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Pulwama CRPF attack

सैनिकों की शहादत के नाम पर राजनीति करने वालों से सावधान, पुलवामा की आड़ में फिरकापरस्त ताकतों के मनसूबे नाकामयाब करें

पुलवामा में आतंकवादी हमले (Terrorist attack in Pulwama) के बाद से ही देश भर में सौहार्द के वातावरण (Cordial atmosphere) को ख़राब करने के प्रयास किये जा रहे हैं। कश्मीरी छात्रों और व्यवसायियों (Kashmiri students and businessmen) को तंग करने की और उन पर हमले की खबरें भी विभिन्न स्थानों से आई हैं। जम्मू के हालत बेहद ख़राब दिखाई दे रहे हैं।

सवाल ये है कि क्या आतंकवादियों के हमले का जवाब देश में शांतिपूर्ण ढंग से रहने वाले लोगों से लिया जाए। अक्सर ऐसे मामलो में एक तबका अचानक से जाग उठता है, क्योंकि घृणा/ नफ़रत (Hate and hate) के अलावा उसने कुछ सीखा नहीं है। देश की आज़ादी के बाद से ये तबका इसी फिरकापरस्ती को बढ़ाता है और उसके लिए मौके ढूंढता रहता है।

पाकिस्तान में मौजूद इस्लामिक जेहादी दरअसल वो काम करते हैं जो भारत में लोगों में धर्म के नाम पर तनातनी और दुश्मनी पैदा करे। पाकिस्तान की फौज और उसके हुक्मरान पिछले 70 सालों से द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत (two nations theory) से ग्रस्त हैं और ये साबित करना चाहते हैं कि भारत में जो लोग साथ रहते हैं वो संभव नहीं है और ये कि मुसलमानों को भारत में दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है।

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भारत के संविधान ने यहाँ रहने वाले हर नागरिक को बराबरी का अधिकार दिया। संविधान ने सभी को अपने धर्म और मज़हब को मानने और उस पर चलने की आज़ादी दी। पाकिस्तान में ये सब नहीं है।

आधिकारिक तौर पर इस्लाम पाकिस्तान का सरकारी धर्म (Official religion of Pakistan) है और राजनीति और सेना में उसका घालमेल इतना है कि आज वो मुल्क तबाही के कगार पर है और वहां तालिबान और अनेकों अन्य इस्लामिक उग्रपंथी कश्मीर नाम की दुकान चलाके बैठे हैं ताकि खूब चंदा इकट्ठा हो और सत्ता पर पकड़ बनी रहे और जनता के सवालों को दरकिनार किया जा सके। ऐसा लगता है मज़हब के अलावा और कोई सवाल जनता के नहीं हैं। पाकिस्तान के ऐसे मजहबी हुक्मरानों के रिश्ते उनकी फौज से जग जाहिर हैं इसलिए फौज का बजट भी बहुत ज्यादा है।

भारत में हिंदुत्व के तथाकथित रक्षक वही काम कर रहे हैं जो इस्लाम के पैरोकार पाकिस्तान में कर रहे हैं। वो नहीं चाहते कि यहाँ राष्ट्रीय एकता बनी रहे और लोग अपने सवालों पे सरकार को कटघरे में खड़ा करें। पिछले पांच सालों में हिंदुत्व के अजेंडा को लाने वालों ने सिवाए आग उगलने के किया क्या ? दलित आदिवासी पिछड़ी जातियों के लोग सभी तो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे लेकिन इनके लिए ये सवाल तो सवाल ही नहीं है। सवाल तो केवल धर्म का है ताकि उसके नाम पर मनुवादी शासन चल सके।

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद देश में जो नफ़रत का तांडव चला वो हमें आज ही याद है। कांग्रेस ने तब इंदिरा गांधी की शहादत को दूरदर्शन पर इतने चला कर हमारे सिख भाइयों और बहिनों के खिलाफ नफ़रत के बीज बोये। लोग सड़कों पे आये। वे सभी वही थे जो मजहब की पट्टी अपनी आंख पर बांध कर दो अपराधियों की सजा बाकी कौम को देना चाहते थे। ठीक वैसा ही हुआ गोधरा की बाद जब गुजरात में २00२ में तांडव हुआ।

आज दुनिया बहुत छोटी है। सभी लोग एक जगह बहुसंख्यक हो सकते हैं और बहुत से स्थानों में अल्पसंख्यक। दुनिया के बहुत हिस्सों में मुसलमान बहुसंख्यक है और बहुत जगह पे अल्पसंख्यक, बिलकुल वैसे ही जैसे कहीं हिन्दू, कहीं ईसाई, कही बौद्ध। हर समाज का व्यक्ति रोजगार, बेहतरी और काम की तलाश में बाहर जाता है और इतिहास गवाह है कि सभ्यता के निर्माण में बाहर से आने वाले लोगों की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। अगर हम बदला लेने वाली भावनाओं से काम करेंगे तो उसी प्रकार की ताकतों को बल मिलता है जो अपने अपने देशों में अल्पसंख्यकों के देश प्रेम पर सवाल खड़े करते हैं और याद रखिये कि आपके भाई बहिन भी कहीं पर अल्पसंख्यक हो सकते हैं और ऐसे ही वर्ताब उनके साथ भी हो सकते हैं क्योकि नफ़रत के बीज बोने वाले और उसकी राजनैतिक फसल काटने वाले केवल एक ही देश या एक ही समुदाय में नहीं होते, वे तो हर जगह हैं और उन्हें केवल मानववादी संवैधानिक मूल्यों से ही निपटा जा सकता है।

इसलिए किसी भी किस्म का अपराध कानून से निपटा जाना चाहिए और उसके लिए संवैधानिक संस्थाए बनी हुई हैं और उन्हें अपने काम को करने की छूट होनी चाहिए। अगर सभी लोग सड़क पर खड़े होकर पुलिस और न्यायालय का कार्य स्वयं ही करने लगे तो देश का तंत्र ख़त्म हो जाएगा और उन लोगों के मंसूबे ही पूर्ण होंगे जो भारत को एक मजबूत राष्ट्र नहीं देखना चाहते हैं।

सियासत को लहू पीने की आदत है। वरना मुल्क में सब खैरियत है।।

याद रखिये कि एक राष्ट्र, बन्दूक और मिसाइलों से बड़ा नहीं होता। वो आज की हालत में सबके पास हैं। राष्ट्र उसके नागरिकों से बनते हैं और उनमें कितनी एकता है। एकता तभी संभव होगी जब सब संतुष्ट होंगे और उसके लिए हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए। संवैधानिक लोकतंत्र में राजनैतिक दलों का कार्य लोगों के इन प्रश्नों को सरकार तक उठाने का कार्य होता है ताकि उनका समाधान किया जा सके और संविधान ने हमें ताकत दी है कि हम हर पांच साल में सरकार से उसके कामों का हिसाब किताब मांगें और उसके आधार पर नयी सरकार चुनें। यदि कोई आप से इस हिसाब किताब को ना मांगने को कहता तो वह लोकतंत्र विरोधी और जनता का दुश्मन है। भारत में भी आगामी चुनाव ऐसा ही अवसर है जब जनता को ये हिसाब-किताब लेना है। ये भी जरूरी है कि देश सैन्य और सुरक्षा बलो के साथ खड़े रहना भी जरूरी होता है और उन्हें राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। देश के सैन्य बल किसी राजनैतिक दल के नहीं अपितु देश की जनता के हैं और देश की सुरक्षा के लिए हैं।

कल सीआरपीएफ़ ने मददगार से देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी छात्रों और व्यवसायियों की मदद के लिए हेल्पलाइन जारी करी। ये बेहद महत्वपूर्ण था कि एक बल के इतने जवानों की नृशंस हत्या के बाद भी वो कश्मीरी लोगों की सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता जाहिर कर रहे थे, यह एक बहुत बड़ी बात है और दिल को सुकून देने वाली भी।

कल रात भर से ही ट्विटर और फेसबुक पर पुलिस अधिकारियों और अन्य साथियों द्वारा कश्मीरी छात्रों और अन्य लोगों की मद्दद के लिए अपने घर और संगठनो के दरवाजे खोलना ये दर्शाता है इस देश में इंसानियत और जम्हूरियत में लोगों का अभी भी भरोसा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कौमी एकता है और उसको किसी भी कीमत पर कायम रखना है।

जहां लोगों, प्रशासनिक अधिकारियों, सैन्य बलो और पुलिस अधिकारियों के ऐसी बातें हमें मजबूत करती हैं और विपक्षी दलों का रवैय्या सराहनीय हैं, वही सत्ताधारी दल के लोगों की चुप्पी और उनके भक्तों की आग उगलने वाली भाषा और नफरत के अजेंडे ने बहुत नुकसान किया है।

हमारा सभी से अनुरोध है कि प्रशासन और सैन्य बलों को उनका काम करने दीजिये। आपके सड़क पर उतर कर दंगा फसाद करने और निर्दोष  लोगों को मारने-पीटने से कोई पाकिस्तान में बसे नफरती ताकतों का कुछ नहीं बिगड़ने वाला। ये जरूर होगा कि देश के सुरक्षा बल और तनाव में होंगे और उनका काम और मुश्किल होगा। अपने सुरक्षा बलों के लिए समर्थन कोई बुरी बात नहीं। जो सैनिक मारे गए हैं उनके परिवार वालों के साथ खड़े होना बहुत जरूरी है, लेकिन सैनिकों की शहादत के नाम पर राजनीति करने वालों से सावधान रहने की जरूरत है (In the name of martyrdom of soldiers, people need to be cautious about politics)। सेना पूरे देश की है एक पार्टी या समुदाय की नहीं। उम्मीद है देश के लोग इस बात को समझेंगे कि नफ़रत फैलाने वाले देशभक्ति नहीं कर रहे अपितु देश का सबसे बड़ा नुक्सान कर रहे हैं और इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

एक और बात। टीवी पर आग उगलने वालों की तन्ख्वाएं और वेतन देश पर शहीद होने वालों से बहुत ज्यादा है। ये धन्धेबाज़ हैं। इन्हें धंधे के पैसे मिलते हैं। इनकी आग में खुद न झुलसिए और इनकी चालबाजी में अपने पुराने रिश्तो को ख़राब न कीजिये। ये तो पाकिस्तानी फौजियों को अपने चैनल पर बुलाने के लिए अमेरिकी डॉलर में पेमेंट करते हैं। हमें लगता है ये देश का भला कर रहे हैं, लेकिन ये तो अपनी दूकान चला रहे हैं। इनमे से कोई भी एंकर अपने बच्चों को फौज में भेजना नहीं चाहेगा। भारत के इस मध्य वर्ग का पाखंड देखिये कि अधिकांश के बच्चों का सपना बॉलीवुड, क्रिकेट या बड़ी पेमेंट वाली कॉर्पोरेट नौकरी है न कि फौज में जाना। इसलिए साथियों अपनी दोस्ती बनाये रखिये और अमन चैन से रहिये। हमारे दोस्ती और अमनचैन ही देश के दुश्मनों को परास्त कर देगी। देश की एकता को बनाये रखें, सौहार्द से रहें ताकि उसके तोड़ने वालों के मनसूबे नाकामयाब हो।

विद्या भूषण रावत

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