उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं। किन्तु 90 के दशक से समाज और अकादमिक संस्थानों की सोच में एक व्यापक बदलाव आया है। जिसके चलते आम जनता डॉ आंबेडकर को  न सिर्फ एक दलित नेता, बल्कि उनके द्वारा किए गए राष्ट्रहित के विभिन्न कार्य; जैसे आर्थिक मामले, मानव अधिकार, स्त्री विमर्श को कुछ हद तक जानने लगी है। अकादमिक विमर्श में भी डॉ आंबेडकर को गंभीरता से लिया जाने लगा है।

हालांकि यह लम्बा और संघर्ष से भरा सफर इतना आसान नहीं रहा है। हम ये कैसे भूल सकते हैं कि कुछ वर्षों पहले अरुण शौरी ने ‘वर्शिपिंग फाल्स गॉड’ (“Worshipping False Gods: Ambedkar, and the Facts which Have Been Erased” Textbook by Arun Shourie) जैसी किताब लिखकर अपनी घटिया मानसिकता का प्रदर्शन कर डॉ आंबेडकर पर टिप्पणी करने का कुत्सित प्रयास किया था। पर इसे आंबेडकर वादियों ने अपनी-अपनी बड़ी-छोटी धारदार लेखनी के जरिये से जवाब देकर इसे बड़ी सहजता से बेनकाब भी कर दिया था।

लेकिन अभी हाल ही में आंबेडकर  विरोधियों ने एक नयी साजिश रची है। ये अब बड़ी ही धूर्तता और बेहयाई से यह कहने लगे हैं कि ‘ठीक है, डॉ आंबेडकर ने संविधान बनाया, राष्ट्र के विकास के लिए पनबिजली परियोजना की नींव रखी, रिजर्व बैंक की स्थापना की, महिलाओं और मजदूर हितों के लिए काम किए, लेकिन उनके ये सब कार्य केवल सत्ताधारी वर्ग को सुख और लाभ दिलाने के लिए थे।’ अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे यह भी कहते नहीं हिचकते कि ठीक है, आंबेडकर  ने दलितों के लिए काफी कुछ किया, पर उन्होंने आदिवासी समुदाय को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और तो और, दलितों की दशा सुधारने के अपने आन्दोलन में बड़े ही शातिर तरीके से आदिवासी हितों की बलि दे डाली।

इस तरह के इल्जाम लगाने में जहाँ कुछ लेखक और विद्वान, जैसे  अरुंधति रॉय, शिव विश्वनाथन थोड़ी नरमी रख रहे हैं, वहीं कुछ आदिवासी लेखक जैसे ग्लैडसन डुंगडुंग तो सीधे दलित आन्दोलन और बाबा साहेब पर वार करने से तनिक भी नहीं हिचके।

ग्लैडसन डुंगडुंग का मानना है कि संविधान में आदिवासियों को जो कुछ भी हक मिले, वे केवल और केवल एक आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा की ही देन हैं। इनके अनुसार  डॉ आंबेडकर  आदिवासियों को कुछ भी नहीं देना चाहते थे।

डॉ आंबेडकर को आदिवासी विरोधी जताने वाले ये लेखक अपनी बात को सिद्ध करने के लिए यह भी कहते हैं कि संविधान सभा में आदिवासी मुद्दों पर डॉ आंबेडकर  और जयपाल सिंह मुंडा के बीच काफी द्वंद्व, तकरार और मतभेद थे, जिन पर जयपाल सिंह मुंडा अकेले पड़ गए और उन्हें संविधान सभा में साथ देने वाला कोई भी नहीं मिला। वहीं इस परिस्थिति का फायदा उठाकर डॉ आंबेडकर ने बड़ी चालाकी से आदिवासी मुद्दों की कीमत पर दलित अधिकारों को आगे रखकर संविधान सभा के सदस्यों को अपने पक्ष में कर लिया।

मान्य इतिहासकार रामचन्द्र गुहा तो यह भी कहने से नहीं चूके कि ‘आदिवासियों का अपना आंबेडकर  होना चाहिए।’

चूँकि ये गंभीर इल्जाम किसी सामान्य बुद्धि के व्यक्ति ने नहीं, बल्कि देश के ख्याति प्राप्त चिंतकों ने लगाया है। अतः लेखनी के रूप में इसका जवाब देना जरूरी है। प्रस्तुत पुस्तिका इन संगीन आरोपों का जवाब और आदिवासी प्रश्न पर डॉ आंबेडकर की सोच को दुनिया सामने लाने का एक बेहद गंभीर कोशिश है। जिसे कई भारी-भरकम वाल्यूम में संकलित संविधान सभा की बहस के प्रकाशित संकलन की पड़ताल करते हुए लिखा गया है। यह पहाड़ खोदने जैसा ही एक बोझिल काम था। पर कहते हैं न कि ‘खोदा पहाड़ और निकली चुहिया।‘ ठीक इसी तरह संविधान सभा की बहस को पढ़ने से पता चला कि बाबा साहेब पर आरोप लगाने वाले लोग बौद्धिक दृष्टि से कितने खोखले हैं।

सच कहूँ तो इस पुस्तक को मूर्त रूप देने में मुझे केवल ग्लैडसन डुंगडुंग, शिव विश्वनाथन और अरुंधति रॉय  की एकतरफा सोच ने मजबूर किया है। इसलिए मैं इन महान विद्वानों का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ। वैसे भी बाबा साहेब के तीन गुरुओं में से एक कबीर ने कहा है:

                   निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

                   बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय

मतलब, अपने आलोचकों और विरोधियों को अपने पास अवश्य आने दें, क्योंकि ये ही वे लोग हैं, जो हमारे विचारों और आन्दोलन की शिथिलताको दूर कर हमें और भी अधिक जागरूक, चिंतनशील और सतर्क बनाते हैं। दरअसल यह पुस्तिका मूल रूप में मेरा एक शोध आलेख है जो मैंने बेंगलोर स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में डॉ आंबेडकर का भारतीय लोकतन्त्र पर दृष्टिकोण विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के लिए लिखा था।

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