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Virendra Jain वीरेन्द्र जैन, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।
Virendra Jain वीरेन्द्र जैन, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।

धर्म में राजनीति की घुसपैठ ने बदल दिया मूर्ति पूजा का उद्देश्य

मूर्तियों का आकार : गत दिनों भोपाल में गणेश की एक विशालकाय मूर्ति का विसर्जन करते हुए नाव पलट गयी थी (Bhopal Boat Accident News) और उसमें बारह युवा असमय ही मृत्यु का शिकार हो गये। ऐसे में जैसा कि होता है सत्ता में बैठे नेताओं ने जनभावनाओं के अनुरूप मुआवजे की बड़ी राशि देने की घोषणा करते हुए मृतक के परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी देने तक के वादे किये। कुछ लापरवाह छोटे प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्यवाही की और नियमों को कठोर बनाने की घोषणा भी की। दूसरी ओर विपक्ष में बैठे नेताओं ने अपना कर्तव्य निभाते हुए दिये गये मुआवजे को कम बताते हुये उससे दुगनी राशि देने की मांग कर डाली और राजनीति करते हुये जिम्मेवारी को उच्च अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक फैलाने की कोशिश की, भले ही उनके कार्यकाल में घटित ऐसी ही दुर्घटनाओं में मुआवजे की राशि (Amount of compensation in accidents) बहुत कम रही थी। सुधार की जो त्वरित घोषणाएं की गयीं उनमें मूर्ति का आकार छह फीट तक रखने की बात भी घोषित की गयी। घटना की सनसनी एक सप्ताह तक रही।

कुछ ही दिन बाद नवरात्रि पर्व (Navratri festival) का प्रारम्भ होने जा रहा है, जिसके लिए मूर्तियों का निर्माण अपने अंतिम दौर पर हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केवल भोपाल ही में दस फीट और उससे अधिक ऊंचाई की पाँच सौ से अधिक मूर्तियां निर्मित हो रही हैं। प्रशासन में इतना साहस नहीं है कि वह इन मूर्तियों का निर्माण रुकवा सके या इनके विसर्जन को रोक सके।

सरकार के सुधारात्मक सुझाव को भी धार्मिक मामला बता कर धार्मिक उन्मादियों ने सरकार के खिलाफ बयान देना शुरू कर दिया है। तय है कि विसर्जन का कार्यक्रम प्रति वर्ष की भांति ही होगा और दुर्घटनाओं की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। धर्मदण्ड के आगे दण्डवत हो जाने वाले पुलिस बल से यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वह धर्म के नाम पर कुछ भी बेतुके काम किये जाने को रोकने की कोशिश करे, भले ही उस काम की कोई सुदीर्घ परम्परा न हो।

What is the purpose of idol worship

मूर्ति पूजा का उद्देश्य अतीत के पौराणिक देवताओं को वर्तमान समय में महसूस करना होता है इसलिए यथा सम्भव उनका स्वरूप वैसा ही बनाये जाने की कोशिश की जाती है जैसा कि पुराणों में उनका वर्णन किया गया है। वैसा ही रूप, वैसे ही वस्त्र, वैसे ही शस्त्र, वाहन, और उनके चरित्र के अनुसार उनकी मुख मुद्राएं बनायी जाती हैं। किंतु जब से राजनीति में धर्म की भूमिका ने प्रवेश किया है तब से उसका स्वरूप ही बदल गया है।

आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व तिलक ने गणपति समारोहों का प्रारम्भ महाराष्ट्र में इसलिए किया था ताकि सार्वजनिक स्थान पर हर जाति धर्म के लोग स्वतंत्रता की लड़ाई में साथ आ सकें। आजादी के बाद आयी वोटों की राजनीति में लाभ लेने हेतु एक हिन्दुत्ववादी पार्टी ने पूरे हिन्दीभाषी क्षेत्र में इसका विस्तार किया।

वर्षा की ऋतु के बाद सभी जगह उत्सव मनाने की परम्परा थी किंतु प्रत्येक क्षेत्र में ये उत्सव अलग अलग तरह से मनाये जाते थे। महाराष्ट्र में गणपति की स्थापना के रूप में होता था तो बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में, गुजरात में नवरात्रि में देवीपूजा के साथ गरवा के रूप में होता था तो हिन्दीभाषी क्षेत्र में रामलीलाएं व दशहरा उत्सव होते थे, कांवड़ यात्रा भी निकलती थी। केरल में मनाये जाने वाला ओणम भी इसी महीने पड़ने वाला त्योहार है। वोटों की राजनीति में धर्म के प्रयोग ने सभी जगह सभी तरह के उत्सव मनाये जाने शुरू करवा दिये व कुछ लोगों को इन उत्सवों का व्यापार करना सिखा दिया।

व्यापारिक मनोवृत्ति ने निर्धन, दलित, और पिछड़े वर्ग के बेरोजगार युवाओं को झांकी सजाने और निकालने का स्वरोजगार दे दिया। वे धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं के संरक्षण में अपने समूह की ताकत के बल पर बिना हिसाब किताब का चन्दा एकत्रित करने लगे और धार्मिक भावनाओं का छोंक लगा होने से सरलता से वसूलने भी लगे। यह जानना रोचक हो सकता है कि सर्वाधिक आकर्षण वाली झांकियां बाजारों के आसपास ही लगायी जाती हैं क्योंकि व्यापारिक अनिश्चितता में जी रहा दुकानदार युवा समूह से किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहता। ज्यादा चन्दा वसूलने के लिए झांकियों में प्रमुख तीर्थों की प्रतिकृतियों के साथ साथ मूर्तियों का आकार भी विशाल से विशालतर होता गया।

आयोजक यह भूलते गये कि किसी मूर्ति का आकार धार्मिक पुराणों में रचे गये पात्रों के अनुरूप ही होना चाहिए। पुराणों में देवताओं का आकार सामान्य मानवाकार ही दर्शाया गया है जबकि राक्षसों या खलनायकों को विशाल आकार में बताया गया है। राजनीतिक व्यापार के चक्कर में वे देवताओं का स्वरूप ही बदले दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि देश में लाखों लोगों की पूज्य वैष्णो देवी की मूर्तियां आकार में सामान्य होते हुए भी महत्व में बड़ी हैं। दशहरा में रावण, मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले लम्बे से और और लम्बे बनाये जाते रहे हैं जिनसे सामान्य आकार के पात्र ही संहार कर मुक्ति दिलाते हैं।

गणपति उत्सव, नवरात्रि उत्सव, गरवा आदि की व्यावसायिकता में कोई पंडित या विद्वान यह बताने आगे नहीं आता कि इन उत्सवों को मनाने की शास्त्रोक्त सही विधि क्या हो सकती है, और इसमें आयी विकृतियों को रोका जाना चाहिए। उन्हें ऐसा करने पर धर्मविरोधी ठहराये जाने का खतरा महसूस होता है इसलिए वे दबंगों द्वारा राजनीतिक व्यापार के हित में बनायी जा रही व्यवस्थाओं को चलाने लगते हैं। दुकानदार भी अपने बाज़ार के आसपास ऐसे उत्सव आयोजित कराने में रुचि रखते हैं ताकि भक्तों और ग्राहकों के बीच बचे खुचे भेद को भी मिटाया जा सके।

त्योहारों के दौरान दैनिक उपयोग की वस्तुएं मंहगी बिकने लगती हैं, भले ही उत्सवों, व्रतों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं हो। कारण पूछने पर वे बताते हैं कि उन्हें उत्सव के लिए चन्दा भी देना पड़ता है। कुल मिला कर इन उत्सवों का बोझ भी आम आदमी पर पड़ता है। उत्सवों के दौरान उचित दामों में सामग्री मिलने का कोई अभियान कभी नहीं चला जबकि उसे महूर्त बता कर हर व्यापारी अपना कीमती सामान बेचने के विज्ञापन देने लगता है। पितृपक्ष के दौरान नया सामान न खरीदे जाने का विश्वास लोगों में रहा है किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसी दौरान कुछ लोकप्रिय बाबा बयान देते हैं कि पितृपक्ष में नया सामान खरीदने में कोई दोष नहीं है। जाहिर है कि उक्त अनावश्यक बयान व्यापारियों द्वारा दिलाये गये होते हैं।

उत्तर भारत में नये नये फैले गणेश, दुर्गा, और गरवा उत्सवों के बीच में हमारी रामलीला विलीन हो गयी जो उत्तर भारत का सबसे पुराना जननाट्य था।

जो नये उत्सव आये हैं उनकी आचार संहिता भी बनना चाहिए और उसे अनैतिक व्यापार बनने से रोकने के लिए उसके हिसाब किताब और प्रबन्धन की देख रेख करने वाली भी कोई संस्था होनी चाहिए। अब प्रत्येक मुहल्ले के दबंगों को धन एकत्रित करने के लिए यह साधन बनता जा रहा है। धर्म की राजनीति (Politics of religion) करने वाले भी अपना प्रभावशाली कैडर भी इसी भीड़ से चुनने लगे हैं।

वीरेन्द्र जैन

 

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