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Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना
Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा पत्थर/ कोई मत ख्वाब सजाना तुम

जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा पत्थर

कोई मत ख्वाब सजाना तुम

मेरी गली में खुशी खोजते

अगर कभी जो आना

आज फिर एकमुश्त हिमपात, भूस्खलन, भूकंप और जलप्रलय के बीचोंबीच फंसा हूं और मेरे देश में दिशाएं गायब हैं।

रिजर्व बैंक के मान्यवर गवर्नर राजन साहेब नयी परिभाषाओं और आंकड़ों के हवाले विकास के अर्थशास्त्र का पाठ ले रहे हैं मोदी पाठशाला में। हमारे अधकचरे अर्थशास्त्र की गति समझ लीजिये और आगे भयानक मोड़ है कि डाउ कैमिकल्स का बजट है और चारों तरह मनसैंटो है।

अजब गजब फिजां हैं।

सांख्यिकी मंत्रालय में उनकी क्लास लग रही है कि विकास के विजय रथ को बजट के आर-पार कैसे ले जा सकें वे ताकि शेयर बाजार का हाल ठीक रहे।

अभी-अभी कर्नल साहेब का फोन आया रांची से कि विदेशी फंडिंग के बारे में केंद्र सरकार ने आप को क्लीन चिट दे दी है और कोयला ब्लाक की सौगात भी मिलेगी ताकि दिल्ली में निजी बिजली घर बन जाये कोई बड़ा सा और दिल्ली वालों को सस्ती बिजली मिल जाये।

हमारे अधकचरे अर्थशास्त्र की गति समझ लीजिये और आगे भयानक मोड़ है कि डाउ कैमिकल्स का बजट है और चारों तरह मनसैंटो है।

कयामती जश्न लेकिन यूं हैः

मोदी के सूट और बुत से बातें करना चाहते हैं, सूट की 1.21 करोड़ की बोली लगाने वाले राजेश जुनेजा. http://bbc.in/1A5oY42

कल ही जिनेवा से खबर आयी कि एचएसबीसी के यहां धकाधक छापे पड़े। इंडियन एक्सप्रेस में खुलासा हुआ था भारतीय खातों का। स्विस खातों के बारे में मीडिया में हुए खुलासे के बाद ये छापे डाले गये और एचएसबीसी के खिलाफ मनी लौंड्रिग का मुकदमा भी दर्ज हुआ है।

भारतीय खाता धारकों में तमाम नाम हमारे बिलियनियर मिलियनर राजनेताओं के भी हैं।

मोदी ने लोकसभा चुनाव से पहले वायदा किया था कि सारा काला धन वापस लायेंगे। हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख जमा कर देंगे।

चुनाव जीत लेने के बाद दिल्ली में जेब में होने की खुशफहमी में ओबामा मिलन मौके के पंद्रह लाख टकिया सूट जो अब नीलाम हो रहा है, उसके साथ अमित शाह ने कहा कि यह तो मजाकिया जुमला है।

देश के प्रधानमंत्री लेकिन वायदे से अभी तलक मुकरे नहीं है।

हमारे लोग अब आधार कार्ड वाले हो गये हैं, जिनके खाते नहीं थे, उन्हें जनधन योजना के तहत भारतीय अर्थ व्यवस्था में इनक्लुड भी कर लिया गया है। अब पंद्रह लाख जमा होने का इंतजार है।

इस बीच खुलासा यह भी हो गया कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले फंड में से नब्वे फीसद का सूत्र अज्ञात है। उन अज्ञात सूत्रों पर दसों दिशाओं में सन्नाटा है और उसी सन्नाटे को तोड़ने के लिए दिल्ली में फिर होगा अन्ना का सत्याग्रह, जिसमें शायद पहली बार उनके साथ होंगे एक अदद मुख्यमंत्री। कालाधन जरुर वापस होगा।

जैसे निजीकरण से बिजली पानी सस्ता मुफ्त, एक के साथ एक फ्री होने से इंद्रप्रस्थ खुशहाल है, वैसे ही बाकीर महाभारत।

संपूर्ण निजीकरण, एकमुश्त जैविक मनसैंटो फसल और डाउ कैमिकल्स के बजट से ट्रिकलिंग ट्रिकलिंग विकास होइहें और धीरे-धीरे समाजवाद आ जाई।

यही है समरसता, समता और सामाजिक न्याय का कुल जमा किस्सा।

कि बहारों फूल बरसायो कि मेरा महबूब आयो। पिया घर आयो।

जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा पत्थर

कोई मत ख्वाब सजाना तुम

मेरी गली में खुशी खोजते

अगर कभी जो आना

जिंदगी भर कामयाबी से मुंह चुराता रहा मैं।

वर्धा में जो गीत परफर्म करके निसार मियां हमारे दिल का हिस्सा बन गये हमेशा के लिए, आज सुबह उनको फोन लगाकर वह गीत मंगा लिया और छत्तीसगढ़ के जनकवि जीवन यदु के उसी गीत से आज का मेरे रोजनामचे की शुरुआत है।

मन अब इतना कच्चा ठैरा कि लंद फंद के लिए मशहूर हमारे पुरातन सहकर्मी और खैनी गुरु पुरातन मित्र कृपवा को फोन लगाया और आभार जताया कि वह अनिल सरकार, अद्वैत मल्लवर्मन, चर्यापद साहित्य, बांग्ला दलित साहित्य, रवींद्र के दलित विमर्श, बांग्ला दलित साहित्य और दलित आंदोलन पर सिलसिलेवार लिख रहा है, जैसा बांग्ला में हो नहीं रहा है।

कमसकम मुझे फिलहाल इन मुद्दों को छूने की जरूरत नहीं है। आभार।

मैं दरअसल यही चाह रहा था अपने मोर्चे को तमाम साथियों से कि जब हम मुट्ठी भर लोग हैं तो क्यों न अपना कार्यभार आपस में बांट ले। ऐसा हो नहीं पा रहा है।

लगातार अकेला होता जा रहा हूं।

अभी “हस्तक्षेप” जारी है कि मेरी दबी कुचली आवाज कुछ लोगों तक पहुंच रही है। मैं नहीं जानता बेरोजगार साधनविहीन अमलेंदु कब तक इसे जारी रख पायेंगे और कब तक हस्तक्षेप संभव है। रोजाना मदद की गुहार लगाते हुए हम थक गये हैं।

प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया से हम बाहर हैं। बेदखल हैं।

सोशल मीडिया भी केसरिया हुआ जा रहा है।

हमारे जो लोग हमारा पोस्ट लाइक भी करते हैं, वे थोड़ी सी जहमत और उठाकर तनिको शेयर भी करें तो कुछ और लोगों तक हमारी बात पहुंच सकती है।

एक बात मैं साफ कर दूं सिरे से कि जैसे शत प्रतिशत हिंदुत्वकरण से इस देश के निनानब्वे फीसद जनता के बुनियादी मसले हल नहीं होगे और जनसंहार का सिलसिला जारी रहना है, उसी तरह बौद्धमय देश बनाकर भी हम इन मसलों को हल नहीं कर सकते।

बौद्धमय देश बनाने की मुहिम जो लोग चला रहे हैं, हिंदुत्वकरण का विरोध करके हम उनका समर्थन कतई नहीं कर रहे हैं।

आप कभी भारी हिमपात में फंसे हों पहाड़ों में और दसों दिशाएं बंद हों, तो मेरी हालत शायद समझ लें।

कभी मूसलाधार बरसात और भूस्खलन में शिखरों के आसपास झूले हों, तो मेरा दिलोदिमाग आपके हवाले।

कभी जलप्रलय के मध्यडूब में शामिल घाटी से बच निकले हों तो मेरी तमाम सांसे आपके नाम।

अजब-गजब फिजां हैं।

धर्म और अस्मिताओं के बवंडर से बाहर निकलकर ही गौतम बुद्ध ने मनुष्यता के इतिहास में पहली रक्तहीन क्रांति की थी और समता और सामाजिक न्याय आधारित समाज की स्थापना की थी।

वह लक्ष्य दरअसल हमारा धम्म है।

राजनीतिक सवालों से जूझे बिना, राजनीतिक मुद्दों से टकराये बिना, राजसत्ता के खिलाफ जनमोर्चा बनाये बिना महज मस्तक मुंडन से हमारी समस्याएं सारी हल हो जायेंगी। ऐसा मैं मानता नहीं हूं।

क्योंकि राज्यतंत्र को बदले बिना न जाति उन्मूलन संभव है और न मनुस्मृति शासन का अंत है और न मुक्तबाजार में तब्दील देश की गुलाम जनता की मुक्ति संभव है।

संघ परिवार और उसकी सरकार हमारे लिखे पर प्रतिक्रिया नहीं करें, य़ही दस्तूर है। खामखां वे तवज्जो क्यों दें हमें। ताकि बात निकलती जाये।

वे जो कर सकते हैं, कर रहे हैं। हुकूमत उनकी है। तंत्र मंत्र यंत्र उनका है। जब चाहे तब सर कलम कर सकते हैं वे। ऐसा करके वे हरगिज किसी दो कौड़ी के इंसान को शहीद नहीं बनायेंगे। जाहिर है।

तकनीकी तौर पर हर अवरोध खड़ा करने की दक्षता उनकी है।

हम कहीं लिख नहीं सकते।

किसी चैनल पर भौंक नहीं सकते।

हजारों लोगों के बैठाकर मन की बातें कर नहीं सकते।

न हमारा कोई राष्ट्रव्यापी संगठन है कि देश के कोने-कोने तक हम अपनी बात पहुंचा सकें। जबकि देश जोड़ने का मिशन है हमारा। मानवबंधन हमारा मिशन है। भाषा बंधन हमारा मिशन है।

यह मिशन आज के हालात में दिवास्वप्न के सिवाय कुछ भी नहीं हैं।

 

हम जनता की मोर्चाबंदी की बात कर रहे हैं। हम अस्मिताओं को तोड़ने की बात कर रहे हैं। हम जाति उन्मूलन की बात कर रहे हैं।

हम न नमो बुद्धाय कह रहे हैं और न जयश्रीराम हम कह सकते हैं। हम जय भीम और जयमूलनिवासी भी नहीं कह रहे हैं।

न हम सेल्फी पोस्ट कर रहे हैं और न हमारा कोई एलबम है।

हम विचारों की बात कर रहे हैं विचारधाराओं के आरपार।

हम आरक्षण की बात नहीं कर रहे हैं।

हम धर्मोन्माद फैला नहीं रहे हैं। न हम हिंसा और अराजकता के कारोबारी हैं।

हम मुक्त बाजार और जनसंहारी संस्कृति के प्रतिरोध की बात कर रहे हैं। हम पहाड़ों, जल जंगल जमीन, भूमि सुधार, आम जनता के हक हकूक और उनकी सुनवाई, नागरिक और मानवाधिकार, प्रकृति और पर्यावरण की बात कर रहे हैं। हम भाषा, साहित्य, रंगकर्म और जनांदोलन की बात कर रहे हैं।

हम लाल में नील और नीले में लाल की बात कर रहे हैं।

सत्ता समीकरण से हमारा कोई लेना देना नहीं है कि सत्ता की चाबी हम तलाश नहीं रहे हैं।

बंगाल में सत्ता हेजेमनी के प्रचंड लगातार विरोध के बावजूद हम ममता बनर्जी का अंध विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि वाम वापसी असंभव है और शून्य स्थान भरने के लिए केसरिया सुनामी है।

 

हमारे लिखे पर कायदे से सबसे ज्यादा तकलीफ संघ परिवार और मुक्त बाजार की ताकतों को होना चाहिए।

विडंबना है कि सबसे ज्यादा गड़बड़ा रहे हैं, सबसे ज्यादा तिलमिला रहे हैं वे लोग जो सामाजिक राजनीतिक बदलाव के झंडेवरदार हैं।

विडंबना है कि वे लोग भी मुझे ब्लाक और डिलीट कर रहे हैं, जिन्हें हम अपना हमसफर समझ रहे थे।

विडंबना है कि आपस में मारामारी से लहूलुहान और अपने वध आयोजन से बेखबर इस अनंत वधस्थल पर कतारबद्ध लोग अपनी नियति के बारे में हमारी भविष्यवाणी और हमारे सामाजिक यथार्थ के बयान से सबसे ज्यादा नाराज हैं।

हमें धर्मोन्मादी मुक्तबाजारी तंत्र मंत्र यंत्र और तिलिस्म की कोई परवाह नहीं है।

हम लहुलूहान हो रहे हैं अपने लोगों के अंधत्व से।

कि लाल भी नाराज दीखे है और नीला भी गुस्से में लाल दीक्खे है।

हम अकेले हैं कि हम सचमुच नहीं जानते कि कौन हमारे साथ है और कौन साथ नहीं हैं।

दिनेशपुर, उत्तराखंड से भाई सुबीर गोस्वामी का पोस्ट हालाते सूरत पर बेबाक टिप्पणी है और मेरे लिए दर्द का सबब भी कि सुबीर ने लिखा हैः

बंगाली समाज के जागरूक लीडर्स अभी बंगाली कल्याण समिति के अध्यक्ष, सचिव और दूसरे पदों में काबिज़ होने में बिज़ी है। सोच यही है कि उस पद का आम बंगाली को लाभ हो न हो, मगर ये पद अ ब स पार्टी से टिकट मांगने का मजबूत आधार बन सके। सभी चूतिया बनाते आ रहे या बनाते आने वाले प्रतिनिधियों को शुभकामनायें !!! उच्च, माध्यम और निम्न माध्यम वर्गीय बंगाली जन पैसा खर्च कर डेलीगेट्स बनने का गौरव पाने वाले डेलीगेट्स को शुभकामनायें !!! इस मृतप्राय संगठन के ये महत्वाकाँक्षी प्रतिनिधि दिल्ली जाते रहे, देहरादून जाते रहे दुर्गा पूजा की तरह पिछले 60 वर्षो की परंपरा निभाते रहे !!! फिर से शुभ कामनाएं।

 पलाश विश्वास

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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